सामाजिक समरसता की प्रतीक होली

0
17
Holi Festival

राज एक्सप्रेस, भोपाल। देश में मनाए जाने वाले तमाम त्यौहारों में होली (Holi Festival) एक ऐसा पर्व है, जो धार्मिक मान्यताओं से इतर विभिन्न धर्मो के लोगों को आपस में जोड़ने का भी महत्वपूर्ण काम करता है। चाहे मुगल बादशाह रहे हों या फिर राजपूत, हर किसी के लिए होली पसंदीदा त्यौहार रहा है। उर्दू शायरों से लेकर हर एक की नज्म में होली को विशेष स्थान दिया गया है। एक तरह से कहा जा सकता है कि होली सामाजिक समरसता की सबसे बड़ी प्रतीक है।

हमारे देश में वैसे तो सभी त्यौहार, एक-दूसरे धर्म के लोग आपस में मिल-जुलकर प्रेम भाव व सद्भाव से मनाते हैं। एक-दूसरे के त्यौहार में उत्साह व उमंग से शामिल होते हैं, लेकिन देश में मनाए जाने वाले तमाम त्यौहारों में होली एक ऐसा त्यौहार है, जो धार्मिक मान्यताओं से इतर विभिन्न धर्मो के लोगों को आपस में जोड़ने का भी महत्वपूर्ण काम करता है। मुस्लिम और सिख भी बिना किसी धार्मिक भेदभाव के अपने हिंदू भाइयों के साथ होली को जोश-ओ-खरोश से मनाते हैं। होली दिलों की दूरियों को कम करने का एक जरिया बन जाती है। लोग आपस में गले मिलकर सभी पुराने मतभेद, गिले-शिकवे भुला देते हैं। आम हो या फिर खास होली पर्व हमेशा से सभी का पसंदीदा त्यौहार रहा है। मुगल सल्तनत काल में भी विभिन्न हिंदू तथा मुस्लिम त्यौहार जबरदस्त उत्साह और बिना किसी भेदभाव के शासकों द्वारा मनाए जाते थे। होली को मुगलों ने राजकीय मान्यता दी थी। मुगल दरबार में कई दिनों तक होली का जश्न मनाया जाता था। अमीर उमराव भी राज्य के सामान्य जन के साथ होली में शामिल होते। मुगल शहंशाह न सिर्फ खुद उत्साह से होली खेलते थे, बल्कि अपनी हिंदू रानियों को भी होली खेलने से नहीं रोकते थे।

धर्म को लेकर बेहद कट्टरपंथी माने जाने वाले मुगल बादशाह औरंगजेब की हुकूमत में भी होली का त्यौहार पूरी श्रद्धा और उमंग से मनाया जाता था। इस उत्सव में मुस्लिम कुलीनजन अपने हिंदू भाइयों के साथ खुले दिल से शामिल होते थे। औरंगजेब के जीवनी लेखक भीमसेन ने किताब में उल्लेख किया है कि ‘औरंगजेब की हुकूमत के दौरान होली के पर्व पर खान जहान बहादुर कोटलाशाह राजा सुब्बान सिंह, राय सिंह राठौर, राय अनूप सिंह और मोकहम सिंह चंद्रावत के घर जाकर रंग पर्व का आनंद उठाते थे, जिसमें भी खान बहादुर के बेटे मीर अहसान और मीर मुहसिन होली खेलते समय राजपूतों की बनिस्बत ज्यादा जोश से भरे रहते।’ औरंगजेब के परिवार के मेंबर उनकी नाराजगी के बावजूद होली समारोहों में जोश-खरोश से शामिल होते थे। मिर्जा कतील की किताब ‘हफ्त तमाशा’ जो कि अठारहवीं सदी के आस-पास लिखी गई है। इसमें मिर्जा कतील ने होली पर्व पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। वे कहते हैं कि ‘अफगानों और कुछ विद्वेष रखने वाले लोगों के अलावा सब मुसलमान होली खेलते थे। कोई छोटा-सा-छोटा व्यक्ति भी बड़े-से-बड़े संभ्रांत आदमी पर रंग डालता था, तो वह उसका बुरा नहीं मानता था।’

मुगल बादशाहत में ही नहीं, बल्कि बंगाल में भी मुस्लिम नवाब मुर्शीद कुली खान, अली वरदी, सिराजुद्दौला और मीर जाफर होली का त्यौहार धूमधाम से मनाया करते थे। इतिहास की किताबों में यह साफ-साफ ब्यौरा मिलता है कि अली वरदी के भतीजों शहमत जंग और सबलत जंग ने भी एक बार मोती झील के बगीचे में लगातार सात दिन तक होली मनाई, जहां रंगों का त्यौहार मनाने के लिए रंगीन पानी और अबीर का ढेर तथा केसर तैयार कर रखा गया था। होली की बात हो और अवध का जिक्र न हो, ऐसा हो नहीं सकता। अवध के नवाब हमेशा विभिन्न उत्सवों में अपनी प्रजा के साथ त्यौहारों में शामिल होते थे। उनके दरबार में होली की महफिलें सजतीं थी, जिसमें लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते। यह तो बरतानवी इतिहासकार और हिंदू-मुस्लिम कट्टरपंथी थे, जिन्होंने एक साथ मिलकर इतिहास का विकृतिकरण किया और समरसता के इस माहौल को मटियामेट कर दिया। वरना यह माहौल आगे चलकर हिंदू एवं मुस्लिम को आपस में एक-दूसरे से और भी अच्छी तरह से जोड़ता। एक-दूसरे के प्रति मन में आज जो भ्रांतियां और शक की दीवारें खड़ी की गईं हैं, उसके पीछे धार्मिक असहिष्णुता नहीं, बल्कि सियासी मायने ज्यादा हैं।

