लोकमंगलकारी हैं भगवान श्रीराम

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Lord Shriram

राज एक्सप्रेस, भोपाल। भगवान श्रीराम (Lord Shriram)जनमानस के रोम-रोम में बसे हैं। वे हमारे तारनहार हैं। जन्म से लेकर हमारी अंतिम यात्रा तक राम हम से सहज भाव से गुंथे रहते हैं। वे एक तरफ तो दुष्टों का दमन करने के लिए दृढ़संकल्पित हैं, तो दूसरी ओर आत्मानुशासन में बंधे हुए भी। वे इसीलिए हमारे रोम-रोम में रहते हैं कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और हमें अपने कार्य से शिक्षा देते हैं।

श्यामाभिरामं नयनाभिरामं गुणाभिरामं वचनाभिरामं
विश्वप्रणामं कृतभक्तिकामं श्रीरामचंद्रं सततं नमामि।

क्या राम, इंसानियत की अस्मिता हैं? क्या वे हमारे मन-मानस में इतने रचे-बसे हैं कि ‘राम-राम’ के आदि-अभिवादन से लेकर ‘राम नाम सत्य है’ की अंतिम आर्तपुकार तक हम इस मूल-ब्रह्मतत्व को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार रेखांकित करते रहते हैं? पुरानी पहचान है उनसे, जिसे मानस रचनाकार तुलसीदास ने विनय पत्रिका में इन शब्दों में व्यक्त किया है:-

तुलसी तो सों राम सों कछु नई न जान-पहिचानि!

क्या हम राम को केवल जपते ही हैं? जी नहीं। हम तो उन्हें जीते हैं। हे राम! उनका आवाहन है। जय राम! उनकी स्तुति है, जय जय राम! समर्पण है। ‘जय राम सियाराम जय जय राम’ एक पूर्ण मंत्र है, जिसके तेरह अक्षर कार्य सिद्धि की गारंटी हैं। हम सांसारिक प्राणियों के लिए तो राम कोई निराकार न होकर साकार रामधन हैं:-

कबिरा सब जग निर्धना धनवंता नहिं कोय।
धनवंता सोइ जानिए जहां रामधन होय।।

हम समृद्धिकामी हैं, इसीलिए ब्रह्मस्थ होकर भी कबीर और मीरा राम-प्रसंग में हमारे गृहस्थ-प्रवक्ता हैं, प्रतिनिधि हैं:- मैं तो रामरतन धन पायो। हमारे जीवनदर्शन, भावदर्शन व ब्रह्मदर्शन की अनुभूतियां व पद्धतियां स्वभाव-अनुभावगत होने के कारण पृथक-पृथक अवश्य हैं, लेकिन राम में बहुआयामी व बहुप्रचलित ‘भेद प्रवृत्ति’ का सम्यक समाधान निहित है:-

जथा अनेक वेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।
सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।।

तात्विक रूप से एक होते हुए भी रसानुभूति में भिन्नता मानव स्वभाव के सर्वथा अनुकूल है। ‘रामस्तु भगवान स्वयं’ की युक्ति श्रीमद्भागवत् के ‘कृष्णस्तु भगवान स्वयं तर्ज’ पर प्रतिष्ठापित है। माधुर्यमूर्ति-माधव का गुणगान करने वाले महर्षि व्यास ने तो स्वयं भी शील सिंधु-राघव में लोकमंगलकारी विश्वमान्य आदर्श की अभिव्यक्ति के कारण उन्हें लोकवंदनीय माना:-

सीतापतिर्जयति लोकमलघ्नकीर्ति:..।

ईसाई मान्यतानुसार यदि परमात्मा अपना पुत्र भेज सकता है, इस्लाम के मुताबिक यदि वह अपना दूत या पैगंबर भेज सकता है तो हमारी सनातन मान्यता के अनुसार वह निराकार से साकार क्यों नहीं हो सकता? निगरुण अलौकिक परमात्म-तत्व का सगुण मनुजीकरण (एन्थ्रोपोमाफिज्म) हमारे धर्मचिंतन की विशेषता है। हमारी मान्यता तो इससे भी आगे है कि मनुष्य तो स्वयं परमात्मा की प्रतिभूति है। वह उसी की अनुकृति है। विश्वमाता ‘मेरी’ का कौमार्य करुणावतार ईशु मसीह को जन्म देता है। हमारे अजन्मा अनादि अनंत राम तो बस प्रकट होते हैं:-

भये प्रकट कृपाला दीनदयाला..।

अवतारवाद की अवधारणा सनातन धर्म की अपनी ही देन है। क्या ऐसी धारणा अन्यत्र है? हमारी जानकारियां सीमित हैं। लेकिन इतना ज्ञान है कि हम अपने ब्रह्म को निराकार-निगरुण मानते हुए भी उसे साकार-सगुण मानने की छूट दे देते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि निगरुण और सगुण, दोनों में अद्वितीय सामंजस्य भी बैठा देते हैं:-

