किडनी के सौदागरों पर नकेल जरूरी

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Human Trafficking

राज एक्सप्रेस, भोपाल। मानव अंगों की तस्करी (Human Trafficking) पर लगाम लगाने के दावों के बीच यूपी के ताजा मामले ने पूरी कवायद को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। कानपुर के एक अस्पताल में चल रहे इस गोरखधंधे की पोल खुलने के बाद पूरे देश में हड़कंप है। साल 1994 में बने ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन आर्गन एक्ट के मुताबिक मरीज का रक्त संबंधी या निकट रिश्तेदार ही उसे किडनी दे सकता है। मगर यह कानून अब भी धरातल पर नहीं दिख रहा है।

किडनी प्रत्यारोपण के तहत इंसान को नई जिंदगी देने वाले कानून को अब मानव तस्करों ने गोरखधंधे में तब्दील कर दिया है। तस्करों ने इस वक्त पूरे देश में शरीर के अंगों के बेचने और खरीदने का बड़ा जाल बिछा रखा है। मोटी रकम देकर इनसे शरीर का कोई भी अंग आसानी से खरीदा जा सकता है। मानव दलालों से संपर्क साधने के लिए खरीददारों की सहायता प्रत्येक नामी अस्पतालों में गुप्त दलाल करते हैं। गुप्त दलालों से परिचय चिकित्सक खुद करा देते हैं। कुल मिलाकर इस गोरखधंधे का बड़ा नेटवर्क स्थापित हो चुका है, जिसे तोड़ना अब बेहद जरूरी हो गया है। मानव अंगों की तस्करी से कमाया मोटा माल सभी में बंटता है जिसमें पुलिस-प्रशासन से लेकर चिकित्सक और दलाल शामिल होते हैं। इनका तंत्र बड़ा मजबूत होता है जिस कारण ही एकाध केस ही सामने आ पाते हैं।

किडनी के संबंध में कानपुर में पिछले दिनों जो मामला सामने आया है। आरोपियों ने कई ऐसे खुलासे किए हैं जिन्हें पुलिस सार्वजनिक भी नहीं कर सकती। अगर पुलिस आरोपियों के सभी खुलासों को बता दें, तो कई सफेदपोश और सरकारी तंत्र एक्सपोज जाएगा। मानव शरीर को जीवित रखने वाला सबसे अहम अंग किडनी की ताजी डरावनी तस्वीर ने चारों ओर हड़कंप मचा दिया है। इस गोरखधंधे में कुछ अस्पतालों के नाम सामने आने के बाद से चिकित्सीय तंत्र में खलबली सी मच गई है। उत्तर प्रदेश के कानपुर से लेकर दिल्ली, कोलकाता देश बड़े महानगरों के अलावा छोड़े शहरों और कस्बों तक मानव अंग की तस्करी की खबर रोंगटे खड़ी कर रही है। दरअसल, मानव तस्करी की कहानी बहुत ही भयाभय करने जैसी होती है। तस्कर कैसे दूर-दराज इलाकों के गरीब तबके के लोगों को चंद पैसों का लालच देकर उनकी किडनी निकालने के बाद अस्पतालों में बेजकर करोड़ों कमाते है।

इस रैकेट की चेन बहुत बड़ी बताई जा रही है। पुलिस-प्रशासन, तस्कर, दलाल, बिचौलिए से लेकर बड़े अस्पतालों के नामी डॉक्टरों के भी शामिल होने की बात कही जा रही है। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह किडनी कांड के कई गुनाहगार पुलिस के हत्थे चढ़े। उनसे जो खुलासा हुआ, वह काफी चौंकाने वाला है। मानव अंग की तस्करी के लिए फर्जी दस्तावेज बनाने के आरोप में पुलिस ने तीन लोगों को धरा है। पुलिस को एक गैर सरकारी अस्पताल की तरफ से शिकायत मिली थी कि अस्पताल में किडनी प्रत्यारोपण के लिए एक मरीज का फर्जी कागजात उन्हें मिला है। तस्कर गरीब एवं जरूरतमंद लोगों को कुछ पैसों का लालच देकर उनकी किडनी ले लेते हैं और मोटी रकम में फर्जी कागजात बनाकर बेच देते हैं। इसके बाद पुलिस हरकत में आई और जाल बिछाकर कई को पकड़ा। तस्करों से पता चला है कि कानपुर और दिल्ली में ही नहीं, बल्कि किडनी गिरोह ने पश्चिम बंगाल और बिहार समेत समूचे हिंदुस्तान में अपना जाल बिछा रखा है।

