हज यात्रा पर जाने वाले यात्रियों को इस साल से कोई सब्सिडी नहीं दी जाएगी, महिला कल्याण से जुड़ेगी हज सब्सिडी

0
30
हज यात्रा पर जाने वाले यात्रियों को इस साल से कोई सब्सिडी नहीं दी जाएगी, महिला कल्याण से जुड़ेगी हज सब्सिडी

हज यात्रा पर जाने वाले यात्रियों को इस साल से कोई सब्सिडी नहीं दी जाएगी। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने बताया कि सरकार ने 64 साल पुरानी व्यस्था को खत्म कर दिया। हज यात्रियों को करीब 700 करोड़ की छूट प्रतिवर्ष दी जाती है, लेकिन अब इस धनराशि को अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों की शिक्षा एवं उनके कल्याण पर खर्च किया जाएगा। यह बिना तुष्टिकरण किए अल्पसंख्यकों को गरिमामय तरीके से सशक्त बनाए जाने का नीतिगत उपाय है। हालांकि, इस छूट पर न्यायपालिका भी जनहित याचिकाओं के जवाब में सवाल उठाती रही है। लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के फेर में सरकारें इसे खत्म करने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं। आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह हज सब्सिडी को चरणबद्ध ढंग से 2022 तक समाप्त करे। मोदी सरकार ने साहस दिखाते हुए चार साल पहले ही इस सब्सिडी को खत्म कर दिया।
संविधान देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की पैरवी करता है। इसलिए अब सरकार को चाहिए कि वह मानसरोवर यात्रा पर जो छूट यात्रियों को देती है, उसे भी खत्म करे। यह हमारे देश में ही संभव है कि सांप्रदायिक तुष्टिकरण को भी संवैधानिक नीति का दर्जा दे दिया जाता है। जबकि किसी भी धर्मनिरपेक्ष राज्य का यह बुनियादी सिद्धांत होता है कि उसमें न तो किसी धर्म को प्रोत्साहित किया जाए और न ही हतोत्साहित। सबको अपना मजहब अपनी परंपरा अनुसार मनाने की छूट होती है। किंतु भारत सरकार ने 1954 से मुस्लिमों को हवाई यात्रा के लिए हज सब्सिडी देनी शुरू की थी। यह उपाय ब्रिटिश शासन का अनुकरण था। इसके बाद वर्ष 1957 में हाजी एक्ट बनाकर इसका विस्तार कर दिया गया। 1992 में ऐसी ही पुनरावृत्ति पीवी नरसिंह राव ने उस समय की जब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाया गया था। राव ने मुस्लिमों की नाराजगी दूर करने के नजरिए से हज यात्र में छूट या सब्सिडी की धन राशि में बेतहाशा वृद्धि कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में जब सब्सिडी खत्म करने का फैसला सुनाया, तो उस साल 700 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी गई थी। धीरे-धीरे कटौती की शुरुआत हुई। 2016 में 408 करोड़ और 2017 में 250 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी गई। दरअसल, सरकार ने 2009 के बाद प्रति यात्री विमान किराया 16 हजार रुपए तय किया था। किराए का बाकी खर्च सरकार वहन कर रही थी, जबकि 2006 में ही संसदीय समिति ने इस छूट को खत्म करने का सुझाव दिया था। नवंबर-2017 में केंद्रीय हज समिति भी इसे समाप्त करने के लिए तैयार हो गई। कोर्ट ने हज के लिए जाने वाले सरकारी प्रतिनिधि मंडल को भी छोटा करने का सुझाव दिया है। यह मंडल 102 लोगों का रहता है, इसका मकसद मुफ्त में सैर-सपाटा करना भर है। हज यात्रा से सरकारी खजाने पर बोझ लगातार बढ़ रहा था।
देश के पहले प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू ने विशुद्ध मुस्लिम तुष्टिकरण की दृष्टि से पहली बार 1959 में हज यात्र पर जाने वालों के लिए रियायती दर पर वायुयान उपलब्ध कराने की शुरुआत की थी। तब इसका इस बात को लेकर चंद बुद्धिजीवियों ने विरोध किया था कि जब कट्टरता के लिए प्रसिद्ध सऊदी अरब समेत कोई भी मुस्लिम देश जब मक्का-मदीना के जाने के लिए रियायत नहीं देता तो भारत ने यह गलत परंपरा क्यों शुरू कर दी? दरअसल, इस्लाम के पांच मौलिक सूत्रों में से एक यह भी है कि हज यात्रा अपने ही