निगरुण-सगुण विषम-सम रूपं, ज्ञान गिरा गोतीत मनूपं।

यह धारणा अटपटी न लगे, इसलिए तुलसी बाबा ने समाज की समग्रता को ध्यान में रखकर ब्रह्म में व्यक्ति की आवश्यकतानुसार भावनानुरूप गुण आरोपित कर दिए हैं:-

जा की रही भावना जैसी
प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।
जो जेहि भाय रहा अभिलाषी,
तेहि तेहि कै तसि-तसि रुख राखी।

संपूर्ण भारत में ही विष्णु-तत्व की आराधना किसी न किसी रूप में की जाती है। इस नवरात्र में राष्ट्रसंत मोरारी बापू ने ‘मानस-विष्णु-प्रसंग’ में भोपाल में इसी राम-संदर्भ की सरल, सहज और भक्तानुकूल व्याख्या की है।

यद्यपि राम हमारे लिए हर प्रकार से प्रासंगिक हैं, पर वर्तमान संदर्भ में जब भारत सहित अखिल विश्व आतंकवाद की विश्वव्यापी समस्या से पीड़ित है, तब हमारा ध्यान स्वभावत: राम के लोकमंगलकारी स्वरूप के कारण ‘राम जनम के हेतु अनेका’ की ओर जाता है। प्रत्येक युग की आवश्यकताएं अलग-अलग होती हैं। अत: हमारे तारनहार का अवतरण भी युगानुरूप पृथक -पृथक दिखाई देता है। वह व्यष्टि के स्तर पर जीव की हृदयस्थ भावना और कामनाओं की पूर्ति करता है, तो समष्टि के स्तर पर समाज की समस्याओं का समाधान भी करता है। परन्तु अवतरण के मूल उद्देश्य लगभग एक समान होते हैं। त्रेतायुग में रामजन्म का हेतु है:-

जब जब होय धरम कै हानी,
बाड़हिं असुर अधम अभिमानी।
तब तब प्रभु धरि मनुज सरीरा,
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।

द्वापर युग में वही ब्रह्मतत्व श्रीकृष्ण के रूप में इसी उद्देश्य से अवतरित होता है-परित्रणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्..। यह तारनहार कभी राजमहल में प्रकट होता है, तो कभी बंदीगृह में। कभी भरी दोपहरी में और कभी घोर काली रात में। कभी नवमी को, तो कभी अष्टमी को। स्पष्ट है कि देशकाल चाहे कोई भी हो, मगर तारनहार के अवतरण का उद्देश्य एक ही है। यह हमारी चित्तवृत्ति का सांस्कृतिक कारण है। हमारे घोर भौतिकवादी युग में अमेरिकी कवि डब्ल्यूबी यीस्ट ने युगचेतना की अभिव्यक्ति अपनी कविता ‘द सेकंड कमिंग’ में दी है:-

सब तरफ है रक्तरंजित ज्वार, निरीह और निदरेष हैं लाचार।
भक्तों में आस्था का अभाव, बुरों में है प्रचंड तीक्ष्ण भाव।
अवश्य मिटेगा यह आनाचार, होने को है कोई अवतार।

क्या आज विश्व मानवता के दृष्टि-पत्र में त्रेता के राम-रावण संदर्भ व द्वापर के कृष्ण-कंस संदर्भ प्रकारान्तर से पृष्ठांकित नहीं हैं? रावण और कंस तत्कालीन अनाचारी प्रवृत्ति के उतने ही निकृष्ट प्रतीक हैं, जितना समकालीन विश्व-संदर्भ में आतंकवाद। आतंकी हिंसा राक्षसीवृत्ति की भांति सर्वपीड़ा में आनंदित होती है। राक्षसी-संस्कृति जब यज्ञ-विध्वंस करती थी, तो मुनिगण उसके परिचित शत्रु नहीं होते थे। वह तो परपीड़क कुसंस्कृति थी, जैसी कि आज आतंकवादी रक्तपिपासु वृत्तियां हैं, जो मस्जिदों में सजदा करने वाले नमाजियों को मारने से भी गुरेज नहीं करतीं। राक्षसों की भांति आतंकवादियों की भी अंतरात्मा नहीं होती। इसीलिए श्रीराम आज और अधिक प्रासंगिक हैं। शील सिंधु राघव के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप का वर्णन करना इस संक्षिप्ति का उद्देश्य नहीं है। तुलसीकृत मानस की केवल एक चौपाई यह समझने के लिए पर्याप्त है कि जो प्रभु श्रीराम दूसरों के आतंकी अनाचारों का दमन-शमन करने के लिए दृढ़ संकल्पित और प्रतिबद्ध हैं, वे आत्मानुशासन के भी प्रतीक हैं। राम राज्याभिषेक के समय जन संबोधन में तुलसी ने उनके मुख से कहलवाया:-

जो अनीति कहुं भाखों भाई।
तो मोहि बरजहु भय बिसराई।।

यह है रामराज्य की लोकमंगलकारी आत्मानुशासित अवधारणा, जिसके कारण श्रीराम देशकाल से परे लोकवंदनीय हैं, प्रेरणा के पुंज हैं..।
घनश्याम सक्सेना (चिंतक, विचारक और स्तंभकार)

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