महिलाओं की सियासी हिस्सेदारी

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BJD Women Reservation

राज एक्सप्रेस, भोपाल। ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी बीजू जनता दल में 33 फीसदी टिकट महिलाओं को देने का निर्णय लिया है (BJD Women Reservation), तो पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची में 41 फीसदी महिलाओं को जगह दी है। यह निर्णय देश की आधी आबादी के लिए एक बड़े बदलाव का सूचक है। अब दूसरी पार्टियों को चाहिए कि वे भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के प्रति गंभीर हों।

हाल ही में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी बीजू जनता दल में 33 फीसदी टिकट महिलाओं को देने का निर्णय लिया है। आम चुनावों की गहमागहमी के बीच देश के एक प्रांत में लिया गया यह फैसला ऐतिहासिक कहा जाएगा। दूरगामी परिणाम व सकारात्मक संदेश वाला यह निर्णय देश की आधी आबादी के लिए एक बड़े बदलाव का सूचक है। यह पहली बार हो रहा है कि किसी राजनीतिक पार्टी ने 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की हों। यही वजह है कि राजनीतिक दावपेचों से परे इस निर्णय को महिलाओं को आगे लाने वाले फैसले के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि 2014 के आम चुनावों में सिर्फ 66 महिलाएं चुनाव जीतकर संसद पहुंची थीं। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि आजादी की आधी सदी से ज्यादा का समय बीत जाने एक बावजूद महिलाएं इतनी कम संख्या में संसद पहुंचीं। विचारणीय है कि वर्ष 1951 में 22 महिला सांसदों के साथ संसद में आधी आबादी की भागीदारी 4.50 फीसदी थी। हालांकि साल-दर-साल संख्या में बढ़ोतरी ही हुई है पर यह गति बेहद धीमी है।

साल 2009 में 10.87 प्रतिशत भागीदारी एक साथ महिला सांसदों की संख्या 59 और 2014 में 66 महिला सांसदों की संख्या के बूते 12.15 फीसदी रही है। यह कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में हमारे देश में लगभग सभी पार्टियों ने कोताही ही की है। ऐसे में उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में दूसरी पार्टियां भी महिलाओं को टिकट देकर राजनीति में आधी आबादी की हिस्सेदारी बढ़ाने वाले कदम उठाने के बारे में विचार करेंगी। यह जरूरी भी है क्योंकि महिलाओं की भागीदारी बढ़ने का सीधा सा अर्थ यही है कि उनसे जुड़े मुद्दों को भी मुखर आवाज मिलना। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने की यह धीमी गति यकीनन विचारणीय है।

हमारे देश में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता के साथ ही लोकसभा अध्यक्ष और अन्य कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर आसीन रही हैं, लेकिन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में अधिक सुधार नहीं हुआ, जबकि भारत की आबादी का कुल 48.5 फीसदी हिस्सा महिलाएं हैं। नतीजतन, इतने सालों बाद भी देश की महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और श्रम से जुड़े मुद्दों को आवाज नहीं मिली है। हमारे यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और मानवीय अधिकारों के स्तर पर भी महिलाओं के साथ भेदभाव होता आ रहा है। यही वजह है कि महिलाओं के हालात देश के राजनीतिक परिदृश्य में भी कुछ खास अच्छे नहीं हैं। देश की आधी आबादी अब भी अन्य क्षेत्रों के समान ही राजनीति में भी हाशिये पर ही है। सच तो यह है कि देश की आधी आबादी से जुड़ी सभी समस्याओं को आवाज देने व इनका प्रभावी हल ढूंढने के लिए राजनीति में महिलाओं की सशक्त और निर्णयात्मक भागीदारी जरूरी है क्योंकि भारत में आधी आबादी से जुड़े अनगिनत मुद्दे आज भी संवेदनशील सोच लिए मुखर आवाज की तलाश में हैं। यहां तक कि महिला आरक्षण जैसा अहम् बिल भी संसद में लंबे समय से लंबित पड़ा है। इसे लेकर राजनीतिक पार्टियां आज तक सहमति नहीं बना पाई हैं, यह उन पर सवाल उठा रहा है।

