बच्चों की चिंता करे समाज

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Child Marriage Statistics

राज एक्सप्रेस, भोपाल। अब बाल विवाह को लेकर सोच में परिवर्तन आ रहा है। समाज में शिक्षा के प्रसार और आर्थिक स्थिति में सुधार का असर बाल विवाह की संख्या में कमी के तौर पर नजर आ रहा है (Child Marriage Statistics)। कुछ राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और झारखंड में इसमें उल्लेखनीय सुधार नजर आ रहा है। लेकिन अब भी काफी प्रयास किए जाने शेष हैं। माता-पिता और समाज को अपने स्तर पर बच्चों के भविष्य की चिंता करनी ही होगी।

आखातीज या अक्षय तृतीया को अबूझ सावे के रूप में जाना-पहचाना जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में विवाह होते हैं जिनमें बाल विवाह भी शामिल है। बाल विवाह का मतलब छोटी आयु में शादी। यानी 21 वर्ष से कम आयु के लड़के और 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह होना, बाल विवाह माना जाएगा। भारत में बाल विवाह की प्रथा काफी पुरानी थी। लाख कोशिशों के बाद भी अपने देश से यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई। सभ्य समाज के मुंह पर यह एक तमाचा है। यह मानव जीवन की सबसे बड़ी और दुखद त्रासदी है। यह सामाजिक बुराई हिंदी और अहिंदी भाषी दोनों तरह के राज्यों में समान रूप से प्रचलित है। विशेषकर राजस्थान, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में बाल विवाह का चलन आज भी है। मगर अब बदलाव दिख रहा है। इसका श्रेय सरकार को दिया जाए या समाज को अभी इस पर निष्कर्ष निकालना जल्दी होगा। मगर संतुष्टि यह है कि अब बाल विवाह को लेकर सोच में परिवर्तन आ रहा है। समाज में शिक्षा के प्रसार और आर्थिक स्थिति में सुधार का असर बाल विवाह की संख्या में कमी के तौर पर नजर आ रहा है। कुछ राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और झारखंड में इसमें उल्लेखनीय सुधार नजर आ रहा है।

उत्तर प्रदेश तो इस लिहाज से चैंपियन स्टेट की तरह उभरकर आया है और 15 से 19 साल की उम्र में सिर्फ 6.4 फीसदी लड़कियों की ही शादी हो रही है। हालांकि, बंगाल में स्थिति चिंताजनक है। कम उम्र में विवाह का बुरा प्रभाव किशोरियों के गर्भवती होने का है। बाल विवाह की दर में ज्यादातर राज्यों में कमी आई है पर कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां अन्य राज्यों की तुलना में सुधार अपेक्षाकृत काफी कम है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-चार (2015-16) के अनुसार, देश में बाल विवाद की औसत दर 11.9 फीसदी है। हिमाचल प्रदेश और मणिपुर में आंकड़ों में कुछ वृद्धि जरूर दर्ज की गई है। एनएफएचएस तीन (2005-06) के आंकड़ों से एनएफएचएस-चार (2015-16) के आंकड़ों में उत्तर प्रदेश के आंकड़ों में काफी सुधार हुआ है। उत्तर प्रदेश में 29 फीसदी से दर कम होकर सिर्फ 6.4 फीसदी ही रह गया है। पश्चिम बंगाल में भी सुधार हुआ है, मगर कम है। बंगाल में 34 फीसदी से यह दर कम होकर 25.6 फीसदी रह गई है।

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बाल विवाह का दुष्प्रभाव कम उम्र में गर्भधारण के रूप में भी है। 15 से 19 की उम्र में शादी होने वाली लड़कियों में हर तीन में से एक लड़की टीन-ऐज में ही मां बन जा रही है। इस उम्र में शादी होने वाली लड़कियों में से एक चौथाई 17 साल की उम्र तक मां बन जाती हैं और 31 फीसदी 18 की उम्र तक मां बन जाती हैं। टीन-ऐज प्रेगनेंसी में गोवा पहले नंबर पर है, मिजोरम दूसरे और मेघालय तीसरे नंबर पर है। बाल विवाह को लेकर शहरों की स्थिति गांवों से बेहतर है और इसी तरह आर्थिक आधार भी बाल विवाह रोकने के लिहाज से अहम फैक्टर है। शहरों में बाल विवाह का औसत 6.9 फीसदी और गांवों में 14.1 फीसदी है। कुछ राज्य ऐसे हैं जहां शहरों में बाल विवाह के आंकड़े चौंका सकते हैं। शहरी क्षेत्र में विवाह में पहला नंबर हरियाणा का है और दूसरे नंबर पर तमिलनाडु है। तीसरे नंबर पर मणिपुर का नंबर आता है। दरअसल, छोटी आयु में विवाह का मुख्य कारण सिर्फ अशिक्षा व गरीबी है। अभिभावक गरीबी के कारण बेटी का जल्दी विवाह कर सामाजिक दायित्व से निवृत्त होना चाहते हैं।

