ट्रंप को भारत का करारा जवाब

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USA INDIA Relations

राज एक्सप्रेस,भोपाल। अमेरिका एक तरफ तो भारत  (USA INDIA Relations) के साथ आगे बढ़ने की वकालत करता है, तो दूसरी तरफ अफगानिस्तान में भारत द्वारा किए जा रहे प्रयासों की खिल्ली उड़ाता है। दरअसल, अमेरिका का ऐसा करना उसकी कुंठा को जाहिर करता है। सेना को अफगानिस्तान से वापस बुलाने के फैसले के बाद अमेरिका आलोचना के निशाने पर है, तो तालिबान के सफाये की विफलता भी उसे परेशान किए है।

अफगानिस्तान के मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तंज को (USA INDIA) भारत ने गंभीरता से लेते हुए उचित प्रतिवाद किया है। भारत ने ट्रंप को करारा जवाब देते हुए कहा है कि अफगानिस्तान में उसकी भूमिका सिर्फ पुस्तकालय के निर्माण या उसके वित्त पोषण तक सीमित नहीं है बल्कि वह कई निर्माण परियोजनाओं के जरिए अफगानिस्तान की सूरत और सीरत बदलने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अफगानिस्तान में लोगों की जरूरतों के मुताबिक सामुदायिक विकास कार्यक्रमों को लागू कर रहा है और उसका प्रयास तब तक जारी रहेगा जब तक अफगानिस्तान में स्थिरता नहीं आ जाती। यह जानना आवश्यक है कि चंद रोज पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत द्वारा अफगानिस्तान में एक लाइब्रेरी फंड करने को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसते हुए उनका मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि अफगानिस्तान में पुस्तकालय का कोई इस्तेमाल नहीं है। दरअसल ट्रंप की खिसियाहट यों ही नहीं है। जब से उन्होंने अफगानिस्तान से सात हजार सैनिकों को वापस बुलाने की बात कही है तब से उनकी आलोचना हो रही है।

ट्रंप के इस रुख से न सिर्फ अफगानिस्तान का भविष्य संकट दांव पर लग गया है बल्कि देश दुनिया में यह भी संदेश गया है कि अफगानिस्तान से तालिबान को उखाड़ फेंकने में अमेरिका नाकाम रहा और वह घुटने के बल आ गया है। इस आलोचना से चिंतित ट्रंप विचलित है और अपनी रणनीतिक-कूटनीतिक विफलता को छिपाने के लिए कि अफगानिस्तान में भारत की भूमिका पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जबकि वह अच्छी तरह से यह बात जानते हैं कि भारत दशकों से अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभा रहा है। यहां जानना आवश्यक है कि अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों की विदाई के बाद फिलहाल सुरक्षा की जिम्मेदारी अफगान सुरक्षा बल के तीन लाख 50 हजार जवानों के कंधों पर है। गौरतलब है कि अमेरिकी नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएसएएफ) के युद्धक अभियान की जगह नाटो के ‘प्रशिक्षण एवं सहयोग’ अभियान ने ले लिया है। हालांकि अफगानिस्तान में अभी भी 12 हजार 500 विदेशी सैनिकों की मौजूदगी बनी हुई है लेकिन वह प्रत्यक्ष तौर पर युद्ध में शामिल होने के बजाए अफगान सेना और पुलिस को तालिबान के खिलाफ लड़ने में मदद करते हैं।

अमेरिका को लगने लगा है कि नाटो के 4000 से अधिक सैनिकों की जिंदगी गंवाने के बाद भी अफगानिस्तान से तालिबान को खदेड़ना संभव नहीं है। लिहाजा वह तिलमिलाया है और अपनी नाकामी छिपाने के लिए किस्म-किस्म का कारण ढूंढ रहा है। लेकिन गौर करें तो अगर अफगानिस्तान में अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी है और तालिबान की मौजूदगी बनी हुई है तो इसके लिए खुद उसकी अफ-पाक नीति जिम्मेदार है। यह किसी से छिपा नहीं है कि अफगानिस्तान में अराजकता व अशांति के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर हक्कानी समूह जैसे अनगिनत आतंकी संगठन अफगानिस्तान में तबाही मचाए हुए हैं। ये संगठन कई बार अमेरिका व भारतीय दूतावासों को भी निशाना बना चुके हैं। गौरतलब है कि अमेरिका ने अफ-पाक नीति में पाकिस्तान को महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की थी। इस नीति के जरिए उसका मकसद दक्षिणी अफगानिस्तान से लगे पाकिस्तानी सीमावर्ती क्षेत्रों में जहां तालिबानों के एक प्रभावशाली समूहों को शरण प्राप्त है, उस पर नियंत्रण करना था। लेकिन पाकिस्तान की दगाबाजी के कारण उसकी अफ-पाक नीति विफल रही। जिस पाक को अमेरिका हर वर्ष अरबों डॉलर की मदद देता रहा है, उस पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में आतंकियों के विरुद्ध सिर्फ दिखावे की कार्रवाई की।

