मोदी सरकार ने कश्मीर घाटी में जारी तनाव के बीच नए सिरे से बातचीत शुरू करने का फैसला किया

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मोदी सरकार ने कश्मीर घाटी में जारी लगातार तनाव और अस्थिरता के बीच आखिरकार अब नए सिरे से बातचीत शुरू करने का फैसला किया है। इस संवाद के लिए सरकार ने खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को अपना प्रतिनिधि चुना है, जो राज्य के विभिन्न क्षेत्रों, वर्गो और संगठनों के प्रतिनिधियों से बात करके उनकी शिकायतों और अपेक्षाओं को समझेंगे एवं केंद्र को सिफारिशें पेश करेंगे। ताकि, कश्मीर मुद्दे का व्यापक राजनीतिक समाधान निकल सके। सरकार ने बातचीत का कोई दायरा और समय सीमा तय नहीं की है। घाटी को मौजूदा गतिरोध से बाहर ले आने के लिए किस से बात करना ठीक रहेगा, यह तय करने की पूरी छूट दिनेश्वर शर्मा को हासिल होगी।
कैबिनेट सचिव का दर्जा रखने वाले शर्मा वैसे तो सभी पक्षों से बातचीत करेंगे, लेकिन उनका विशेष फोकस कश्मीरी नौजवानों पर ही होगा। कश्मीर में नौजवानों की बड़ी तादाद ऐसी है, जो हुर्रियत या किसी आतंकवादी संगठन के सीधे समर्थक नहीं हैं, लेकिन सरकार विरोधी प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। जाहिर है कि सरकार के इस फैसले से कश्मीर और दिल्ली के बीच बीते तीन साल में जो संवादहीनता की स्थिति बनी थी, वह निश्चित तौर पर टूटेगी। कश्मीरियों को तनावपूर्ण माहौल से निकालने और तरक्की की राह पर आगे बढ़ाने के लिए बातचीत ही आखिरी रास्ता है। देर से ही सही, अब सही दिशा में पहल हुई है। जिसका सभी को स्वागत करना चाहिए।
यह पहली मर्तबा नहीं है, जब केंद्र सरकार ने कश्मीर समस्या का व्यापक राजनीतिक समाधान खोजने के लिए वार्ताकार की नियुक्ति की हो, बल्कि इससे पहले भी कोशिशें होती रही हैं। पूर्व रक्षामंत्री केसी पंत और जम्मू-कश्मीर के मौजूदा राज्यपाल नरेंद्र नाथ वोहरा केंद्र सरकार के वार्ताकार रह चुके हैं। राजग सरकार ने भी इंसानियत व जम्हूरियत के साथ कश्मीरियत के दायरे में वार्ता करने की हिमायत की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर कश्मीर की सभी पार्टियों और तमाम सामाजिक संगठनों के नुमाइंदों के साथ हुर्रियत को भी बातचीत में शामिल किया गया था। इसके बाद संप्रग-प्रथम सरकार के समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने समस्या को सुलझाने हेतु पांच कार्यकारी समूह बनाए व राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस भी की।
संप्रग-द्वितीय सरकार ने साल-2010 में फिर जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति, स्थिरता और खुशहाली कायम करने और कश्मीर विवाद के हल के नेक मकसद से तीन सदस्यीय वार्ताकारों के एक दल की नियुक्ति की। इस दल में वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर, शिक्षाविद् राधा कुमार और पूर्व सूचना कमिश्नर एमएम अंसारी शामिल थे। वार्ताकारों ने पूरे एक साल कश्मीर घाटी में घूम-घूमकर काम किया। वार्ताकारों ने बातचीत में खास तौर पर आम कश्मीरियों की राय को ज्यादा तवज्जो दी थी। यही वजह है कि रिपोर्ट ज्यादा प्रमाणिक व विश्वसनीय है, लेकिन इस रिपोर्ट और इसकी सिफारिशों पर संजीदगी से अमल नहीं किया गया। हालांकि, इस रिपोर्ट में कई सिफारिशें विवादास्पद भी रहीं।
कश्मीर में बीते एक दशक में यह देखने में आया है कि सेना के बेवजह दखल से सामान्य कामकाज पर पड़ने वाले असर और रोजगार के नए अवसर सृजित कर पाने में सरकार की नाकामयाबी लोगों के गुस्से की बड़ी वजह रही है। लिहाजा, वार्ताकार समूह ने अपनी इस रिपोर्ट में सूबे से विवादास्पद सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम और अशांत क्षेत्र अधिनियम को चरणबद्ध तरीके से हटाने का सुझाव दिया था। वार्ताकारों का मानना था कि फौज सरहदों पर मुस्तैद रहे और शहरी इलाकों में उसकी भूमिका सीमित हो। रिपोर्ट में एक अहम सिफारिश, सूबे के तीनों इलाकों कश्मीर, जम्मू और लद्दाख के लिए विकास परिषदें बनाने और उन्हें क्षेत्रवार अधिकार देना था।