इसे चिकित्सकीय विज्ञान की नाकामी कहें या सरकार की लापरवाही। किडनी प्रत्यारोपण से जुड़े कानूनों को तस्करों ने तोड़कर चकनाचूर कर दिया है। सारे कानून उनके समक्ष बौने साबित हो रहे हैं। तस्करी की रूप में मानव तस्कर जिन किडनियों की खरीद-फरोख्त करते हैं उनमें सिर्फ दिखावे के लिए ही कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हैं। खामियों को पकड़ा इतना आसान नहीं होता? प्रत्येक प्रक्रियाओं को फॉलो किया जाता है, पर फर्जीवाड़े की कीमत पर। हैं। तस्कर जिससे भी किडनी खरीदते हैं उनको मरीज को फर्जी रिश्तेदार बना लेते हैं। जैसे उनका ब्लड सैंपल बदलकर डोनर, ऑर्गन पाने वाले का रिश्तेदार बन जाता है। इसके बाद किडनी, लीवर सहित दूसरे मानव अंगों की तस्करी आसानी हो जाती है। तब सरकार के बनाए सभी नियम-कानून मुंह ताकते रह जाते हैं। दरअसल, मानव अंगों की तस्करी सबसे ज्यादा रिश्तेदार में होने वाले डोनेशन में ही संभव होती है। उस स्थिति में लोग आसानी से एक टेस्ट के जरिए यह साबित करने में सफल हो जाते हैं कि डोनर, मरीज का करीबी रिश्तेदार है। काफी समय से मांग हो रही है कि इस संबंध में डॉक्युमेंटस की जांच हर स्तर पर और चाक चौबंद तरीके से हो। ताकि किसी भी सूरत में लोगों को नई जिंदगी देने वाले इस तरीके को गोरखधंधा न हो। अभी तक कारगर तरीका नहीं अपनाया गया।

कानपुर किडनी कांड से सात-आठ साल पहले ही अब तक के सबसे बड़े किडनी कांड का पर्दाफाश हुआ था। रैकेट का सरगना किडनी कुमार के नाम से कुख्यात डॉ. अमित कुमार था, जिसे पुलिस ने कुछ समय बाद नेपाल से धरा था। हालांकि, तभी से वह जेल में है। उसने जांच एजेंसियों के समक्ष 300 किडनी प्रत्यारोपण करने की बात स्वीकारी थी।,जबकि उसके गैंग के सदस्य देश के तकरीबन सभी बड़े अस्पतालों में आज भी हैं। उन अस्पतालों में प्रबंधन के अप्रत्यक्ष सहयोग से धड़ल्ले से किडनी एवं मानव शरीर के दूसरे अंगों को खरीदने-बेचने का काम होता है। कोई बिरले ही मामले सामने जा जाते हैं। ताजे प्रकरण में कानपुर के आरोपियों ने दिल्ली के जिन दो बड़े अस्पतालों का नाम लिया है। वह उदाहरण मात्र हैं, जबकि इस गोरखधंधे में हर दूसरा अस्पताल शामिल है। विचारणीय पहलू यह है कि जब दिल्ली के बड़े अस्पताल में ऐसा अवैध कृत्य हो सकता है, तो देश के सुदूर अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर कितनी गड़बड़ियां की जा रही होंगी, अंदाजा लगाना मुश्किल है।

दुख इस बात का है कि किडनी के कारोबार में गाज सिर्फ दलालों पर ही क्यों गिराई जाती है। बड़ी मछली पर कोई हाथ नहीं डालता? यह कैसे संभव है कि बिना अस्पताल प्रबंधन की इजाजत से किडनी का प्रत्यारोपण किया जा सकता है। इस खेल में मुख्य रोल अस्पताल के अंदरूनी लोग ही अदा करते हैं। उन पर आज तक बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। 1994 में बने ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन आर्गन एक्ट के मुताबिक मरीज का रक्त संबंधी या निकट रिश्तेदार ही उसे किडनी दे सकता है। अब इस कारोबार के आरोपी यह काम भी गैरकानूनी ढंग से करवाते हैं और खरीदने व बेचने वाले के बीच संबंध के फर्जी दस्तावेज बनवा देते हैं। इतने बड़े पैमाने पर, इतने सारे गलत काम होते रहे और अस्पताल प्रबंधन को इसकी जानकारी नहीं हुई, यह आश्चर्य की बात है।

किडनी कांड को लेकर एक बात संदेह पैदा करती है कि अस्पताल में जब कुछ भी गलत होता है उसकी जिम्मेदारी प्रबंधन पर होती है। पर जब गड़बड़ी की बात सामने आती है तो, अस्पताल प्रबंधन पुलिस-प्रशासन को मैनेज करने में अपनी भलाई समझते है। फिलहाल ताजे प्रकरण में पुलिस ने इस मामले में कई गिरफ्तारियां की हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस को हर पहलू की गंभीरता से जांच करने को कहा है। केंद्र सरकार भी इस मामले को लेकर गंभीर है। मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी अस्पतालों के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार को संदेह है कि इस कारोबार के तार देश ही नहीं विदेश तक फैले हुए हैं। पता चला है कि किडनी की खरीद-फरोख्त का कार्य करवाने वाले लोग विदेशों से मरीजों को यहां लाकर उनसे एक किडनी के बदले 25-30 लाख रुपए वसूलते हैं, और देश के गरीब लोगों को बहला-फुसलाकर या कई बार धोखे से किडनी देने पर मजबूर कर देते हैं। पूरे मामले को गंभीरात से लेने की जरूरत है। किडनी प्रत्यारोपण कानूनी तरीके से हो, इसकी समीक्षा की जाने की आवश्यकता है।
रमेश ठाकुर (वरिष्ठ पत्रकार)

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