याद होगा अभी चंद माह पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के दोहरे रवैए को उजागर करते हुए कहा था कि उसने आतंकवाद से लड़ने के नाम पर 15 साल में 33 अरब डॉलर यानी दो लाख दस हजार करोड़ रुपए की सहायता ली है, लेकिन वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के बजाए आतंकवादियों की ही मदद की है। ट्रंप ने यह भी कहा कि पाक झूठा और कपटी है और वह अमेरिका को सिर्फ धोखा देने का काम किया है। सवाल लाजिमी है कि फिर ट्रंप पाक की गर्दन दबोचने के बजाए अफगानिस्तान में भारत की भूमिका पर तंज क्यों कस रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान से लड़ने के लिए अपनी सेना नहीं भेजी इसलिए ट्रंप नाराज हैं? बहरहाल उनकी नाराजगी का जो भी कारण रहा हो पर एक बात स्पष्ट है कि अपुगानिस्तान में अमेरिका की नाकामी का मूल कारण पाकिस्तान है, जो उसकी आंख में धूल झोंकता रहा बावजूद इसके उसे अमेरिकी सहायता मिलती रही। हां, यह सही है कि अमेरिकी नेतृत्ववाली नाटो सेना अफगानिस्तान में हजारों तालिबानी आतंकियों को मौत की नींद सुलाने में सफल रही लेकिन सच यह भी है कि में इस हमले में हजारों निदरेष अफगान सैनिकों और नागरिकों का भी खून बहा है। गौर करें तो आज की तारीख में अफगानिस्तान में अमेरिका की स्थिति खलनायक जैसी बन गई है वहीं दूसरी ओर तालिबानियों से अफगानी जनमानस का जुड़ाव बढ़ गया है। ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले वर्षो में तालिबान की ताकत बढ़ेगी और भारत के लिए उसे नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।

यहां समझना जरूरी है कि जब तालिबान से रूस, ईरान, चीन और पाक सरीखे देश वार्ता को तैयार हैं तो फिर भारत तालिबान से दुश्मनी क्यों मोल ले। यह उचित रहा कि गत माह भारत ने अफगानिस्तान समस्या पर मास्कों में संपन्न वार्ता में हिस्सा लिया और सुनिश्चित किया कि वह अफगानिस्तान समस्या का समाधान अफगानियों की अगुवाई में ही देखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए रूस की ओर से आहूत की गई इस वार्ता में भारत के अलावा अफगानिस्तान, ईरान, चीन और पाक समेत कई अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की। तालिबान की ओर से उसके राजनीतिक प्रकोष्ठ के प्रमुख अब्बास तनिकजाई की अगुवाई में पांच सदस्यों ने शिरकत की। फिलहाल कहना मुश्किल है कि इस वार्ता के नतीजे कितने फलदायी होंगे लेकिन अगर तालिबान के साथ वार्ता आगे बढ़ती है तो भारत को अफगानिस्तान में सक्रियता बढ़ाने का आधार रहेगा। ध्यान देना होगा कि अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर सर्वाधिक चोट तालिबान द्वारा ही किया जाता है ऐसे में अगर तालिबान और भारत के बीच विश्वास बढ़ता है तो अफगानिस्तान में भारतीय हित सुरक्षित रहेंगे। भारत को तालिबान को साधना इसलिए भी आवश्यक है कि तालिबान को पाकिस्तान का प्रश्रय प्राप्त है और उसके इशारे पर ही भारत के कार्यक्रमों में विध्न डालता है।

ध्यान देना होगा कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को सबसे पहले मान्यता सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बाद पाकिस्तान की सरकार ने ही दी। 27 सितंबर 1996 को तालिबान नागरिक सेना द्वारा काबुल पर कब्जा किए जाने के बाद से पाक लगातार तालिबान का समर्थन करता आ रहा है। यहां यह भी समझना होगा कि अफगानिस्तान के एक-तिहाई भूभाग पर तालिबानियों ने कब्जा कर रखा है और अफगान सरकार की सत्ता देश की राजधानी काबुल तक सिमटकर रह गई है। अगर भारत इस वार्ता में शामिल नहीं होता तो तालिबान को निकट से समझने का मौका नहीं मिलता और न ही अफगानिस्तान में भारतीय हितों की सुरक्षा की संभावना मजबूत होती। अब अगर ट्रंप अफगानिस्तान में भारत की भूमिका पर सवाल दागते हैं या तो अपनी ही जगहंसाई करा रहे हैं।
अरविंद जयतिलक (वरिष्ठ पत्रकार)

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