मध्यस्थता से समाधान की संभावना क्षीण

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Mediation for Ayodhya Dispute

राज एक्सप्रेस, भोपाल। अयोध्या विवाद के समाधान (Mediation for Ayodhya Dispute) के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त तीन सदस्यीय पैनल ने दोनों पक्षों से सुलह की कोशिश शुरू कर दी है। मगर सुलह की कोशिशों का इतिहास देखें तो लगता नहीं कि सफलता हाथ लगेगी। इस समय यह माहौल बन रहा है जैसे बाबरी के पक्षकार तो बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन राममंदिर के समर्थक ही इससे भाग रहे हैं, जबकि हकीकत के पन्ने पलटेंगे तो पता चल जाएगा कि रोड़ा कौन अटका रहा है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए तीन सदस्यीय पैनल ने फैजाबाद में भले ही दोनों पक्षों से बात शुरू कर दी हो, पर पता नहीं अयोध्या विवाद को अभी किन-किन मोड़ों से गुजरते हुए समाधान तक पहुंचना है। हालांकि, न्यायालय द्वारा इस विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजे जाने के सकारात्मक पक्ष भी हैं। इसका अर्थ हुआ कि उच्चतम न्यायालय ने इसे जमीन के स्वामित्व का विवाद तक सीमित नहीं माना है। सुनवाई के दौरान अपनी मौखिक टिप्पणी में न्यायालय ने कहा था कि यह आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ मामला है जिसका निपटारा जमीन के दीवानी मामले की तरह तो नहीं किया जा सकता। यह बड़ी टिप्पणी है। अभी तक मुस्लिम पक्षकार और उनके समर्थक कुछ बड़े चेहरे यह दलील देते रहे हैं कि न्यायालय को तो केवल यह तय करना है कि इस जमीन का असली मालिक कौन है। यानी धार्मिक आस्था की बात से न्यायालय का कोई लेना-देना नहीं। बाबरी मस्जिद के समर्थकों ने इसे हमेशा मिल्कियत का चरित्र देने की कोशिश की है। जाहिर है, उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त तीन मध्यस्थ भी इसी सोच से बातचीत करेंगे कि यह धार्मिक आस्था का मामला है। इससे न्यायिक प्रक्रिया में नया मोड़ आ गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2.77 एकड़ जमीन को विवादास्पद मानकर फैसला दिया था। रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा तथा सुन्नी वक्फ बोर्ड को बराबर हिस्सा दे दिया। न्यायालय को इसका ही फैसला करना था।

तत्काल प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण व न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मध्यस्थता से उस विवाद को सुलझाने की पहल की है तो उसने इस पर काफी विचार किया होगा। छह मार्च को उसने सभी पक्षों से मध्यस्थों से नाम मांगा था तथा आठ मार्च को तीन नामों की घोषणा कर दी। किंतु क्या हम मध्यस्थता को लेकर उत्साहित हो सकते हैं? क्या वाकई अयोध्या मामले के सर्वसम्मत समाधान की संभावना मध्यस्थता में अभी भी निहित है? भारत में सांप्रदायिक सद्भाव के हर हिमायती का यह मानना रहा है कि अगर अयोध्या विवाद का समाधान अगर दोनों पक्षों के बीच बातचीत तथा आपसी सहमति से होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इसकी कोशिशें नहीं हुईं। दुर्भाग्य से अब तक की सारी कोशिशें विफल रहीं। राजीव गांधी से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंहए चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव तक की गैर भाजपा सरकारों द्वारा बातचीत की लंबी श्रृंखला है। बाद में अटलबिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल के चौथे वर्ष में एक अयोध्या प्रकोष्ठ बनाकर बातचीत को सांस्थानिक रूप भी दिया। इन सबमें यहां विस्तार से जाना संभव नहीं।

अयोध्या विवाद पर वार्ता के इतिहास से अनभिज्ञ लोगों को यह सच शायद गले नहीं उतरे पर तथ्य यही है कि रामजन्मभूमि के समर्थक बातचीत के लिए हमेशा समय से पहुंचता रहा, बाबरी समर्थक ही कई बार कन्नी काटते थे। कई बार तो ऐसा हुआ कि उनकी कुर्सियां खालीं रहीं। हालांकि, वार्ता का परिणाम यह हुआ कि अयोध्या में राममंदिर था या नहीं इसे लेकर पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाण जुटाने का काम गहराई से हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं विश्व हिन्दू परिषद की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रमाण जुटाने के जो काम उन वार्ताओं के दौरान हुए वही आज तक सबूत दस्तावेजों के रूप में मौजूद हैं। हांए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अवश्य खुदाई कराकर उसमें भारी योगदान दिया। लेकिन जिसे सबूत को स्वीकार नहीं करना है और न भावनाओं का सम्मान उसके साथ तो कुछ किया नहीं जा सकता है। इस समय यह माहौल बन रहा है जैसे बाबरी के पक्षकार तो बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन राममंदिर के समर्थक ही इससे भाग रहे हैं। सच यह है कि मार्च 2017 में तब के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएच खेहर ने भी मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने यहां तक कहा था कि आप चाहें तो मैं मध्यस्थता करने को तैयार हूं।

