राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इस बार दागियों को राजनीति से दूर रखें

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राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इस बार दागियों को राजनीति से दूर रखें

चुनाव आयोग ने गुरुवार को उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय व नगालैंड में होने वाले विधानसभा चुनाव का ऐलान कर दिया। इन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे। पहले चरण में 18 फरवरी को त्रिपुरा में वोटिंग होगी। दूसरे चरण में 27 फरवरी को मेघालय और नागालैंड में वोट पड़ेंगे। तीन मार्च को तीनों राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के लिए मतगणना होगी। इन तीन राज्यों में चुनाव की घोषणा के साथ ही यह मुद्दा फिर उछल गया है कि क्या इस बार राजनीति दागियों से मुक्त रह पाएगी। हाल ही में हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में दागियों से राजनीतिक दलों ने खूब यारी दिखाई थी। राजनीति में दागियों का मुद्दा हमेशा से ज्वलंत रहा है और हमारी सरकारों की यही मनोदशा रही, तो यह कभी खत्म भी नहीं हो पाएगा। पिछले साल सरकार ने चुनाव आयोग के उस प्रस्ताव पर सहमति जताई है, जिसमें दागियों के खिलाफ सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया जाना है। यह पहल तात्कालिक असर तो दिखाती है, मगर दूरगामी परिणाम भविष्य के गर्भ में है।
देश में 90 के दशक से यह मांग उठ रही है कि दागी नेताओं का कुछ इलाज अब होना ही चाहिए। आखिर भारतीय राजनीति बलशाली राजनेताओं की बंधक तो है नहीं। 1997 में चुनाव आयुक्त रहे कृष्णमूर्ति ने कहा था कि 1996 में चुनाव मैदान में उतरे कुल एक लाख 37 हजार प्रत्याशियों में से 15 सौ का आपराधिक रिकार्ड था और ग्यारहवीं लोकसभा में 40 सांसदों का रिकार्ड आपराधिक रहा था। देश में उस समय के 25 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में करीब 700 विधायकों पर इस तरह के प्रकरण दर्ज हैं और उन पर फैसला आना है। अरसे से यह बात राजनीतिक दलों के स्थापित राजनेता कहते रहे हैं कि राजनीति में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग आने चाहिए व इसमें पारदर्शिता की गुंजाइश तलाशी जानी चाहिए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
अब सांसदों और विधायकों पर चल रहे आपराधिक मामलों के निपटारे को लेकर केंद्र सरकार ने हाल ही में बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने इन मामलों को निपटाने के लिए एक साल तक 12 स्पेशल कोर्ट चलाने पर सहमति जताई है। इन स्पेशल कोर्ट में करीब 1571 आपराधिक केसों पर सुनवाई होगी। ये मामले वर्ष 2014 तक सभी नेताओं के द्वारा दायर हलफनामे के आधार पर ही हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इन मामलों का निपटारा एक साल के अंदर किया जाना है। हालांकि, पहले सरकार का रवैया भी ढुलमुल था। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सभी दागी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की थी, जबकि केंद्र सरकार ने इसे खारिज करते हुए छह साल के बैन को ही लागू रखने को कहा था। आखिरकार कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र सरकार विशेष न्यायालयों के गठन पर तैयार हुई। दागी नेताओं पर सरकारों का स्पष्ट रवैया न होना बेहतर व अपराधीमुक्त लोकतंत्र की स्थापना में बाधक रहा है।