होली पर्व के प्रति मुस्लिम शासकों की ही अकेले उदार दृष्टि नहीं थी, उर्दू अदीब भी इस त्यौहार से काफी प्रभावित थे। यही वजह है कि उर्दू अदब में दीगर त्यौहारों की बनिस्बत होली पर खूब लिखा गया है। होली, शायरों का पसंदीदा त्यौहार रहा है। उर्दू शायरों की ऐसी कई मस्नवियां मिल जाएंगी, जिनमें होली के तमाम रंग और त्यौहार का उल्लास बेहतरीन तरीके से सामने आया है। मीर, कुली कुतबशाह, फायज देहलवी, नजीर अकबरावादी, महजूर व आतिश जैसे अनेक बड़े शायरों ने होली त्यौहार पर कई शाहकार रचनाएं लिखी हैं। उश्रर भारत के शायरों में अमूमन सभी ने होली के रंग की फुहारों को अपने शेरों में बांधा है। अठाहरवीं सदी के शुरुआत में दिल्ली में हुए शायर फायज देहलवी ने नज्म ‘तारीफे-होली’ में दिल्ली की होली का मंजर बयां करते हुए लिखा है-‘ले अबीर और अरगजा भर कर रूमाल/ छिड़कते हैं और उड़ाते हैं गुलाल/ज्यूं झड़ी हर सू है पिचकारी की धार /दौड़ती हैं नारियां बिजली की सार।’ हातिम भी इसी दौर के एक बड़े शायर थे। उन्होंने भी होली पर नज्में-गजलें लिखी हैं। उनकी जबान बड़ी सादा थी। होली पर लिखी एक नज्म में हातिम कहते हैं-‘मुहैया सब है अब अस्बाबे-होली/उठो यारो भरो रंगों से झोली/इधर यार और उधर खूंबा सफआरा/तमाशा है तमाशा।’ शायरों के शायर मीर का अदब उठाकर देखें, तो उसमें भी होली पर दो मस्नवियां और एक गज़ल मिल जाती है।

‘होली’ शीर्षक पैंतालीस शेयरों की उनकी एक लंबी मस्नवी में आसफउद्दौला के दरबार की होली का विस्तृत वर्णन मिलता है। होली को वे कुछ इस अंदाज में बयां करते हैं-‘होली खेला आसफउद्दौला वजीर/रंग सुहबत से अजब है खुदरे-पीर।’ मीर की एक और अन्य मस्नवी ‘साकीनामा होली’ में भी होली पर्व की बहारें देखने को मिलती है-‘आओ साकी, शराब नोशा करें/शोर सा है जहां में गोश करें/आओ साकी, बहार फिर आई/होली में कितनी शादियां लाई।’लखनऊ निवासी शायर महजूर ने भी होली पर खूब नज्में लिखी हैं। उनकी होली नज्में भी खूब प्रसिद्ध हैं। ‘नवाब सआदत की मजलिसे होली’ शीर्षक से लिखी अपनी नज्म की शुरूआत महजूर कुछ इस तरह से करते हैं-‘मौसमे-हाली का तेरी बज्म में देखा जो रंग।’ आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ‘जफर’ भी होली पर लिखने से खुद को नहीं बचा पाए। ‘जफर’ ने नज्मों और गजलों से इतर होली पर कई फागें लिखीं। यह फागें भी स्थानीय जबान ब्रज में लिखी गई हैं। उनकी ऐसी ही एक मशहूर फाग है-‘‘क्यों मो पे रंग की मारी पिचकारी/देखों कुंवर जी दूंगी मैं गारी/भाग सकूं मैं कैसे मो सों भागा नहिं जात/ठाड़ी अब देखूं और को सन्मुख आत/बहुत दिनन में हाथ लगे हो कैसे जानू दूं/आज फगवा तोसों का था पीठ पकड़कर लूं।’

दक्षिण भारत के प्रमुख शायर कुली कुतबशाह को भी त्यौहारों की गहरी समझ थी। यही वजह है कि उनकी शायरी में यह बार-बार आता है। अपनी होली विषयक नज्म में कुली कुतबशाह लिखते हैं-‘बसंत खेलें इश्क की आ पियारा/ तुम्हीं मैं चांद में हूं जूं सितारा/ जीवन के हौज खाने में रंग मदन भर/सू रोमा रोम चर्किया लाए धारा/नबी सदके बसंत खेल्या कुतब शाह/रंगीला हो रहिया तिरलोक सारा।’ इन सब शायरों के अलावा इंशा और ताबां जैसे शाइरों ने भी होली पर नज्में लिखी हैं। ख्वाजा हैदर अली जिन्हें हम ‘आतिश’ के नाम से जानते हैं, उनके दीवान में भी होली पर कई शेर मिल जाते हैं। अपने होली को इस अंदाज में मनाने का आहृान करते हैं-‘खाके-शहीदे-नाज से भी होली खेलिए/रंग इसमें है गुलाल का, बू है अबीर की।’
जाहिद खान (वरिष्ठ पत्रकार)

No ratings yet.

Please rate this

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Enter Captcha Here : *

Reload Image