ऋतु परिवर्तन का पर्व है बसंत पंचमी, हम सभी यह उत्सव धूमधाम से मनाएं और विद्या की देवी का आशीष लें

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ऋतु परिवर्तन का पर्व है बसंत पंचमी, हम सभी यह उत्सव धूमधाम से मनाएं और विद्या की देवी का आशीष लें

भारत में पतझड़ ऋतु के बाद बसंत ऋतु का आगमन होता है। बसंत पंचमी का दिन भारतीय मौसम विज्ञान के अनुसार समशीतोष्ण वातावरण के प्रारंभ होने का संकेत है। मकर सक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण प्रस्थान के बाद शरद ऋतु की समाप्ति होती है। हालांकि, विश्व में बदले मौसम के मिजाज ने अनेक प्रकार के गणित बिगाड़ दिए हैं पर सूर्य के अनुसार होने वाले परिवर्तनों का उस पर कोई प्रभाव नहीं है। हमारी संस्कृति के अनुसार पर्वो का विभाजन मौसम के अनुसार ही होता है। इन पर्वो पर मन में उत्पन्न होने वाला उत्साह स्वप्रेरित होता है। सर्दी के बाद गर्मी और उसके बाद बरसात फिर सर्दी का बदलता क्रम देह में बदलाव के साथ ही प्रसन्नता प्रदान करता है। बसंत उत्तर भारत तथा समीपवर्ती देशों की छह ऋतुओं में से एक ऋतु है, जो फरवरी, मार्च और अप्रैल के मध्य इस क्षेत्र में अपना सौंदर्य बिखेरती है। ऐसा माना गया है कि माघ महीने की शुक्ल पंचमी से बसंत ऋतु का आरंभ होता है। फाल्गुन और चैत्र मास बसन्त ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला।
इस प्रकार हिंदू पंचांग के वर्ष का अंत और प्रारंभ बसंत में ही होता है। इस ऋतु के आने पर सर्दी कम हो जाती है। मौसम सुहावना हो जाता है। पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं। अतरू राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है और इसे ऋतुराज कहा गया है। हर तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले दिखाई देते हैं। खेतों में पीली सरसों लहलहाती बहुत ही मदमस्त लगती हैं। इस समय गेहूं की बालियां भी पक कर लहराने लगती हैं। चारों ओर सुहाना मौसम मन को प्रसन्नता से भर देता है। इसीलिए वसंत ऋतु को सभी ऋतुओं का राजा या ऋतुराज कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु, कामदेव तथा रति की पूजा की जाती है। इस दिन ब्रह्मांड के रचयिता ब्रह्माजी ने सरस्वती जी की रचना की थी। इसलिए इस दिन देवी सरस्वती की पूजा भी की जाती है।
ग्रंथों के अनुसार देवी सरस्वती विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। अमित तेजस्विनी और अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघ मास की पंचमी तिथि निर्धारित की गई है। बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। ऋग्वेद में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव और महिमा का वर्णन है। मां सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। कहते हैं जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे अत्यंत ही विद्वान व कुशाग्र बुद्धि होते हैं। बहुत लोग अपना ईष्ट मां सरस्वती को मानकर उनकी पूजा-आराधना करते हैं। जिन पर सरस्वती की कृपा होती है, वे ज्ञानी और विद्या के धनी होते हैं। बसंत पंचमी का दिन सरस्वती जी की साधना को ही अर्पित है। शास्त्रों में भगवती सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है, किंतु आजकल सार्वजनिक पूजा-पंडालों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने का विधान चल निकला है। यह ज्ञान का त्योहार है, फलस्वरूप इस दिन प्राय: शिक्षण संस्थानों व विद्यालयों में विभिन्न कार्यक्रम होते हैं।
