बंगाल हिंसा में फायदा किसका?

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Bengal Electoral Violence

राज एक्सप्रेस, भोपाल। बंगाल में चुनावी हिंसा (Bengal Electoral Violence) का इतिहास रहा है लेकिन लोकसभा के अंतिम चरण के मतदान से पहले ताजा हिंसा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मंगलवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के लिए भाजपा ने तृणमूल पर आरोप लगाए हैं, जबकि तृणमूल ने भाजपा पर बाहर से भीड़ लाकर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है। इस बीच चुनाव आयोग का फैसला काबिलेगौर है। उम्मीद है कि अब सभी दल शांति की बात करेंगे।

जिस वक्त देश में चुनावी हिंसा की घटनाएं बेहद कम होने लगी हैं, उस दौर में भी पश्चिम बंगाल का पुराना रक्त चरित्र उसके वर्तमान पर हावी हो जाता है। बस किरदार बदल जाते हैं। आज बंगाल में ममता बनर्जी का राज है और सामने मुकाबले के लिए ताल ठोंक रही है भाजपा। लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में हिंसा की जो तस्वीर दिख रही है, उसमें न तो किसी एक पार्टी को जवाबदेह ठहराया जा सकता है और न ही किसी एक को क्लीनचिट दी जा सकती है। बहरहाल, इस बीच निर्वाचन आयोग ने एक ऐसा फैसला लिया है, जो बंगाल की हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के लिए सख्त संदेश तो है ही, दूसरे राज्यों के लिए सबक भी। चुनाव आयोग ने बंगाल में एक दिन पहले ही प्रचार खत्म कर दिया। आखिरी चरण के लिए 17 मई को प्रचार की अवधि समाप्त होनी थी, मगर आयोग ने इस सीमा को घटाकर 16 मई की रात 10 बजे कर दिया। आयोग ने यह फैसला भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुए विवाद के बाद लिया है। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए एक दिन की कटौती की है। आयोग ने ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़े जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। घटना पर ऐक्शन लेते हुए आयोग ने एडीजी (सीआईडी) व प्रधान सचिव (गृह) को हटाया है।

शायद यह पहला मौका है, जब चुनाव आयोग ने धारा 324 का प्रयोग किया है, लेकिन कानून व्यवस्था का फिर से पालन न होने पर, हिंसा होने पर और चुनाव के दौरान आचार संहिता का उल्लंघन होने पर यह कदम फिर से उठाया जा सकता है। चुनाव आयोग ने सीआईडी के एडीजी राजीव कुमार को गृह मंत्रालय से संबद्ध किया है। इसके अलावा प्रमुख सचिव गृह और स्वास्थ्य को उनके वर्तमान पदभार से तत्काल प्रभाव से मुक्त किया है। अब मुख्य सचिव गृह विभाग का काम देखेंगे। बता दें कि 19 मई को बंगाल की नौ सीटों पर चुनाव होना है, ऐसे में सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी पूरी ताकत झोंक रही हैं। आगे बढ़ने से पहले अनुच्छेद 324 पर चर्चा जरूरी है। अनुच्छेद 324 के तहत आयोग ऐसे किसी भी मामले में दखल दे सकता है, जिनमें गड़बड़ी या फिर अस्पष्टता लग रही हो। इस अनुच्छेद के तहत आयोग को स्वतंत्र और निर्विवाद चुनाव कराने के लिए कुछ शक्तियां दी गई हैं। इसके तहत वह अधिकारियों की तैनाती या छुट्टी, प्रचार के समय की अवधि तय करने और प्रचार के नियमन समेत महत्वपूर्ण फैसले ले सकता है।

बंगाल में चुनावी हिंसा का इतिहास रहा है लेकिन लोकसभा के अंतिम चरण के मतदान से पहले ताजा हिंसा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मंगलवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के लिए भाजपा ने तृणमूल पर आरोप लगाए हैं जबकि तृणमूल ने भाजपा पर बाहर से भीड़ लाकर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है। इससे पहले के चरणों में भी हिंसा हुई थी लेकिन रोड शो के दौरान हिंसा का अलग ही स्वरूप सामने आया। दोनों पक्षों में जमकर पत्थरबाजी हुई। बंगाल में भावनात्मक अपील रखने वाले ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गई। दोनों पक्ष एक दूसरे पर मूर्ति तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं। कहा जाता है कि बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं। जब भी सत्तारूढ़ पार्टी खुद को कमजोर पाती है और कोई नई पार्टी चुनौती देती हुई लगती है तो हिंसा होती ही है। पश्चिम बंगाल सिद्धार्थ शंकर रे के जमाने से पिछले चार दशकों से चुनावी हिंसा का गवाह रहा है। 70 के दशक में जब सीपीएम उभर रही थी तब और जब 90 के दशक के अंतिम सालों में तृणमूल सीपीएम को चुनौती दे रही थी तब भी।

