पुलिस की पीड़ा कब समझेंगे हम

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Police Working Hours

राज एक्सप्रेस, भोपाल। देश में पुलिस पीड़ा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी ड्यूटी से कई घंटे ज्यादा तक काम करना पड़ता है (Police Working Hours)। यह स्थिति एक राज्य की नहीं बल्कि पूरे देश की है। इसमें सुधार तभी होगा जब सभी सरकारें गंभीर होंगी। पुलिस सुधार की अब तक जितनी सिफारिशें सरकार को दी गई हैं उनपर अमल न किया जाना भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

हमारी मौजूदा पुलिस व्यवस्था उसी राह पर चल रही है, जो अंग्रेजों ने दिखाई थी, जो कि गुलाम देश के नागरिकों को हांकने के लिए बनाई गई विलायती व्यवस्था थी। हालांकि, आजादी के बाद पुलिस का चरित्र और चेहरा बदलने की कोशिश हुई, लेकिन अपवादों को छोड़ दें, तो ज्यादा बदलाव अब भी नहीं आया है। देश की मौजूदा पुलिस व्यवस्था का अब भी ज्यादातर चरित्र आम लोगों की सहूलियत की तुलना में हुक्मरानों का हुक्म बजाना एवं उनकी हिफाजत करना है। क्या कभी हमने सोचा है कि पुलिस व्यवस्था को बदले हुए हालात के मुताबिक ढालने और उसके कर्मचारियों को सहूलियतें देने की संजीदा कोशिश क्यों नहीं होती?

कुछ दिनों पहले जारी किए गए कुछ आंकड़े भी तस्दीक कर रहे हैं कि पुलिस में जैसे बदलाव होने चाहिए थे, नहीं हुए। पिछले साल मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में पेश गृह मंत्रालय के दस्तावेजों के मुताबिक 2015 तक देशभर में पुलिस बल के लिए मंजूर 22 लाख 63 हजार पदों में से पांच लाख पद खाली पड़े थे। सभी राज्यों में पुलिस बलों के लिए मंजूर पदों की संख्या 22 लाख 63 हजार 222 है, पर सिर्फ 17 लाख 61 हजार 200 पदों पर ही पुलिस कर्मचारी या अधिकारी तैनात हैं। इस तरह स्वीकृत कुल पदों में से पांच लाख दो हजार बाइस पद खाली पड़े हैं। इनमें से सबसे ज्यादा करीब एक लाख 80 हजार पद सिर्फ उत्तरप्रदेश में ही खाली पड़े हैं। गृह मंत्रलय के आंकड़ों के मुताबिक उत्तरप्रदेश में पुलिस बलों के लिए तीन लाख 64 हजार दो सौ पद मंजूर हैं। दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल है। यहां पुलिस बल के लिए मंजूर पदों की कुल संख्या एक लाख 11 हजार 176 है, पर इनमें से करीब 35 हजार पद खाली हैं। बेशक, नीतीश कुमार के शासन संभालने के बाद बिहार की पुलिस में सुधार आया है, लेकिन वहां भी पुलिस बल की संख्या स्वीकृत पदों से कम है। बिहार में एक लाख 12 हजार 554 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से करीब 30 हजार 300 पद खाली पड़े हैं। पुलिस बल की कमी से कर्नाटक भी जूझ रहा है। यहां स्वीकृत एक लाख सात हजार 53 पदों में से करीब 25 हजार 500 पद खाली हैं।

गुजरात का पुलिस बल भी स्वीकृत पदों से कम पर काम चलाने के लिए मजबूर है। यहां पुलिस बल में मंजूर पदों की संख्या 99 हजार 423 है, पर 17 हजार 200 पद खाली पड़े हैं। तमिलनाडु, झारखंड व छत्तीसगढ़ राज्य भी पुलिस बलों की कमी से जूझ रहे हैं। तमिलनाडु में एक लाख 35 हजार 830 पद स्वीकृत हैं, पर इनमें से लगभग 16 हजार 700 पद खाली पड़े हैं। झारखंड के लिए मंजूर पदों की संख्या 73 हजार 713 है, पर इनमें से 15 हजार 400 पद खाली हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ के लिए मंजूर 68 हजार 99 पदों में से 8500 से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि झारखंड व छत्तीसगढ़ नक्सल प्रभावित राज्य हैं, जहां पुलिस बलों की जरूरत सामान्य से कहीं ज्यादा है। उल्लेखनीय है कि सन-1958 में हुए पुलिस महानिरीक्षकों के सम्मेलन में तय हुआ था कि 50-60 हजार जनसंख्या पर एक पुलिस स्टेशन बनेगा, पर 2001 के आंकड़ों के अनुसार 68 गांवों पर एक पुलिस स्टेशन था।