ऋग्वेद में ऋषि मधुछंदा ने सरस्वती की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए लिखा है- पावक: न: सरस्वती वाजेर्भिवाजिनीवती। यज्ञं वष्टु विधायसु:। अर्थात् बुद्धिमत्तापूर्वक, धन, अन्न, ऐश्वर्य प्रदान करने वाली एवं पावन करने वाली हे सरस्वती ज्ञान-कर्म द्वारा यज्ञ को संपन्न करो। आगे लिखा है-चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम। यज्ञं दधे सरस्वती। अर्थात् सरस्वती हमारे यज्ञ को स्वीकार कर हमें मनवांछित फल प्रदान करने वाली सत्य एवं प्रिय वाणी बोलने की प्रेरणा देने वाली तथा यज्ञानुष्ठान को सफल करने वाली हैं। भारतवर्ष में बिहार (झारखंड सहित) एक ऐसा राज्य है, जहां से राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं यथा आईएएस और आईपीएस में सर्वाधिक चयन होते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि झारखंड व बिहार में बसंत पंचमी पर्व गणोश उत्सव और दुगरेत्सव की तरह अत्यंत श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। यहां शहरों और गांवों में झांकियां सजाकर, गाजे-बाजे के साथ गीत गाकर मां सरस्वती की आराधना की जाती है।
वाग्देवी मां सरस्वती समस्त ज्ञान-विज्ञान, विद्या, कला एवं बुद्धि की प्रतिनिधि स्वरूपा वाणी की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। यद्यपि सभी देवता विशेष ज्ञान एवं योग ऐश्वर्य तथा सिद्धियों से संपन्न होते हैं, तो भी शब्द ब्रह्म शब्द से उपदष्टि ज्ञानात्यिका शक्ति मां सरस्वती साक्षात ब्रह्मस्वरूपिणी ही हैं। वे महामाया, महालक्ष्मी एवं महाकाली आदि से भिन्न नहीं हैं। शास्त्रों में सरस्वती का नाम श्री एवं दूसरा नाम श्री पंचमी है। बसंत ऋतु की पंचमी सरस्वती का आविर्भाव दिवस है। स्पष्ट है कि संपूर्ण विश्व का दैनंदिन कार्य-व्यापार वाणी के व्यवहार पर ही आधारित है। विश्व की विभिन्न भाषाओं, पशु-पक्षियों, सांकेतिक लिपि आदि में भी तो इन्हीं सरस्वती की शक्ति है। अत: समस्त विश्व में अनादिकाल से अनेक नाम-रूपों में मां की उपासना प्रचलित रही है। मां सरस्वती का मूल स्थान अमृवय प्रकाशपुंज है, जहां से वे अपने उपासकों के लिए ज्ञानामृत की धारा प्रवाहित करती हैं। मां सरस्वती को ध्यान स्वरूप शास्त्रों में अनेकानेक रूपों में दर्शाया गया है।
बसंत पंचमी को सभी कार्यो के लिए भी अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। मुख्यत: विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए बसंत पंचमी को पुराणों में भी अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है। बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त मानने के पीछे अनेक कारण हैं। यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है। माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस माह में पवित्र तीर्थो में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। दूसरे इस समय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है। अर्थात उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है। सूर्य की क्रांति 22 दिसंबर को अधिकतम हो जाती है और सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और छह माह तक उत्तरायण रहते हैं। सूर्य का मकर से मिथुन राशियों के बीच भ्रमण उत्तरायण कहलाता है।
सरस्वती को (शारदाम्बा) पूर्ण ब्रह्म के रूप में भी अधिष्ठित बताया गया है। साथ ही ब्रह्म के साथ ब्रह्मलोक में भी ब्रह्मणी के रूप मे विराजित कहा है। ऋग्वेद की एक अन्य ऋचा द्वारा मैं अपनी बात का समापन करता हूं। ऋषि गौतमो राहूगण ने लिखा है- तानपूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षम स्त्रिधम, अर्यर्मण वरूणं, सोममश्विना सरस्वती सुभगा मयस्करत्।। अर्थात् सुख प्रदान करने वाले देवतागण भग, मित्र अदिति, दक्ष अर्यमा, मरूद्गण, वरुण, सोम, अश्विनी कुमार तथा सौभाग्य की देवी सरस्वती का हम पुरातन स्तुतियों द्वारा आह्वान करते हैं। आओ हम सब अपनी संतति की उन्नति के लिए मां सरस्वती की आराधना के पर्व बसंत पंचमी को एक उत्सव की तरह धूमधाम से मनाएं।
रमेश सर्राफ (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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