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के जफरयाब जिलानी ने साफ शब्दों में कह दिया था कि बातचीत का कोई मतलब नहीं है, हमें तो फैसला चाहिए। यही बात मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी कही थी। पिछले साल श्रीश्री रविशंकर ने बातचीत शुरू की थी। उसमें बाबरी मस्जिद के समर्थक कुछ चेहरों ने ऐसा माहौल बनाया कि भय से उसमें कोई जाए ही नहीं। हैदराबाद में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने बाजाब्ता प्रस्ताव पारित कर बातचीत को खारिज कर दिया। बोर्ड के एक वरिष्ठ सदस्य ने बातचीत एंव मंदिर के पक्ष में बयान दे दिया था उनको तत्काल निलंबित कर कार्यवाही के लिए कमेटी गठित कर दी गई। आज वे बोर्ड में नहीं है। ऐसा माहौल बनाया गया बातचीत के विरुद्ध। आज अगर ये लोग अचानक बातचीत के समर्थक हो रहे हैं और कह रहे हैं कि अगर इससे समाधान हो जाए तो बेहतर बात कुछ हो नहीं सकती तो निश्चय ही सोचना पड़ेगा कि आखिर ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ कैसे? यह अपने आप तो नहीं हुआ है। नि:संदेह, उच्चतम न्यायालय के मध्यस्थ पैनल में तीनों सदस्य अनुभवी हैं। न्यायमूर्ति फकीर मोहम्मद खलीफुल्ला उच्चतम न्यायालय के सम्मानित न्यायाधीश रहे हैं। जुलाई 2016 में वे सेवानिवृत हुए। वहीं श्रीश्री रविशंकर को वार्ता करने का अनुभव है। इसी तरह वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू की मुख्य भूमिका ही मध्यस्थता की है। पांचू 20 सालों से सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। वह मिडिएशन चैंबर्स के संस्थापक हैं। उन्होंने देश के अलग अलग हिस्सों में व्यावसायिक, कॉरपोरेट और अन्य क्षेत्रों से जुड़े कई बड़े व जटिल विवादों में मध्यस्थता की है।

ध्यान रखिए, पहली बार सुप्रीम कोर्ट द्वारा अधिकृत पैनल बातचीत करेगा इसलिए इसका महत्व बढ़ जाता है। न्यायालय ने इनके लिए आठ सप्ताह का समय निर्धारित कर दिया है। यानी वह बातचीत के नाम पर मामले को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं है। हालांकि अगर बातचीत से उम्मीद बनी तो इसका समय विस्तार किया जा सकता है, पर केवल बातचीत के लिए बात को उच्चतम न्यायालय अनवरत जारी नहीं रखेगा ऐसा उसके तेवर से लगता है। पैनल को अपनी पहली रिपोर्ट चार सप्ताह में देनी होगी। उससे न्यायालय को यह भी आभास हो जाएगा कि वाकई ठोस प्रगति की संभावना है या नहीं। पैनल को आवश्यकता पड़ने पर अपने साथ अन्य को भी जोड़ने की छूट दे दी गई है। इससे भी काम आसान होगा। इन्हें जिस किसी की उपयोगिता लगेगी उनको अपने साथ शामिल करेंगे। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मीडिया की रिपोर्टिग पर रोक भी उचित है। रिपोर्टिग के कारण बहस और विवाद होता है जिसका दबाव पैनल एवं वार्ता में शामिल पक्षों पर पड़ सकता है तथा रास्ता निकालने में कठिनाई आ सकती है। हालांकि पूरी बातचीत कैमरे में होगी ताकि न्यायालय उसका अपने फैसले में उपयोग कर सके।

किंतु इनके अनुभव तथा खुले दिल की तरह ही पक्षकार भी होंगे इसकी संभावना कम है। असदुद्दीन आवैसी ने रविशंकर के इरादे पर ही प्रश्न उठा दिया है। यह दुखद स्थिति है कि उच्चतम न्यायालय में करीब आठ वषों से मामला पड़ा है और प्रगति इतनी ही है कि मध्यस्थ बातचीत करेंगे। इसमें समाधान की उम्मीद कोई करे तो कैसे? किंतु चारा ही क्या है? तो न्यायालय के प्रयास की सफलता की संभावना न होते हुए भी हमें इसकी अंतिम परिणति की प्रतीक्षा करनी होगी।
अवधेश कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

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