खून-पसीने और ईमानदारी की कमाई से की जानी चाहिए। कुरान की आयत में कहा गया है कि ‘व अमेजुस्वालेहाते’ अर्थात नेक अमल कर, सद्कर्म कर। इसी तरह का उद्देश्य ऋग्वेद की एक ऋचा में भी है, ‘रमंते लक्ष्मी पुण्यां’ अर्थात् लक्ष्मी का वास वहीं है, जहां पुण्य हो। भारत के दोनों ही प्रमुख धर्मो का सार यही है कि तीर्थ यात्रएं मेहनत और ईमानदारी से अर्जित धन से ही करनी चाहिए, जबकि सरकारी खजाने का धन शराब या अन्य नशीले द्रव्यों की बिक्री से की गई कर वसूली और जुर्माने के रूप में प्राप्त धन है, जो धर्मानुसार धार्मिक यात्राओं के लिए वर्जित माना गया है।
धार्मिक यात्राओं पर छूट केवल इस्लाम धर्मावलंबियों को दी जा रही हो, ऐसा कतई नहीं है। हिंदुओं को मानसरोवर यात्रा के लिए लगभग 200 करोड़ की छूट प्रति साल दी जा रही है। कई सरकारें पिछले कई साल से सरकारी खर्च पर लाखों हिंदू, मुस्लिम व सिख धर्मावलंबियों को धर्मस्थलों की नि:शुल्क यात्राएं करा रही हैं। ये यात्रएं कराई तो गरीबों के लिए जाती हैं, लेकिन अब तो सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी ही इनका लाभ उठा रहे हैं। इसमें भ्रष्टाचार की शिकायतें भी लगातार आ रही हैं। देश और प्रदेश में जब कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हों, तब शत-प्रतिशत नि:शुल्क इन यात्राओं का औचित्य समझ से परे है। आजादी के बाद पहली बार 2018 में 1.75 लाख यात्री हज पर जाएंगे। यह संख्या पिछले साल की तुलना में पांच हजार ज्यादा है। इनमें से 1.41 लाख लोग हज समिति के माध्यम से जाएंगे। बिना मरहम के हज यात्र करने वाली लगभग 1300 महिलाएं भी चुन ली गई हैं। इनकी मदद के लिए हज सहायक नियुक्त किए गए हैं, ताकि उन्हें दिक्कत न हो।
इस साल समुद्री जलमार्ग से भी सऊदी अरब जाने का विशेष प्रबंध केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। इस सुविधा से उन लोगों को लाभ होगा, जो वायुयान से यात्रा करने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है। सरकार ने यात्रा में पारदर्शिता लाने की दृष्टि से हज कमेटी ऑफ इंडिया और प्राइवेट टूर ऑपरेटरों के बीच हज कोटा के बंटवारे को न्यायसंगत बनाने की पहल की है, जिससे स्वार्थी तत्वों की मिलीभगत से हजयात्रा के लिए जरूरत से ज्यादा जो शुल्क वसूल लिया जाता है, उस पर भी अंकुश लगे। इस मुद्दे को लेकर यह पहलू भी उभरकर सामने आया है कि यह छूट सीधी यात्रियों को न दी जाकर एअर इंडिया कंपनी को राहत पहुंचाने के लिए दी जाती है, जिससे कंपनी के राजसी घाटे की पूर्ति राजकोष से होती रहे। कुछ नेताओं का तो यहां तक कहना है कि यदि केंद्र सरकार देशी-विदेशी एयरलांइस कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के आधार पर किराया दर आमंत्रित करती है तो किराये का मूल्य इतना कम निर्धारित होगा कि छूट नाम-मात्र रह जाएगी। अन्य देशी-विदेशी एयरलाइंस कंपनियां कम किराए पर हज यात्रा की मांग उठाती रही हैं। यदि प्रतिस्पर्धा के जरिए हवाई किराया तय हो जाता है तो हज यात्रियों को सब्सिडी का खात्मा नहीं खलेगा।
अब जबकि सरकार ने हज सब्सिडी खत्म कर दी है, तो उसे चाहिए कि अल्पसंख्यक लड़कियों पर खर्च होने वाला पैसा व्यर्थ न जाने पाए। अल्पसंख्यक समाज की लड़कियों के जीवन स्तर को उठाने और उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए एक वृहद कार्यक्रम तैयार करना होगा। हज सब्सिडी बंद करने के बाद सरकार के पास यह सुनहरा अवसर है कि वह अपने वादे को पूरा कर सके। अल्पसंख्यकों का विकास हमेशा से सरकार के एजेंडे में रहा है। केंद्र सरकार के फैसले पर कुछ लोग विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, मगर सरकार अपने एजेंडे पर आगे बढ़े।
प्रमोद भार्गव (वरिष्ठ पत्रकार)

No ratings yet.

Please rate this

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here