दिल्ली की सेहत बनाए रखना जरूरी, फिर से ऑड-ईवन स्कीम शुरू हो सकती है

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दीपावली के बाद दिल्ली में वायु प्रदूषण के हालात फिर से खराब हो गए हैं। दीपावली पर हुई आतिशबाजी से राजधानी में 24 गुना तक प्रदूषण बढ़ने की रिपोर्ट आई है। पटाखों पर बैन लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की हवा को प्रदूषण मुक्त करना चाहा था, मगर यह काम नहीं आया। अब राजधानी में बढ़ते प्रदूषण के स्तर को देखते हुए फिर से ऑड-ईवन स्कीम शुरू हो सकती है। केजरीवाल सरकार ने इसके लिए दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन और परिवहन विभाग के अफसरों को पत्र लिखा है। परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने कहा कि राजधानी की सड़कों पर गाड़ियों की संख्या पर लगाम लगाने के लिए सरकार ऑड-ईवन के लिए पहल कर रही है। बता दें कि पिछले साल जनवरी और अप्रैल में 15-15 दिन के लिए यह स्कीम लागू की जा चुकी है। वहीं, पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश से आने वाली सरकारी बसों पर बैन लगाने की भी तैयारी की जा रही है। दिल्ली में नागरिक परिवहन के तौर पर फिलहाल डीटीसी की करीब चार हजार और क्लस्टर स्कीम के तहत 16 सौ बसें चलाई जा रही हैं। ऐसे में उत्तरप्रदेश से आने वाली बसें शहर के यातायात को बुरी तरह चरमरा देती हैं। हालांकि, दिल्ली में प्रदूषण का एकमात्र कारण वाहन नहीं हैं। इस समस्या को बढ़ाने में दूसरे कारणों की भी बड़ी वजह है। उन पहलुओं पर भी अब ध्यान देना ही होगा।
यह सही है कि दीपावली की आतिशबाजी के बाद अब दिल्ली में आपदा जैसे हालात बन गए हैं। मगर यह अकेले दिल्ली ही नहीं, देशव्यापी समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने हाल ही में वायु प्रदूषण को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें 2008 से 2015 के बीच 91 देशों के 16 सौ शहरों में वायु प्रदूषण का ब्यौरा दिया गया था। रिपोर्ट में दुनिया के 20 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से 13 शहर भारत के थे। ग्वालियर को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताते हुए इलाहाबाद, पटना, लुधियाना, कानपुर और रायपुर जैसे शहरों के बाद दिल्ली को भी इसी श्रेणी में शामिल किया गया था। दिल्ली के पर्यावरण को बड़ा खतरा सार्वजनिक परिवहन की अपर्याप्तता से ही है। इसीलिए निजी वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है और धुएं के कारण वायु प्रदूषण फैलता जा रहा है। बढ़ते वायु प्रदूषण की एक वजह यह भी है कि सड़कों और मेट्रो रेल लाइन के विस्तार के कारण पेड़-पौधे लगातार नष्ट किए गए हैं। वायु प्रदूषण संबंधी पिछले दो-तीन साल के आंकड़े गवाह हैं कि दिल्ली में सांस और दमे के दर्जनों मरीज दम तोड़ रहे हैं। उन बच्चों की स्थिति तो और भी खराब है, जिनके नाजुक फेफड़े इस प्रदूषण को झेलने में अक्षम हैं। यह एक कड़वा सच है कि दिल्ली का पर्यावरण कुछ तो नगर के अनियोजित विकास की भेंट चढ़ रहा है तथा बचे-खुचे पर्यावरण को वहां वाहनों की बढ़ती संख्या, फसलों के अवशेषों को जलाने से उठने वाला धुआं और आतिशबाजी लील रही है।
बढ़ते वाहनों के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। ट्रैफिक जाम के कारण दिल्ली जैसे शहरों में न केवल लोगों का समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। सेंटर फॉर ट्रांसफार्मिग इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि ट्रैफिक जाम से दिल्ली जैसे शहर में 10 करोड़ रुपए की वार्षिक हानि लोगों को झेलनी पड़ती है। हालांकि, पिछले साल भी दिल्ली सरकार के ऑड-ईवन प्रयोग ने वायु प्रदूषण और ट्रैफिक जाम पर लगाम लगाने की कोशिश की थी, मगर कोई खास कामयाबी नहीं मिल सकी थी। अब इस साल फिर सरकार उसी व्यवस्था को लागू करने जा रही है। बहरहाल, डब्लूएचओ की रिपोर्ट को केंद्र में रखकर जब हम शहरों की वास्तविक स्थिति से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो यह पता चलता है कि देश की कुल आबादी का 35 फीसदी हिस्सा शहरों में रहता है। यह शहरी वर्ग सकल घरेलू उत्पाद का मात्र छह फीसदी पैदा कर पाता है। वहीं, राजस्व में इसका योगदान 90 फीसदी है। दुनिया के बीस में से सबसे अधिक आबादी वाले पांच शहर भारत में हैं। अर्थात, आज के महानगरों की आबादी का 65 फीसदी हिस्सा दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में निवास करता है। यानी, भारत में शहरी आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे वर्ष 2030 तक इसके 70 फीसदी से अधिक हो जाने का अनुमान है। शहर गगनचुंबी इमारतों, सड़कों, पार्को और चम-चमाती कारों का ही ढांचा मात्र नहीं हैं, बल्कि वे तो विकास के बड़े केंद्र भी हैं। इसलिए शहरों के विकास के साथ हमें वहां एक ऐसी प्रदूषण-मुक्त संस्कृति विकसित करनी पड़ेगी, जहां लोगों का निजी वाहनों पर दबाव कम हो और प्रकृति के साथ तारतम्य अधिक हो।
प्रदूषण और पर्यावरण का सीधा संबंध मनुष्यों से है। जब प्रदूषण कम होता है, तो पर्यावरण हमारे अनुकूल होता है और जब पर्यावरण बिगड़ता है, तो हम प्रदूषण की मार झेलते हैं। विकास की अंधी दौड़ में जुटे लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए प्रकृति के दोहन की आदत छोड़नी पड़ेगी। हमें याद रखना होगा कि प्रकृति हमें सिर्फ देती है, लेती कुछ नहीं। इसलिए हमारा भी दायित्व होना चाहिए कि हम उसका दुरुपयोग न करें। ग्लोबल वार्मिग के जो संदेश हमें मिल रहे हैं, वह सिर्फ सजग करने के लिए हैं। अगर हम अब भी नहीं चेते, तो फिर प्रकृति अपने हिसाब से हमें बदलाव करने पर मजबूर करेगी।
डॉ. सीमा राजदेव (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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