जैसा कि हम जानते हैं देश में बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ापन एक बड़ी समस्या है। जम्मू-कश्मीर भी इससे अछूता नहीं है, बल्कि वहां यह समस्या और भी ज्यादा भयानक है। बीते छह दशक में मरकजी हुकूमतों के तमाम आर्थिक पैकेजों के बाद भी सूबे में बेतहाशा बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ापन है। वार्ताकारों ने अपनी रिपोर्ट में बेरोजगारी के हालात का जिक्र करते हुए वहां बुनियादी ढांचे के विकास की जरूरत को रेखांकित किया था और इसके लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक पैकेज देने की सिफारिश की थी। ताकि, सूबे में जहां पर्यटन को बढ़ावा मिले, वहीं विकास की रोशनी में माहौल बदलने की भी गुंजाइश बन सके। इस बात से भला कौन इत्तेफाक नहीं जताएगा कि जम्मू-कश्मीर के नौजवानों की जरूरतों को नजरअंदाज करके वहां असंतोष को दूर नहीं किया जा सकता।
कश्मीरी नौजवानों में असंतोष का फायदा चरमपंथी बरसों से उठाते रहे हैं। अलगाववादी अकसर ही बेरोजगारी और मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश करते रहे हैं। यदि सरकार रोजगार के अवसर मुहैया कराने और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित कराने में कामयाब हो जाती है, तो सचमुच कश्मीर समस्या का निदान ज्यादा मुश्किल काम नहीं होगा। तीनों वार्ताकारों ने अपनी इस रिपोर्ट में साल-1952 से पहले के हालात को बहाल करने जैसे सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया था। नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस स्वायत्तता की बात करते रहे हैं, जिसमें कश्मीर मामलों में भारतीय संसद, सुप्रीम कोर्ट और संवैधानिक संस्थाओं का न्यूनतम दखल हो। लेकिन उनसे यह पूछा जाना चाहिए, क्या गारंटी है कि घाटी में 1952 जैसी ‘स्वायत्तता’ मिल जाने से सूबे के हर नागरिक को खुशगवार जिंदगी, बुनियादी अधिकार और संपूर्ण संभावनाओं को हासिल कर सकने की आजादी मिल जाएगी?
सच तो यह है कि घाटी के लोग रोज-ब-रोज के बंद-प्रदर्शन और हिंसा, खून-खराबे से तंग आ चुके हैं। पिछले एक साल में आतंकवादी गतिविधियों और आतंक विरोधी अभियान का असर आम लोगों पर पड़ा है। अब वे चाहते हैं कि अमन और खुशहाली वापस लौटे। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और अलगाववादी भले ही ‘स्वायत्तता’ एवं ‘आजादी’ की बात करें, मगर आम कश्मीरी अब यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि इन ताकतों की नुमाइंदगी में उनका मुस्तकबिल महफूज नहीं है। लिहाजा, केंद्र की मोदी सरकार और सूबे की पीडीपी-भाजपा सरकार दोनों के लिए एक अच्छा मौका है, कि वह रोजगार के अवसर मुहैया कराए व नागरिक अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कदम बढ़ाए।
मिसाल के तौर पर पंचायतों और शहरी निकायों को मजबूत करने की पहल से लोगों में विकास कार्यो में सहभागिता का यकीन पैदा होगा। पत्थर फेंकने वाले हाथों को रोजगार मिलेगा, तो वे राज्य व देश की बेहतरी के प्रति सोचेंगे। एक अहम बात और, कश्मीर की बड़ी आबादी पर्यटन के आसरे है, पर हालात सामान्य न होने की वजह से पर्यटक वहां नहीं जा रहे। सरकार को कोशिश करनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लोग कश्मीर पहुंचें। उम्मीद है वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा जब मुख्तलिफ वर्गो के लोगों, सियासी पार्टियों एवं दीगर संगठनों से वार्ता करेंगे, तो यह बातें भी उनके जेहन में रहेंगी।
जाहिद खान (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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