नागरिकता पर बवाल के अर्थ

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Citizenship Amendment Bill

राज एक्सप्रेस, भोपाल। नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 (Citizenship Amendment Bill) को भारत में रह रहे शरणार्थी उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। बिल में बांग्लादेश, पाक और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। वैसे, इस राह में सरकार के समक्ष मुश्किलें कई हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 लोकसभा में पास होने के बाद से भारत में रह रहे शरणार्थियों की उम्मीद बढ़ गई है। बिल का अभी राज्यसभा से पास होना बाकी है। इस बिल पर मचे घमासान के बाद एनडीए की सहयोगी असम गण परिषद ने साथ छोड़ दिया है, तो असम के कई संगठन भी विरोध में आ गए हैं। हालांकि, गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि एनआरसी में बिल की वजह से कोई भेदभाव नहीं होगा। जबकि शिवसेना और असम गण परिषद जैसी पार्टियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रहे एनआरसी पर बिल का असर होगा। अभी आबादी प्रतिशत के आधार पर जम्मू-कश्मीर के बाद असम मुस्लिमों की आबादी वाला दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। असम की तीन करोड़ आबादी में ज्यादातर बंगाली बोलने वाले मुस्लिम समुदाय की तादाद करीब 34 प्रतिशत है। आबादी में कम असमी बोलने वाले मुस्लिम सभी धर्मो के शरणार्थियों को छूट देने के विरोध में हैं, जबकि बिल में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता मुहैया कराने का प्रावधान है।

भाजपा का मानना है कि इस बिल से असम को मुस्लिमों के एकाधिकार में आने से रोका जा सकेगा। राज्य में मुस्लिम बड़ी राजनीतिक ताकत न बन सकें यह सुनिश्चित करने के लिए असम को अतिरिक्त हिंदू आबादी की जरूरत है। असम में अब तक अवैध शरणार्थियों की पहचान धार्मिक आधार पर नहीं हुई है और वहां के ज्यादातर लोग चाहते हैं कि बांग्लादेश से आए शरणार्थी (मुस्लिम और हिंदू दोनों) जो संयोग से बंगाली भी बोलते हैं, उन्हें हटाया जाना चाहिए। असम के लोगों को डर है कि बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थी उनकी संस्कृति और भाषाई पहचान के लिए खतरा हैं। बंगाली बहुल बराक घाटी में ज्यादातर लोगों ने धार्मिक आधार पर नागरिकता नियम का स्वागत किया है। उन्हें उम्मीद है कि इससे नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) से वे बच सकेंगे। अब तक तकरीबन 40 लाख लोगों का नाम एनआरसी में नहीं है।

वेस्टर्न और सेंट्रल असम के 8 जिलों में बंगाली बोलने वाले मुस्लिम केवल गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने के प्रस्ताव के खिलाफ हैं। यह विधेयक 2016 में पहली बार पेश किया गया था लेकिन सरकार का कहना है कि इसका मसौदा दोबारा से तैयार किया गया है। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों में इसका वादा किया था। असम के हालात के बीच यह बिल राज्यसभा में पास होना मुश्किल है, लेकिन सरकार इसके जरिए जो संदेश देना चाह रही थी, उसमें सफल हो गई है। असम में मुस्लिमों की बढ़ रही तादाद को रोकने और हिंदुओं की आबादी बढ़ाने का भाजपा का एजेंडा अब सामने आ चुका है, तो उसे इसका फायदा पूर्वोत्तर के राज्यों में मिलना तय है। लेकिन सालों से भारत में रहने वाले अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाक के हिंदू, जैन व सिख शरणार्थियों के बारे में भी सोचना होगा।

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