आबादी का बोझ कम करें हम

0
34
India Population

राज एक्सप्रेस, भोपाल। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि (India Population) भारत की आबादी 2010 से 2019 के बीच बढ़कर 1.36 अरब हो गई है, जो चीन की वार्षिक वृद्धि दर के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा है। यह संकेत अच्छे नहीं हैं, क्योंकि आबादी के साथ संसाधनों का अभाव बढ़ता जा रहा है।

भारत की आबादी 2010 से 2019 के बीच 1.2 की औसत वार्षिक दर से बढ़कर 1.36 अरब हो गई है, जो कि चीन की वार्षिक वृद्धि दर के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा है। 2019 में भारत की जनसंख्या 1.36 अरब पहुंच गई है, जो 1994 में 94.22 करोड़ और 1969 में 54.15 करोड़ थी। विश्व की जनसंख्या 2019 में बढ़कर 771.5 करोड़ हो गई है, जो पिछले साल 763.3 करोड़ थी। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 और 2019 के बीच भारत की जनसंख्या औसतन 1.2 प्रतिशत बढ़ी है। इसकी तुलना में 2019 में चीन की आबादी 1.42 अरब पहुंच गई है, जो 1994 में 1.23 अरब और 1969 में 80.36 करोड़ थी। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में 1969 में प्रति महिला कुल प्रजनन दर 5.6 थी, जो 1994 में 3.7 रह गई। भारत ने जन्म के समय जीवन प्रत्याशा में सुधार दर्ज किया है। संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट चिंता पैदा करती है। आबादी के साथ संसाधनों का अभाव बढ़ता जा रहा है। दोनों के बीच की खाई को पाटना चुनौती बनता जा रहा है।

स्वाभाविक रूप से जनसंख्या में वृद्धि का दबाव संसाधनों व अवसरों की उपलब्धता पर पड़ता है। इस कारक को ध्यान में रख कर योजनाओं का निर्धारण भी होता है। अभी दुनिया की आबादी 7.6 अरब है। 2005 से इसमें एक अरब का इजाफा हो चुका है तथा 2030 तक इसमें एक अरब की और वृद्धि होने का अनुमान है। इस नक्शे में भारत को देखें। भारत की जनसंख्या अभी 1.36 अरब है। चीन की 1.41 अरब। भारत 2024 में चीन की बराबरी कर लेगा, तब दोनों की आबादी 1.44 अरब होगी। पर उसके बाद चीन पीछे छूट जाएगा और भारत नंबर एक पर आ जाएगा। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत की जनसंख्या डेढ़ अरब के आसपास होगी। विशाल आबादी के भार को भारत अब भी हर क्षण महसूस करता है। सवाल है कि सर्वाधिक आबादी वाला देश होने जा रहे भारत की तैयारी क्या है? हर कोई जानता है कि इससे संसाधनों पर बोझ और बढ़ेगा। जल, जमीन और जीविका के लिए संघर्ष बढ़ेंगे। रिहाइश, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सेवाओं की उपलब्धता की मांग और तेज होगी।

आधुनिक विमर्श में बढ़ती आबादी को समस्या नहीं माना जाता है, बल्कि समझा जाता है कि अगर आधुनिक विकास के लाभ सब तक समान रूप से पहुंचें लोग राष्ट्रीय थाती बन जाते हैं और उस हाल में अपने-आप जनसंख्या नियंत्रित होती है। अगर इस समझ के साथ नीतियां बनें तो जाहिर है, नए साल में मिली सूचना से हमें चिंतित होने की जरूरत भी नहीं होगी। जलवायु-परिवर्तन, प्रदूषण और मानसून की अनिश्चितता जैसी परेशानियां भी मौजूद हैं। इस बीच आबादी का दबाव शहरों पर बढ़ रहा है और वहां जीवन-स्तर में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है। इसलिए हमें जनसंख्या बढ़ाने वाले कारकों पर ध्यान देना होगा और देश की आबादी का बोझ कम हो, इसके लिए प्रयास भी करने होंगे। वह भी जल्द से जल्द।

No ratings yet.

Please rate this

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Enter Captcha Here : *

Reload Image