हमारे देश की राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व हमेशा से ही कम रहा है। इतना ही नहीं राजनीतिक जोड़-तोड़ के दौर में महिलाओं की जो हिस्सेदारी है, वो भी कितनी व्यापक और स्थायी है, यह भी एक बड़ा प्रश्न है, क्योंकि जब भी देश की नीतियों, योजनाओं से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले करने की बात आती है तो फिर महिलाओं की भूमिका न के बराबर रहती है। ऐसे में महिलाओं के बुनियादी अधिकारों और आमजीवन से जुड़ी समस्याओं को राष्ट्रीय पटल पर उठाने और उन्हें समानता का अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ने के लिए कोई भी महिला प्रतिनिधित्व नजर नहीं आता है। अंतरराष्ट्रीय संस्था अंतर संसदीय यूनियन के साल 2011 के आंकड़ों के अनुसार राजनीति में महिलाओं को हिस्सेदारी देने के मामले में भारत विश्व में 98वें नंबर पर है। जबकि दुनिया के कई पिछड़े एवं निर्धन देशों की संसद तक में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 30-50 फीसदी तक है। इस संस्था के अनुसार भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी इतनी कम है कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को मुखर आवाज नहीं मिल पा रही है।

दरअसल, महिलाओं की ऐसी भागीदारी का बढ़ना अब सामाजिक बदलाव का द्योतक भी है और समाज में बदलाव लाने का जरिया भी है। गौरतलब है कि आजादी से पहले ही 1917 में देश की राजनीति में महिलाओं की भगीदारी को लेकर मांग उठी थी। जिसके बाद वर्ष 1930 में पहली बार महिलाओं को मताधिकार मिला। असल में देखा जाए तो यह महिला मतदाताओं की बढ़ती जागरूकता का ही नतीजा है कि उनका सियासी प्रतिनिधित्व बढाने को लेकर सोचा जा रहा है। मताधिकार को लेकर आ रही मुखरता और मुद्दों के प्रति सजगता अब आधी को जीत या हार तय करने वाले वोटर्स बना रही है। अब हर महिला मतदाता अपने मत के मायने समझने लगी है। हालांकि यह भी एक अहम् सवाल है कि राजनीतिक चेतना व जनस्वीकार्यता के बावजूद आज भी आधी आबादी को सत्ता में अपना पूर्ण प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल पाया है?

यह एक कटु सच है कि भारतीय राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी को लेकर बदलाव आ तो रहा है पर अब भी हार-जीत का गणित ऐसे फैसलों पर हावी है। हां, एक सकारात्मक पक्ष यह है कि अब जनता की भी यही राय बदल रही है। ऐसे में अपने हित साधने के लिए ही सही पर अब सभी राजनीतिक पार्टियों को महिलाओं को आगे लाना ही होगा। हालांकि, ओडिशा में हुई यह पहल सकारात्मक ही कही जाएगी मगर जरूरत इस बात की भी है कि असल मायनों में महिलाओं की सियासी भागीदारी बढ़े। उनके विचारों और निर्णयों को अहमियत दी जाए। आधी आबादी को सत्ता के गलियारों में वो उचित और निर्णयात्मक भूमिका मिले जिसकी वे हकदार हैं। ओडिशा की पहल को आगे बढ़ाते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की पहली सूची में कुल 41 फीसदी महिलाओं को शामिल किया है। यह भी राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को ही इंगित करता है। पटनायक और ममता जैसी पहल अब दूसरे दलों को भी करनी होगी ताकि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ कोरी बातों तक ही सीमित न रहे।

हमारी संसद-विधानसभाओं में महिलाओं की आवाज़ दबी रहने का असर सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं पूरे लोकतंत्र पर पड़ता ही है। ज्यादा महिलाओं के चुने जाने से संसद व विधानसभाएं एकदम शक्तिशाली भले ही न हो जाएं, लेकिन उनकी मौजूदगी से महिलाओं का सशक्तिकरण तो जरूर होगा। अगर सांसद और विधायक महिलाएं होंगी तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन प्रताड़ना के मामलों में पुलिस व प्रशासन पर दबाव जरूर पड़ेगा। असली सवाल यह है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या कैसे बढ़े? इसी परिकल्पना को साकार करने 1996 में महिला आरक्षण बिल संसद में लाया गया था, लेकिन यह लटका ही है।
डॉ. मोनिका शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

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