राज्य में पिछले पंचायत चुनावों में भी हिंसा हुई थी। इन चुनावों में सीमावर्ती इलाकों में भाजपा को कुछ सीटें भी मिलीं थी। अब वह संसदीय चुनाव में कुछ सीटें जीतना चाहती है। साल 2009 से ही पश्चिम बंगाल में भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ रहा है। पंचायत चुनावों में मिली सफलता के बाद भाजपा चाहती है कि उसका बढ़ता जानाधार सीटों में परिवर्तित हो। अंतिम चरण में जिन नौ सीटों पर मतदान होना है, 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने ये सारी सीटें जीती थीं। भाजपा इनमें से कम से कम दो सीटों पर जीत की उम्मीद लगाए हुए है, इसीलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह यहां जोर लगाए हैं।  उत्तरी कोलकाता का संसदीय क्षेत्र हिंदीवासी बहुल है और भाजपा का यहां जनाधार बढ़ा है। शाह रोड शो के जरिए शहरी मतदाताओं में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं और तृणमूल ऐसा होने नहीं देना चाहती। हिंसा की यह भी एक बड़ी वजह है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों अनुसार, 2013 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 26 लोगों की हत्या हुई थी, जो किसी भी राज्य से अधिक थी। 2015 में राजनीतिक झड़प की 131 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिसमें 184 लोगों की हत्या हुई। साल 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़प की 91 घटनाएं , जिसमें 205 लोग हिंसा के शिकार होकर मारे गए। यह सब ममता बनर्जी के शासन काल में हुआ है। मरने वालों में सबसे ज्यादा भाजपा के कार्यकर्ता हैं। 1997 में वामदल की सरकार में गृहमंत्री रहे बुद्धदेब भट्टाचार्य ने विधानसभा मे जानकारी दी थी कि वर्ष 1977 से 1996 तक पश्चिम बंगाल में 28,000 लोग राजनीतिक हिंसा में मारे गए थे। ये आंकड़े राजनीतिक हिंसा की भयावह तस्वीर पेश करते हैं। बंगाल में 1996 के बाद भी राजनीतिक हत्याएं खूब हुई। एक आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में साल 1977 से 2014 तक करीब-करीब 54 हजार राजनीतिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों की हत्या हो चुकी है। अपने विरोधी विचारधारा वाले लोगों की हत्या करने में पहले कम्युनिस्ट पार्टी और अब तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता शामिल रहे हैं।

बहरहाल, अमित शाह के रोड शो की घटना इस मामले में नई है कि इससे पहले परंपरा थी कि प्रतिद्वंद्वी दलों की सभा को बाधित नहीं किया जाएगा। इस घटना से बचा जा सकता था। पश्चिम बंगाल में पहले से ही टकराव का माहौल रहा है। चुनावों में भाजपा की आक्रामक एंट्री ने टकराव को और बढ़ा दिया है। कॉलेज स्ट्रीट का इलाका बहुत छोटी जगह है, जहां हिंसा हुई। वहीं पास में भाजपा का कार्यालय भी है जबकि आस पास मुस्लिम बहुल इलाका है। ऐसे में इस हिंसा से दंगा फैलने की आशंका भी थी। रोड शो के लिए बीजेपी के कार्यकर्ता वहीं इकट्ठा हुए थे लेकिन सवाल यह भी उठता है कि दूसरे दल के कार्यकर्ताओं को वहां इकट्ठा होने ही क्यों दिया गया? प्रशासन इस टकराव को रोक सकता था। विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने को तृणमूल कांग्रेस मुद्दा बना रही है और इसे बंगाली पहचान पर हमले के रूप में प्रचारित कर रही है। 70 के दशक में जब नक्सली बहुत मजबूत स्थिति में थे और बंगाली भद्रलोक का एक बड़ा जनमत उनके साथ था, उसी बीच में उन्होंने ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी थी। नक्सलबाड़ी आंदोलन की ये सबसे बड़ी भूल साबित हुई। उसके बाद नक्सलवाद पूरे पश्चिम बंगाल में अलग थलग पड़ गया।

खैर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा इन मुद्दों को अपने ढंग से जनता के बीच ले जा रही है। अब इनका असर क्या होता है, यह तो 23 मई के बाद ही पता चलेगा, लेकिन तब तक बंगाल में हिंसा रोकना सभी पार्टियों का कर्तव्य है। उन्हें मतदान के दौरान शांति बनाए रखनी होगी।                                                डॉ. सत्येंद्र पाठक (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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