दहेज हत्या-घरेलू हिंसा चिंतनीय

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राज एक्सप्रेस, भोपाल। संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओडीसी) द्वारा प्रकाशित नए अनुसंधान के अनुसार, पिछले साल दुनिया भर में लगभग 87 हजार महिलाएं मारी गईं, जिनमें बड़ी तादाद भारतीय महिलाओं की रही। मौत की बड़ी वजह दहेज और घरेलू हिंसा (Dowry kill-Violence) है। यह प्रवृत्ति इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि लोगों में कानून और कड़ी सजा का भय नहीं है। लिहाजा सरकार दहेज प्रथा के समूल नाश और घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कड़े प्रावधान बनाए।

यह विचलित करने वाला है कि, दहेज रोकथाम के कड़े कानून के बाद भी महिलाओं की हत्या का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मादक पदार्थ एवं अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओडीसी) द्वारा प्रकाशित नए अनुसंधान के अनुसार, पिछले साल दुनिया भर में लगभग 87 हजार महिलाएं मारी गईं, जिनमें एक बड़ी तादाद भारतीय महिलाओं की रही। रिपोर्ट पर गौर करें तो करीब 50 हजार यानी 58 प्रतिशत महिलाओं की हत्या उनके करीबी साथी अथवा परिजनों द्वारा की गई। अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ है कि हर घंटे तकरीबन छह महिलाएं परिचितों के हाथों मारी जाती हैं जिनमें एक प्रमुख कारण दहेज है। भारत की स्थिति पर गौर करें तो 2016 में महिला हत्या दर 2.8 प्रतिशत थी जो कि अन्य पिछड़े देशों जैसे केन्या (2.6), तंजानिया (2.5), जार्डन (0.8) व तजाकिस्तान (0.4 प्रतिशत) से अधिक है।

भारत में 15 से 49 वर्ष उम्र की 33.5 प्रतिशत महिलाओं और लड़कियों ने व पिछले एक साल में 18.9 प्रतिशत महिलाओं ने अपने जीवन में कम से कम एक बार हिंसा का सामना जरूर किया है। भारत में दहेज से संबंधित हत्याओं का मामला कितना गंभीर है वह राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के इस आंकड़े से उजागर हो जाता है कि दहेज से संबंधित हत्या के मामले महिलाओं की हत्या के सभी मामलों का 40 से 50 प्रतिशत है। खतरनाक बात यह है कि इसमें 1999 से 2016 के दौरान एक स्थिर प्रवृत्ति देखी गई। तात्पर्य यह हुआ कि सरकार द्वारा 1961 में लागू दहेज विरोधी कानून बेअसर साबित हो रहा है और देश में दहेज के मामले बढ़ रहे हैं। जबकि दहेज लेना-देना 1961 से कानून अपराध है। दहेज का अर्थ है जो संपत्ति विवाह के समय वधु के परिवार की तरफ से वर को दी जाती है। भारत में इसे दहेज, हुंडा या वर-दक्षिणा के नाम से जाना जाता है।

गौर करें तो आज के आधुनिक समय में भी दहेज प्रथा नाम की बुराई सर्वत्र फैली हुई है। पिछड़े भारतीय समाज में तो यह प्रथा और भी विकराल रूप में है। यद्यपि प्राचीन समय से ही पिता द्वारा अपनी कन्या को उपहार इत्यादि देने का प्रचलन था। परंतु उपहार देने की इस परंपरा में कोई विवशता नहीं होती थी। दोनों पक्ष के सगे-संबंधी वर-वधु का घर बसाने के उद्देश्य से स्वेच्छा से उन्हें भेंट दिया करते थे। तब यह कुरूपता धारण नहीं की थी। किंतु आगे चलकर राजाओं, जमींदारों व धनाढ्यों ने स्वेच्छा से दी जाने वाली इस भेंट को बढ़ा-चढ़ाकर दहेज के रूप में परिवर्तित कर दिया। उनके लिए बढ़-चढ़कर दहेज लेना और देना शान-ओ-शौकत बन गया। यह धीरे-धीरे यह कुरूपता समाज के सभी वर्गो में फैल गई और यह अब प्रथा महिलाओं की जिंदगी पर भारी पड़ने लगी है। आज दहेज की मांग से ऐसा प्रतीत होता है मानों विवाह न होकर कोई सौदा हो रहा है। अकसर देखा जाता है कि जब वधु पक्ष-वर पक्ष के मनमुताबिक दहेज नहीं दे पाता है तो वर पक्ष के सदस्य वधु पर जुल्म ढाना शुरू कर देते हैं। आज उसी का कुपरिणाम है कि देश में औसतन हर घंटे में एक महिला मौत का शिकार बनती है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह कि यह आंकड़ा कम होने के बजाए लगातार बढ़ता जा रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2007 से 2011 के बीच इस प्रकार के मामलों में वृद्धि देखी गई।

