निशाने पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, अब पत्रकारिता करना कितना कठिन हो गया

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दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत पत्रकारिता के लिहाज से सबसे खतरनाक देशों की सूची में बहुत ऊपर है। ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ द्वारा हाल ही में जारी वल्र्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के अनुसार, 180 देशों की सूची में भारत 136वें स्थान पर है। यहां अपराध, भ्रष्टाचार, घोटालों, कॉपरेरेट और बाहुबली नेताओं के कारनामों को उजागर करने वाले कई पत्रकारों को कीमत जान देकर चुकानी पड़ी है। इसको लेकर पत्रकारों की सिलसिलेवार हत्याओं का एक लंबा इतिहास रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो सालों के दौरान देश भर में पत्रकारों पर 142 हमलों के मामले दर्ज किए हैं। सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश (64), मध्य प्रदेश (26) और बिहार (22) में दर्ज हैं। इधर एक नया ट्रेंड भी चल पड़ा है, जिसमें वैचारिक रूप से अलग राय रखने वालों व लिखने-पढ़ने वालों को डराया और धमकाया जा रहा है। यहां तक कि उनकी हत्याएं की जा रही हैं।
आरडब्ल्यूबी की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कट्टरपंथियों द्वारा चलाए जा रहे ऑनलाइन अभियानों का सबसे बड़ा शिकार पत्रकार ही बन रहे हैं, यहां न केवल उन्हें गोलियों का सामना करना पड़ता है, बल्कि शारीरिक हिंसा की धमकियां भी मिलती रहती हैं। पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश को बेंगलुरु में उनके घर में घुसकर मार दिया गया। गौरी लंकेश की निर्मम हत्या एक ऐसी घटना है, जिसने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले लोगों को गुस्से व निराशा से भर दिया है। उनकी हत्या बिल्कुल उसी तरह की गई, जिस तरह से उनसे पहले गोविंद पानसरे, नरेंद्र दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी की आवाजों को खामोश कर दिया गया था। ये सभी लिखने, पढ़ने और बोलने वाले लोग थे, जो सामाजिक रूप से भी काफी सक्रिय रहते थे। भारत हमेशा से ही एक बहुलतावादी समाज रहा है, जहां हर तरह के विचार एक साथ ही फलते-फूलते रहे हैं। यही हमारी सबसे बड़ी ताकत भी रही है, लेकिन हिंसावादी सोच सोचने-समझने और संवाद करने की परस्थितियों को सिरे से गायब कर रही है। फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्तेयर ने कहा था कि ‘मैं जानता हूं कि जो तुम कह रहे हो वह सही नहीं है, लेकिन तुम कह सको इस अधिकार की लड़ाई के लिए मैं तो जान भी दे सकता हूं।’ एक मुल्क के तौर पर हमने भी नियति से एक ऐसा ही समाज बनाने का वादा किया था, जहां सभी नागरिकों को अपनी राजनीतिक विचारधारा रखने, उसका प्रचार करने एवं असहमत होने का अधिकार हो। लेकिन अब यात्र के इस पड़ाव पर हम अपने संवैधानिक मूल्यों से भटक चुके हैं। आज इस देश के नागरिक अपने विचारों के कारण मारे जा रहे हैं और इसे सही भी ठहराया जा रहा है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम एक ऐसे समय में धकेल दिए गए हैं जहां असहमति की आवाजों के लिए कोई जगह नहीं है।
अभिव्यक्ति की आजादी व पत्रकारों की सुरक्षा का सवाल हमारी सामूहिक नाकामी का परिणाम है और इसे सामूहिक रूप से ही सुधारा जा सकता है। आज हमारी वैचारिक लड़ाइयां और असहमतियां खूनी खेल में तबदील हो चुकी हैं। इस स्थिति के लिए सिर्फ विचारधारा, सत्ता या राजनीति ही जिम्मेदार नहीं है, इसकी जवाबदेही समाज को भी लेनी पड़ेगी। भले ही इसे बोने वाले कोई और हों। आखिरकार नफरतों की यह फसल समाज और सोशल मीडिया में ही तो लहलहा रही है। नफरत भरी राजनीति को प्रश्रय भी तो समाज में मिल रहा है। नागरिकता की पहचान को सबसे ऊपर लाना पड़ेगा और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी अपना खोया सम्मान और आत्म-विश्वास खुद से ही हासिल करना होगा, क्योंकि लोकतंत्र में तमाम असहमतियों के बाद भी सौहाद्र्र सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है, लेकिन सवाल यह नहीं है कि बेबाक पत्रकार कैसे बचेंगे, सवाल यह है कि स्वतंत्र और निडर पत्रकारिता बचेगी या नहीं! पत्रकारों की हत्या का मामला अब भारत की सरहदों को पार कर गया है या यूं कहें कि सरहद पार कर आया यह मसला अब दूसरे देशों तक भी पहुंच गया है। दुनियाभर में पत्रकारों के साथ होने वाली हिंसा को लेकर चिंता जताई जाने लगी है। बांग्लादेश में ब्लागरों की हत्या की चिंगारी अब भी सुलग रही है। अब इस समस्या से कोई देश अछूता नहीं है।
मीडिया हमेशा से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। एक स्वतंत्र व निष्पक्ष मीडिया के अभाव में स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। स्वतंत्र मीडिया के गैर-हाजिरी में लोकतंत्र के तीनों ही स्तंभ अपाहिज हो जाते हैं। यही वजह है कि जब कभी लोकतंत्र का खात्मा हुआ उससे पहले मीडिया की आजादी का गला घोंट दिया गया। यह समस्या जिस तरह से वैश्विक रूप ले रही है, उसे देखते हुए समाज के सामने स्वस्थ विचारों का आ पाना कठिन होता जा रहा है। भारत सरकार ने हाल ही में सभी राज्यों को परामर्श भेजकर पत्रकारों की सुरक्षा पुख्ता करने की बात कही है। गृह मंत्रलय द्वारा राज्यों को भेजे गए परामर्श में यह भी कहा गया है कि पत्रकारों पर हमलों के सभी मामलों में तेजी से जांच की जानी चाहिए जिससे अपराधियों को समयबद्ध तरीके से न्याय के दायरे में लाया जा सके। किसी भी देश में पत्रकारिता पर संकट आना सही संकेत नहीं है। अत: पत्रकारों पर हमला करने वालों को अपनी मंशा में बदलाव लाना ही होगा, क्योंकि एक भी घटना ध्रुवीय राजनीति को बढ़ावा देती है।
जावेद अनीस (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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