लोकतंत्र की खूबी इसी में है कि शासन की बागडोर जनता द्वारा चुने गए सांसदों व विधायकों के हाथ में होती है, लेकिन लोकतंत्र की यह दुर्बलता है कि सांसदों-विधायकों का चुनाव योग्यता और गुणवत्ता के आधार पर न होकर व्यक्ति, दल, धन एवं जाति के आधार पर होता है। यही कारण है कि राजनीति अपराधमुक्त नहीं बन पा रही है व इससे लोकतंत्र को हानि पहुंच रही है। राजनीति लोकतंत्र की बुनियाद है और इसकी जनता की आंखों में पारदर्शिता होनी चाहिए। लेकिन आज राजनीति ने इतने मुखौटे पहन रखे हैं कि सही चेहरा पहचानना आम आदमी के लिए कठिन हो गया है। जिस तरह राजनीति में अपराधीकरण का बोलबाला रहा है, वह लोकतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकार करना समूची लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को शर्मसार करता है। सच तो यह है कि बुराई लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं बल्कि जनता के चरित्र में है। लोग बदलेंगे तभी व्यवस्था में सुधार होगा। दागियों को नकारना लोगों को सीखना होगा। प्रतिनिधि चुनने से पहले उसके बारे में तमाम जानकारी स्पष्ट होनी चाहिए ताकि लोगों पर सवाल न उठे। जनता को जिम्मेदारी समझनी होगी और वोट को व्यर्थ करने से बचना होगा। इसी में लोकतंत्र की पवित्रता के साथ लोगों का हित जुड़ा है। अत: हम पहल करें।
16वीं लोकसभा के चुनाव के दौरान अपराधमुक्त राजनीति का नारा सर्वाधिक बार उछला था। सभी दलों एवं राजनेताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि राजनीति अपराध मुक्त हो, लेकिन हुआ इसका उलट। 16वीं लोकसभा में 15वीं लोकसभा की तुलना में आपराधिक सांसदों की संख्या बढ़ गई। आखिर क्यों सरकार इस दिशा में कुछ कर नहीं रही? और विपक्ष भी क्यों चुप है इस मामले में? क्या इसलिए कि सबके दामन पर दाग है? कब तक बाहुबल, धनबल की राजनीति लोकतंत्र को कमजोर करती रहेगी? कोई सत्ता में बना रहना चाहता है इसलिए समस्या को जीवित भी रखना चाहता है, कोई सत्ता में आना चाहता है इसलिए समस्या बनाता है। यह रोग भी पुन: राजरोग बन रहा है। जो उभर कर आया है, उसमें आत्मा, नैतिकता व न्याय खत्म हो गए हैं।
देश में जिस प्रकार से राजनीति में अपराध व्याप्त होता जा रहा है, उसके कारण सज्जन व्यक्तियों के लिए राजनीति में कोई जगह नहीं है। ऐसे में सवाल यह आता है कि जब राजनीति से सज्जनता समाप्त हो जाएगी, तब देश में कैसी राजनीति की जाएगी। यदि इसका विश्लेषण किया जाए तो राजनीति के घातक स्वरूप का ही आभास होता है। देश में कई बार अपराधियों का राजनीति में प्रवेश प्रतिबंधित करने की मांग की गई, लेकिन जब राजनेता ही अपराध में लिप्त हों तो उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे राजनीति के शुद्धीकरण का समर्थन करेंगे। आज देश में कई राजनेता ऐसे हैं जिन पर कई प्रकार के आपराधिक आरोप लगे हैं। इतना ही नहीं कई नेताओं पर आरोप सिद्ध भी हो चुके हैं। इसके बाद भी वे सक्रिय राजनीति में भाग ले रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इसके साक्षात प्रमाण हैं।
राजनीति में बढ़ रहे अपराधीकरण को लेकर अब चुनाव आयोग भी सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती तब तक रंग नहीं दिखाएगी, जब तक सरकारें और राजनीतिक दल सख्ती नहीं दिखाएंगे। सिर्फ चुनाव जीतने के लिए अपराधियों को टिकट देने की नीति जब तक जारी रहेगी, बेहतर लोकतंत्र की उम्मीद बेमानी है। 12 स्पेशल कोर्ट बनाकर दागियों के मामलों का निपटारा करने से पहले तीन राज्यों में चुनाव ने सभी पार्टियों को शुचिता का मार्ग अपनाने का बड़ा मौका दिया है। अगर इस बार भी राजनीतिक दल सत्ता सुख के लिए दागियों पर भरोसा कर बैठे, तो जनता का भरोसा वे कभी नहीं जीत पाएंगे। सो, देश के सभी राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे नगालैंड, त्रिपुरा व मेघालय में टिकट बंटवारे के समय राजनीति के शुद्धिकरण का ध्यान रखें।
सरोज सोनकर (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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