दहेज विरोधी-1961 के कानून के मुताबिक दहेज लेन-देने या इसमें सहयोग करने पर पांच वर्ष की कैद और 15 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है। दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा संपत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अंतर्गत तीन साल की कैद और जुर्माना हो सकता है। धारा 406 के अंतर्गत लड़की के पति व ससुराल वालों के लिए 3 साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों (यदि वे लड़की के स्त्रीधन को उसे सौंपने से मना करते हैं) का प्रावधान है। इस कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी लड़की के विवाह के सात साल में असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के अंतर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है, लेकिन यह सच है कि दहेज लेने-देने की कुप्रवृत्ति आज भी जारी है। याद होगा महिला एवं विकास मंत्रलय ने साल 2015 में संसद में एक सवाल के जवाब में कहा था कि पिछले तीन साल में हर साल 8000 से ज्यादा महिलाओं की मौत दहेज की वजह से हुई।

मौजूदा महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लिखित ब्यौरा प्रस्तुत किया है जिसके मुताबिक पिछले तीन सालों में 24 हजार 771 महिलाओं की मौत दहेज के कारण हुई है। उनके मुताबिक पिछले तीन सालों में आठ लाख से भी ज्यादा मामले धारा 304-बी के तहत दर्ज हुए। आंकड़ों पर गौर करें तो दहेज प्रथा के कारण हुई मौतों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। दूसरे नंबर पर बिहार और तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है। घरेलू हिंसा को  देखें तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े के अनुसार 3.48 लाख मामले पति और परिवार पर दर्ज हुए हैं। देश में सबसे अधिक घरेलू हिंसा पश्चिम बंगाल में हुई। दूसरे नंबर पर राजस्थान और तीसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश है। घरेलू हिंसा के मामले में गत वर्ष यूनिसेफ की एक रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ से उद्घाटित हुआ कि भारत में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 प्रतिशत विवाहित महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेली हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि,15 साल से 19 साल तक की उम्र वाली 77 प्रतिशत महिलाएं कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा यौन संबंध बनाने या फिर अन्य किसी यौन क्रिया में जबरदस्ती का शिकार हुई हैं। इसी तरह 15 से 19 साल की उम्र वाली 21 प्रतिशत महिलाओं ने 15 साल की उम्र से ही हिंसा झेली हैं। 15 से 19 साल के उम्र समूह की 41 फीसदी लड़कियों ने 15 साल की उम्र से अपनी मां या फिर सौतेली मां के हाथों शारीरिक हिंसा झेली हैं जबकि 18 प्रतिशत ने पिता या सौतेले पिता के हाथों हिंसा झेली है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई, उनके साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान के व्यक्ति और शिक्षक थे। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष एवं वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च ऑन वूमेन’ से भी उजागर हो चुका है कि भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी पत्नी के साथ हिंसक व्यवहार किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक 52 प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकारा है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है। इसी तरह 38 प्रतिशत महिलाओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात कही है। गौर करें तो महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय है ही नहीं लिहाजा उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। समय आ गया है कि सरकार दहेज प्रथा के समूल नाश और घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कड़े प्रावधान बनाए।
डॉ. रीता सिंह (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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