मानव विकास में भारत पिछड़ा

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Human Development Index

राज एक्सप्रेस, भोपाल। मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) में भारत 189 देशों में 130वें स्थान पर है। वहीं हांगकांग 7वें स्थान पर है, जबकि सिंगापुर 9वें स्थान पर है। मामले में चीन 86वें स्थान पर है। सूचकांक में भारत की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए राज्यों को उनके अंकों के आधार पर रैंकिंग दी गई है। कई राज्यों के काम करने का तरीका बेहतर है, तो कई का फिसड्डी। यह बताता है कि जब तक पूरा देश मिलकर काम नहीं करेगा, तब तक सुधार मुमकिन नहीं है।

ग्लोबल डेटा लैब ने हाल ही में साल 1990 से वर्ष 2017 के दौरान भारतीय राज्यों से जुड़े उप-मानव विकास सूचकांक से संबंधित आंकड़े जारी किए हैं, जिसके जरिए भारत के राज्यों में मानव विकास के संबंध में दिलचस्प तथ्यों का पता चला है। वर्ष 1990 से वर्ष 2017 के दौरान मानव विकास के मामले में काफी सुधार हुआ है। उदाहरण के तौर पर इस अवधि में भारत का मानव विकास सूचकांक मूल्य 0.427 से बढ़कर अब 0.640 हो गया है। बावजूद इसके, इस समय एशियाई व विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देशों में मानव विकास के संदर्भ में भारत की स्थिति उत्साहजनक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी के मुताबिक मानव विकास सूचकांक में भारत 189 देशों में 130वें स्थान पर है। वहीं हांगकांग 7वें स्थान पर है, जबकि सिंगापुर 9वें स्थान पर है। मामले में चीन 86वें स्थान पर है।

मानव विकास सूचकांक की रैंकिंग के तहत इंसान की लंबी आयु, स्वस्थ जीवन और शिक्षा पाने की सहूलियत आदि मानकों को ही रैंकिंग का पैमाना बनाया जाता है। कुछ मानकों में भारत का प्रदर्शन वर्ष 1990 से 2017 के बीच सराहनीय रहा है, जैसे भारत में जीवन प्रत्याशा के मामले में लगभग 11 वर्षो की बढ़ोतरी हुई है। इतना ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा के दौरान स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। अब स्कूल जाने वाले बच्चे स्कूलों में वर्ष 1990 की तुलना में 4.7 साल ज्यादा समय तक पढ़ाई कर रहे हैं। अत: यह सूचकांक शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीवन प्रत्याशा जैसे त्रि-स्त्रीय आयामों का मूल्यांकन करता है। इस सूचकांक में शिक्षा शुरू करने की उम्र छह वर्ष माना गया है, वहीं स्कूली शिक्षा पूरी करने की अधिकतम उम्र सीमा 25 वर्ष मानी गई है। ‘स्वास्थ्य’ संकेतक के तहत जन्म के समय जीवन प्रत्याशा को मापा जाता है, जबकि जीवन स्तर को प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के द्वारा मापा जाता है।

मानव विकास सूचकांक के संबंध में भारत की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए राज्यों को उनके अंकों के आधार पर रैंकिंग दी गई है। वर्ष-2017 के मानव विकास सूचकांक अंक के अनुसार केरल, गोवा और पंजाब जैसे राज्य क्रमश: शीर्ष तीन स्थानों पर हैं, जबकि बिहार, उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश क्रमश: सबसे निचले पायदान पर आए है। मानव विकास सूचकांक में दक्षिण राज्यों के बेहतर प्रदर्शन का मुख्य कारण वहां जनसंख्या वृद्धि की गति का कम होना है। इसकी वजह से वहां बुजुर्गो की आबादी में बढ़ोतरी हो रही है साथ ही साथ जनसंख्या के अंतर राज्य पलायन में वृद्धि हो रही है। इस क्रम में दूसरे राज्यों के रीति-रिवाजों का प्रभाव भी दक्षिणी राज्यों के सामाजिक जीवन पर देखा जा रहा है।

अगर वर्ष 1990 से 2017 के दौरान राज्यों के बीच रैंकिंग में आ रहे बदलाव को देखें तो हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु व कर्नाटक आदि की रैंकिंग में इस अवधि में उल्लेखनीय उछाल देखा गया है, जबकि अधिकांश उत्तर पूर्वी राज्यों जैसे, नागालैंड, मेघालय और मणिपुर तक की रैंकिंग में गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, उत्तरप्रदेश और बिहार पिछले 27 वर्षो से लगातार निचले स्तर पर बने हुए हैं। एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि जो राज्य 1990 के दशक के दौरान मानव विकास सूचकांक के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन कर रहे थे, वे वर्ष-2014 से सामाजिक मानदंडों को सुधारने की दिशा में काफी बेहतर काम कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर इस मोर्चे पर कुल 25 राज्यों के बीच राजस्थान, उत्तरप्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश ने सबसे बड़ी छलांग लगाई है।

