यातायात प्रदूषण से बेहाल बच्चे

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Traffic Pollution

राज एक्सप्रेस, भोपाल। हाल ही में ‘द लांसेट प्लैनटेरी हेल्थ’ जर्नल का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि 2015 में यातायात संबंधी प्रदूषण (Traffic Pollution)के कारण भारत में दमा से तीन लाख 50 हजार बच्चे प्रभावित हुए हैं। आज की तारीख में प्रदूषण हर शहर की समस्या है। जिस पर रोक लगाने के लिए न तो हम जागरूक हैं और न ही सरकारें। यही वजह है कि समस्या बढ़ती जा रही है।

हाल ही में ‘द लांसेट प्लैनटेरी हेल्थ’ जर्नल का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि वर्ष 2015 में यातायात संबंधी प्रदूषण के कारण भारत में दमा से 3 लाख 50 हजार बच्चे प्रभावित हुए हैं। लांसेट जर्नल ने यह आंकड़ा 194 देशों और दुनिया भर के 125 प्रमुख शहरों का विश्लेषण करने के उपरांत प्रकाशित किया है। इन आंकड़ों के मुताबिक चीन के बाद इस प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला देश भारत है। इस सूची में संयुक्त राज्य अमेरिका 25वें स्थान पर, चीन 19वें और भारत 58वें स्थान पर है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में यातायात प्रदूषण से अस्थमा की बीमारी के सबसे ज्यादा मामले यानी साढ़े तीन लाख इसलिए हैं कि यहां बच्चों की आबादी दुनिया के अन्य देशों के मुकाबिल अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर वर्ष आस्ट्रेलिया की जनसंख्या के बराबर बच्चे जन्म लेते हैं।

भारत के अलावा विकसित देश अमेरिका की बात करें तो यहां अस्थमा से पीड़ित बच्चों की संख्या दो लाख 40 हजार, इंडोनेशिया में एक लाख 60 हजार और ब्राजील में एक लाख 40 हजार है। इसी तरह दक्षिण कोरिया में यातायात प्रदूषण से होने वाले अस्थमा के 31 फीसद मामले हैं। गौर करें तो इस अध्ययन के मुताबिक वैश्विक स्तर पर हर साल प्रति एक लाख बच्चों में अस्थमा के 170 नए मामले देखने को मिलते हैं और इनमें से बचपन में होने वाले अस्थमा के 13 फीसद मामले यातायात प्रदूषण से जुड़े होते हैं। अगर हम भारत की ही बात करें तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का बड़ा कारण यातायात प्रदूषण है। अगर दिल्ली में यातायात प्रदूषण को थाम लिया जाए तो दिल्ली की हवा सुधर सकती है और बच्चे यातायात प्रदूषण के कुप्रभाव से बचेंगे।

यह तभी संभव हो सकेगा जब जब दीर्घकालीन उपायों के तहत सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या घटायी जाएगी, सड़कों का उचित रखरखाव होगा और यातायात जाम के स्थानों पर जाम दूर करने के वैज्ञानिक उपाय तलाशें जाएंगे। वहीं, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करके भी यातायात व्यवस्था को चाकचौबंद तथा प्रदूषण मुक्त किया जा सकता है। एक सर्वेके मुताबिक, भारत की आधी आबादी यानी 66 करोड़ लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं जहां सूक्ष्म कण पदार्थ (पार्टिकुलेट मैटर) प्रदूषण भारत के सुरक्षित मानकों से उपर है। इनमें यातायात प्रदूषण की भी बड़ी भूमिका है। गौर करें तो लांसेट जर्नल ने अपनी तरह के पहले वैश्विक प्रकाशित अनुमान में यह उजागर किया है कि हर साल बच्चों में दमा से संबंधित दस में से एक से अधिक मामलों को यातायात संबंधी प्रदूषण से जोड़ा जा सकता है। इन मामलों में से 92 प्रतिशत मामले ऐसे इलाकों में हुए हैं जहां यातायात प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निर्देश स्तर से नीचे है।

