रक्त से नहाया न्यूजीलैंड

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NewZealand Mosque Attacks

राज एक्सप्रेस, भोपाल। धर्मातरण और भूमि जिहाद किसी भी देश या समाज के लिए चिंता का कारण है। इस समस्या का हल भी कई तरीकों से किया जा सकता है। जब कोई सिरफिरा आतंक का रास्ता चुनता है, तो वह पूरी दुनिया के लिए ठीक नहीं है। न्यूजीलैंड की घटना खतरे की घंटी है (NewZealand Mosque Attacks)।

दुनिया का शांत मुल्क कहा जाने वाला न्यूजीलैंड शुक्रवार को रक्त से नहा उठा। न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में अल-नूर और लिनवुड मस्जिद में दोपहर की नमाज के बाद भयंकर गोलीबारी की गई। दो मस्जिदों पर हुए इस हमले में दर्जनों लोगों की मौत हो गई, वहीं 50 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। जिस समय हमला हुआ, उस समय मस्जिद में बांग्लादेश क्रिकेट टीम भी नमाज अदा करने आई थी। फायरिंग के दौरान टीम ने पार्क के रास्ते भागकर जान बचाई। इस घटना के बाद कल से शुरू होने वाला तीसरा टेस्ट मैच रद्द कर दिया गया है। प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने इसे न्यूजीलैंड के सबसे काले दिनों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड में ऐसी हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है, जिसने भी यह कृत्य किया है, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि हमलावर की बंदूक पर दो नाम लिखे थे-एलेक्जेंडर बिसोनेट व लुका ट्रिनी। यह दोनों इटली व कनाडा में मस्जिद पर हमला करने वाले हमलावर थे।

मस्जिद पर इस हमले के पीछे जो वजह सामने आई है वह काफी चौंकाने वाली है। हमलावर ने बाकायदा 37 पन्नों का मैनिफेस्टो जारी कर बताया है कि उसने मस्जिद पर हमला इसलिए किया है क्योंकि यहां के लोग भूमि जिहाद तथा धर्मातरण करते हैं। हमलावर ने सेना की वर्दी पहन रखी थी और उसने दो मैगजीन गोली फायर किया। उसने इसका लाइव वीडियो भी बनाया। मैनिफेस्टो में हमलावर ने लिखा, ‘मैं मुस्लिमों से कतई घृणा नहीं करता हूं, लेकिन उन मुस्लिमों से घृणा करता हूं जो हमारी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं व धर्म परिवर्तन कर रहे हैं।’ भूमि जिहाद तथा धर्मातरण की समस्या से हिंदुस्तान भी जूझ रहा है। हिंदुस्तान में बड़े पैमाने पर मजहबी उन्मादी एक साजिश के तहत भूमि जिहाद तथा धर्मातरण को अंजाम दे रहे हैं। मजहबी चरमपंथियों ने जब न्यूजीलैंड में भूमि जिहाद तथा धर्मातरण की साजिशें रची तो इससे आक्रोशित हमलावर ने कानून अपने हाथ में ले लिया तथा मस्जिद पर भीषण हमला करते हुए दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। हमलावर ने साफ किया है कि उसने यह कृत्य हजारों यूरोपीय नागरिकों की आतंकी हमलों में गई जान का बदला लेने के साथ ही श्वेत वर्चस्व को कायम करने के लिए अप्रवासियों को बाहर निकालने के लिए भी किया है।

उल्लेखनीय है कि खाड़ी देशों और पश्चिम एशियाई देशों जारी सशस्त्र संघर्ष की वजह से यूरोपीय देशों में अप्रवासी शरणार्थियों की काफी आवक हुई है। हाल के दिनों यूरोपीय देशों में इस बात को लेकर चिंता होने लगी है कि जिस रफ्तार से दुनिया भर के अप्रवासी वहां आकर बस रहे हैं। कुछ दिनों में तो ऐसी नौबत आ जाएगी कि यहां के मूल निवासी अपनी ही धरती पर अल्पसंख्यक न हो जाएंगे व अप्रवासी लोग बहुसंख्यक हो जाएंगे। यह समस्या वाजिब है। इसके समाधान के दूसरे विकल्प भी हैं। सरकार खुद इस समस्या से निपटने का रोड मैप बना रही है। तो फिर हिंसा की क्या जरूरत?

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