सामाजिक क्षेत्र में खर्च अब बढ़ने से मानव विकास सूचकांक की रैंकिंग में गिरावट आई है या नहीं का पता करने के लिए वर्ष 1990 से वर्ष 2017 के दौरान कंपाउंड ऐनुअल ग्रोथ रेट (सीएजीआर) में हुए विकास और सामाजिक व्यय का विश्लेषण किया गया, जिसमें सामाजिक व्यय में वृद्धि और मानव विकास सूचकांक में सुधार के बीच के सह-संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। ऐसी स्थिति से यह पता चलता है कि राज्यों में संस्थागत अड़चन, जागरूकता की कमी और कार्यान्वयन में परेशानी आदि अभी भी बरकरार है। देश में सामाजिक स्तर पर हो रहे खर्च का लाभ भी असमान है। कुछ राज्य जैसे, हरियाणा को सामाजिक स्तर पर हो रहे खर्च का ज्यादा लाभ मिल रहा है, जबकि असम जैसे राज्य इसका फायदा नहीं उठा पा रहे हैं।

मानव विकास सूचकांक को क्षेत्रवार बांटा गया है। ये क्षेत्र हैं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, और भौगोलिक आधार पर उत्तर-पूर्व। औसत अंक का अनुमान संबंधित क्षेत्रों के प्रदर्शन के आधार पर लगाया जाता है। क्षेत्रवार मानव विकास सूचकांक के अंक के आधार पर कहा जा सकता है कि दक्षिणी और उत्तरी राज्य मामले में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि पूर्वी राज्यों का प्रदर्शन उम्दा नहीं है। पूर्वी क्षेत्र और दूसरे राज्यों के बीच की खाई वर्ष 2014 तक बढ़ती रही, लेकिन वर्ष 2015 के बाद से वह या तो पूर्व की स्थिति में है या उसमें गिरावट आई है। ऐसा होने का मुख्य कारण पूर्वी राज्यों, मसलन ओडिशा और बिहार में उच्च आर्थिक विकास का होना है। उत्तर-पूर्वी राज्य, जो कभी मानव विकास सूचकांक के मामले में बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे के प्रदर्शन में हाल में गिरावट दर्ज की गई है और ऐसे राज्यों में मानव विकास सूचकांक के मूल्य में गिरावट दर्ज की जा रही है। भारत एक बड़ा देश होने के साथ-साथ विविधताओं से परिपूर्ण है। इस देश के कई राज्य क्षेत्रफल व आबादी के दृष्टिकोण से कई देशों से बड़े हैं। कुछ राज्य सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी अच्छी स्थिति में हैं, वहीं कुछ राज्यों की स्थिति बहुत ही खराब है।

मानव विकास सूचकांक को बेहतर करने और लोगों को स्वस्थ रखने के लिए सितंबर-2018 में केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत योजना या प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू की थी, जिसके तहत 10 करोड़ से अधिक गरीब और कमजोर परिवारों को प्रति वर्ष पांच लाख रुपए तक माध्यमिक और तृतीयक स्तर के अस्पतालों में इलाज की सुविधा उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है। यह दुनिया की अब सबसे बड़ी सरकारी वित्त पोषित स्वास्थ्य देखभाल योजना है। फिलहाल, इस योजना को लागू करने की प्रक्रिया प्रारंभिक स्तर पर है, लेकिन उम्मीद है कि एक बार पूरी तरह से इस योजना के राज्यों में लागू हो जाने के बाद बड़े स्तर पर आम लोगों के स्वास्थ्य में बेहतरी आएगी इसका अनुमान स्वत: लगाया जा सकता है, जिससे मानव विकास सूचकांक में भी सुधार आएगा।

मानव विकास सूचकांक में भारत की स्थिति में सुधार की हम बातें चाहे जितनी करें, मगर सफलता तब तक नहीं मिलेगी, जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर काम नहीं किया जाएगा। आज देश में शिक्षा और स्वास्थ्य की क्या हालत है, यह किसी से छिपा नहीं है। केंद्र सरकार की योजनाओं का जब तक प्रदेशों में शत-प्रतिशत क्रियान्वयन नहीं किया जाता तब तक बदलाव आ पाना मुमकिन नहीं है। राज्यों को सोचना होगा कि वे केंद्र सरकार की योजनाओं को पार्टी के नजरिए से न सोचें। अभी आयुष्मान भारत योजना का जो हाल है, वह बताता है कि हम मानव सूचकांक में सुधार के प्रति किस हद तक लापरवाह हैं। मगर अब यह धारणा बदलनी होगी, तभी बदलाव के आसार दिखेंगे।
सतीश सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)

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