हाल ही में जारी पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में 15 हजार 555 थाने हैं, जिनमें से 10 हजार 14 थाने ग्रामीण इलाकों में हैं। देश का पुलिस बल टेलीफोन कनेक्शन, वाहनों और वायरलेस सेट की कमी से जूझ रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर सौ पुलिस वालों के लिए महज 10.13 वाहन ही हैं। वहीं 188 पुलिस स्टेशन अब भी ऐसे हैं, जिनके पास कोई वाहन नहीं है। इसी तरह 402 पुलिस स्टेशनों में टेलीफोन नहीं है, तो 134 थाने वायरलेस सेट की सुविधा से महरूम हैं। देश में 65 थाने ऐसे हैं, जहां न तो टेलीफोन है और न ही वायरलेस सेट। इन सुविधा विहीन थानों में सबसे ज्यादा मणिपुर, झारखंड और छत्तीसगढ़ में हैं।

जाहिर है कि जब ऐसे हालात होंगे तो पुलिस वाले किस तरह अपराध नियंत्रण में अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभा पाएंगे? वैसे भी पुलिस बलों की एक बड़ी संख्या प्रोटोकाल, महत्वपूर्ण व अति-महत्वपूर्ण व्यक्तियों, नेताओं, अफसरों आदि की सुरक्षा में ही तैनात रहती है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 36 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में एक करोड़ 72 लाख पुलिसकर्मी ही हैं, जबकि मंजूर पदों के मुताबिक ही यह संख्या दो करोड़ 26 लाख होनी चाहिए। 547 लोगों पर एक पुलिस अफसर होना चाहिए, लेकिन यह संख्या 720 लोगों पर एक पुलिस अफसर की ही है। पुलिस कर्मचारी अनुपात के हिसाब से यह संख्या विश्व में सबसे कम है।

अमेरिका में 436 लोगों पर एक पुलिस अफसर तैनात है, जबकि स्पेन में 198 लोगों पर एक। दक्षिण अफ्रीका में 347 लोगों पर एक पुलिस अफसर तैनात है। पुलिस बल के अनुपात के हिसाब से तैयार 50 देशों की रैंकिंग में भारत का स्थान नीचे से दूसरा है। हैरत की बात यह है कि इससे नीचे सिर्फ युगांडा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानकों के अनुसार हर 454 लोगों पर एक पुलिस अफसर तैनात होना ही चाहिए। इस हिसाब से देखें तो अकेले बिहार में तीन गुना से भी अधिक पुलिसकर्मियों की जरूरत है। इसी तरह पूरे देश में कम से कम ढाई गुना से अधिक पुलिस वालों की जरूरत है। वैसे संयुक्त राष्ट्र का ताजा मानक एक लाख की संख्या पर कम से कम 222 पुलिस कर्मचारियों की तैनाती की जरूरत बताता है, जबकि वर्तमान में यह संख्या करीब 128 ही बैठती है। पुलिस की परेशानी को तब और ज्यादा समझा जा सकता है, जब हमें यह जानकारी मिलती है कि एक दशक में अपराधों में 10.9 फीसदी की वृद्धि हुई है।

पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के नब्बे फीसदी पुलिस वाले आठ घंटे से ज्यादा काम करते हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक 68 फीसदी पुलिस कर्मियों को रोजाना 11 घंटे से अधिक काम करना पड़ता है, जबकि 28 फीसदी पुलिस वाले 14 घंटे से अधिक काम करते हैं। लगभग आधे पुलिस वालों ने यह शिकायत की है कि तकरीबन हर महीने छुट्टी के दौरान उन्हें कम से कम आठ से दस बार ड्यूटी पर बुलाया गया। जाहिर है, पुलिस वालों की अपनी भी ढेर सारी परेशानियां हैं। उनकी तरफ भी देखना जरूरी है। जिस पुलिस सुधार की बार-बार वकालत की जाती है, उसकी ओर ध्यान नहीं दिया गया तो फिर कोई न कोई सिपाही या सब इंस्पेक्टर आदि अपनी परेशानियां सामने लेकर आता रहेगा।

देश में पुलिस की पीड़ा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी ड्यूटी से कई घंटे ज्यादा तक काम करना पड़ता है। मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने सत्ता में आने के बाद पुलिस कर्मियों के साप्ताहिक अवकाश की व्यवस्था की है, मगर इससे कहीं ज्यादा करने की जरूरत है।
उमेश चतुर्वेदी (टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार)

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