जर्नल से जुड़े विशेषज्ञों ने माना है कि इस सीमा की फिर से समीक्षा किए जाने की जरूरत है। अमेरिका स्थित जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ सुसानअनेन बर्ग की दलीलों को मानें तो नाइट्रोजन डाईऑक्साइड प्रदूषण बचपन में दमा की घटना के लिए विकसित और विकासशील दोनों देशों में विशेषकर शहरी इलाकों में एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। लिहाजा इन देशों को चाहिए कि वह वार्षिक औसत नाइट्रोजन सांद्रता के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निर्देश पर पुनर्विचार करें। उचित होगा कि सभी देश यातायात उत्सर्जन को कम करने के लिए एक लक्ष्य निर्धारित करें और उसका कड़ाई से पालन करें। आंकड़ों पर गौर करें तो हाल के वर्षो में वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्र घटी है और दूषित गैसों की मात्र बढ़ी है। कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्र में तकरीबन 25 फीसद की वृद्धि हुई है। वैसे तो इसके कई कारण हैं लेकिन इनमें से एक प्रमुख कारण यातायात प्रदूषण भी है। गौर करें तो वाहनों की बढ़ती तादाद ने यातायात प्रदूषण को चरम पर पहुंचा दिया है।

विशेषज्ञों की मानें तो वाहनों के धुएं के साथ-साथ सीसा, कार्बन मोनोक्साइड तथा नाइट्रोजन डाईऑक्साइड के कण निकलते हैं जिससे मानव शरीर में विशेष रुप से बच्चों में कई किस्म की गंभीर बीमारियां पैदा हो जाती हैं। उदाहरण के लिए सल्फर डाई ऑक्साइड से फेफड़े के रोग, कैडमियम जैसे घातक पदार्थो से हृदय रोग और कार्बन मोनोक्साइड से कैंसर और श्वास संबंधी रोग उत्पन होते हैं। नए शोधों से यह भी जानकारी मिली है कि गर्भवती महिलाएं जो यातायात प्रदूषण क्षेत्र में रहती है, उनसे जन्म लेने वाले शिशु का वजन सामान्य शिशुओं की तुलना में कम होता है। यह खुलासा गत वर्ष पहले एनवायरमेंटल हेल्थ प्रॉस्पेक्टिव द्वारा नौ देशों में 30 लाख से ज्यादा जन्म लेने वाले नवजात शिशुओं के अध्ययन से हुआ है। शोध के मुताबिक जन्म के समय कम वजन के शिशुओं को स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यानी इनमें मधुमेह और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। नि:संदेह यातायात हमारे जीवन का अहम हिस्सा है और यह जिंदगी को आसान बनाता है। वाहनों के जरिए हम लंबी दूरी को कम समय में तय कर लेते हैं। लेकिन वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण से जीवन की मुश्किलें बढ़ती जा रही है और बच्चों में कई किस्म की गंभीर बीमारियां जन्म ले रही हैं। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि वैश्विक समुदाय यातायात प्रदूषण को कम करने के लिए वैज्ञानिक उपाय तलाशे और जनता को जागरूक करे।

एक नए अध्ययन में पाया गया है कि हर साल होने वाली सैकड़ों कार दुर्घटनाओं के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार हो सकता है। अध्ययन में कहा गया कि प्रदूषित हवा चालक की सेहत को बिगाड़ती है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन को 32 इलाकों के एक ग्रिड में विभाजित किया। इनमें से हरेक ने लगभग 7 हजार 700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर किया और 2009 से 2014 के बीच हुए हादसों के वायु प्रदूषण के स्तर के अनुसार आंकड़े बनाए। उन्होंने पाया कि रोजाना औसतन प्रति क्यूबिक मीटर मात्र एक माईक्रोग्राम से अधिक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) के जमाव में वृद्धि प्रतिदिन औसतन दो फीसदी दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। इसका सबसे अधिक असर शहरों में हो रहा है। प्रदूषित हवा चालक की चुस्ती को बिगाड़ती है, जबकि आंखों से आंसू निकलने और नाक में खुजली होने से भी वाहन चलाने वालों का ध्यान भंग होता है। कार के अंदर वायु प्रदूषण बाहर की अपेक्षा दोगुने से अधिक हो सकती है, क्योंकि एनओ2 छोटी जगह में बनती है।

विज्ञान के इस युग में जहां हमें कुछ वरदान मिले हैं, वही अभिशाप भी मिले हैं। जिस प्रकार से प्रदूषण विज्ञान की कोख में जन्मा वैसे ही कुछ ऐसे प्रदूषण हैं जो इंसान की सोच से पनपे हैं। बढ़ता प्रदूषण वर्तमान समय की एक सबसे बड़ी समस्या है, जो आधुनिक और तकनीकी रूप से उन्नत समाज में तेजी से बढ़ रहा है। रोक हमें ही लगानी है।

रीता सिंह (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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