नासमझी और अशिक्षित होने के कारण उन्हें यह ज्ञान नहीं रहता कि वे अपनी बेटी को एक अंधे कुएं की ओर धकेल रहे हैं जिसमें से वह ताउम्र नहीं निकल पाएगी। छोटी आयु में विवाह के कारण लड़की को गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ता है। खेलने-कूदने के दिनों में वह घर-गृहस्थी की समस्याओं से जूझती रहती है। इसके अलावा, उसे घरेलू हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। फिर शारीरिक रूप से अपरिपक्वता के साथ उसे शिक्षा से भी वंचित होना पड़ता है। बाल विवाह को सख्ती से रोकने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास किए गए। यह सदियों पुरानी कुप्रथा है जिसे जाने अनजाने हम आज भी भले ही कम, मगर ढोते चले आ रहे हैं। 1928-29 में शारदा एक्ट बना, जिसमें नाबालिग बच्चों के विवाह को निषिद्ध किया गया। भारत सरकार ने इस कानून की पालना के लिए लड़के की आयु 21 वर्ष व लड़की की आयु 18 वर्ष निर्धारित की थी। इससे कम आयु के बच्चों का विवाह कानूनी रूप से निषिद्ध और दंडनीय अपराध स्वीकारा गया। बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 में बाल विवाह को दंडात्मक अपराध माना गया है।

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 40 प्रतिशत बाल विवाह भारत में होते हैं। इनमें 49 प्रतिशत लड़कियों के विवाह 18 वर्ष से कम आयु में हो जाते हैं। लिंग भेद वर अशिक्षा सबसे बड़ा कारण माना गया है।  यूनिसेफ के अनुसार राजस्थान में 82 प्रतिशत लड़कियों का विवाह 18 साल से पहले हो जाता है। 1978 में संसद द्वारा बाल विवाह निवारण कानून पारित किया गया था। इसमें विवाह की आयु निर्धारित की गई थी। यूनिसेफ की बच्चों संबंधी एक और रिपोर्ट में यह बताया गया है 47 प्रतिशत महिलाएं कानूनी रूप से 18 वर्ष से कम आयु में ब्याही गईं। इनमें 56 प्रतिशत महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों की थीं। बाल विवाह आज भी ज्वलंत समस्या के रूप में हमारे सामने है। यह अनादिकाल से चली आ रही है। सामाजिक मान्यता मिलने के कारण इसे बढ़ावा मिलता रहा है। इसी कारण इस कुप्रथा ने विकराल रूप धारण कर लिया। अशिक्षा व अज्ञानती का वजह से कुछ लोग इस कुप्रथा को अब भी ढोए जा रहे हैं। बाल विवाह को बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन भी माना गया है। जब तक बच्चे बालिग या समझदार न हो जाएं और अपने भले-बुरे की पहचान के योग्य न हो जाएं, तब तक विवाह नहीं किया जाना चाहिए।

यह भी वैज्ञानिक परिणामों से स्पष्ट है कि बाल विवाह से अच्छे स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा का अधिकार, खेलने-कूदने के अवसर हासिल नहीं होते। कच्ची उम्र में शादी होने से स्वास्थ्य और जननांगों पर भी खराब असर पड़ता है जिसे बच्चों को ताउम्र झेलना पड़ता है। फिर छोटी उम्र में विवाह से लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा अधिक हानि उठानी पड़ती है। असुरक्षित यौन संबंधों से उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके फलस्वरूप अनेक भीषण बीमारियों से ग्रस्त होना आम बात है। बाल विवाह के कारण बार-बार गर्भधारण और असमय गर्भपात का सामना करना पड़ता है और नवजात शिशु के भी अकाल मौत का शिकार होने का अंदेशा बना रहता है। कुपोषण और खून की कमी से मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। बाल विवाह के समर्थक इसके पक्ष में अनेक कुतर्को का सहारा लेकर समाज को गुमराह करने का प्रयास करते हैं। अनेक अभिभावक यह मानते हैं कि जल्दी विवाह से लड़कियों को यौन हिंसा से बचाया जा सकता है।

सामाजिक चेतना के अभाव और कानून की शिथिलता के कारण निश्चय ही बाल विवाह की सामाजिक कुरीति को बढ़ावा मिलता है। बाल विवाह को रोकने के लिए समाज में जनचेतना के प्रयास किए जाने बेहद आवश्यक हैं। पिछले कुछ दशकों से इस दिशा में किए गए प्रयासों का असर देखने को मिला है। शिक्षित समाज ने इस सामाजिक बुराई को समझा है। मगर ग्रामीण तबका आज भी बाल विवाह का पक्षधर है। इस तबके को समझाने के लिए सभी संभव प्रयास करने होंगे। इसके लिए बुजुर्गो का सहयोग जरूरी है।

डॉ. किरण सक्सेना (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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