अभी बाकी हैं चुनाव के असल परिणाम

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Lok Sabha Election Results

राज एक्सप्रेस, भोपाल। Lok Sabha Election Results: सातवें चरण का मतदान समाप्त होते ही एग्जिट पोल के बहाने अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक सुर में नरेंद्र मोदी का फिर से लौटना मुमकिन बता रहा है। साफ है, केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की वापसी हो रही है। हालांकि एग्जिट पोल को लेकर संशय सिर्फ नेताओं में ही नहीं, जनता में भी है। लिहाजा, अभी जो परिणाम मीडिया द्वारा दिए गए हैं, उन पर मुहर लगनी बाकी है।

सातवें चरण का मतदान समाप्त होते ही एग्जिट पोल के बहाने अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक सुर में नरेंद्र मोदी का फिर से लौटना मुमकिन बता रहा है। साफ है, केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की वापसी हो रही है। ऐसे में जहां सोनिया गांधी एवं चंद्रबाबू नायडू द्वारा केंद्र में साझा सरकार बनाने के प्रयासों को झटका लगा है, वहीं मायावती और अखिलेश यादव ने बेमेल धर्म और जातीय समीकरणों के बूते यूपी में जो सबसे ज्यादा सीटें जीतने की हुंकार भरी थी, वह भी नक्कारखाने की तूती साबित होने जा रही है। मसलन मायावती फिलहाल प्रधानमंत्री नहीं बन रही हैं। हालांकि, एबीपी-सी वोटर ने बुआ-बबुआ को 56 सीटें देकर उनका हौसला बढ़ाया है, लेकिन अन्य सर्वेक्षणों ने भाजपा को 39 से 65 सीटें देकर इनके मंसूबे पर पानी फेर दिया है। सभी सर्वे कांग्रेस को इस सबसे ज्यादा सीटों वाले प्रदेश में महज दो सीटें दे रहे हैं। साफ है, न तो प्रियंका गांधी अपनी दादी इंदिरा गांधी की तरह चमत्कारिक व्यक्तित्व के रूप में पेश आईं और न ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नेतृत्व जनता ने स्वीकार किया।

सर्वेक्षणों की मानें तो भाजपा ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और ओडिशा में नवीन पटनायक की बुनियाद हिला दी है। राजनीतिक रूप से उत्तर और दक्षिण भारत के सेतु महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन भाजपा और शिवसेना गठबंधन के मुकाबले धराशायी होने जा रहा है। दक्षिण के राज्य कर्नाटक में 21 सीटों के साथ भाजपा जहां बढ़त में है, वहीं केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में भाजपा का खाता खुलना भी उपलब्धि होगी। पूवरेत्तर में भाजपा वर्ष 2014 की तुलना में कम सीटें प्राप्त करने के बावजूद संतोषजनक स्थिति में रहेगी। इन राज्यों में सीधा मुकाबला कांग्रेस से है। कम्युनिस्ट पार्टियां पूरे देश में अस्तित्व बचाने की लड़ाई तक सीमित रह गई हैं। साफ है, वामपंथ पर दक्षिणपंथ हावी हो रहा है।

ढाई माह चले चुनावी यज्ञ में मतदाताओं ने सात चरणों में जोश और होश के साथ अपने मत की आहुतियां दीं। 23 मई को वास्तविक नतीजे आएंगे। लेकिन एग्जिट पोल सर्वेक्षणों के खुलासे ने साफ कर दिया कि राष्ट्रीय स्वयं संघ और मोदी-शाह की युगल जोड़ी जमीन पर रणनीतिक सफलता हासिल करने जा रही है। टीवी समाचार चैनलों के जितने भी सर्वे प्रसारित हुए हैं, उनमें एक-दो को छोड़ सभी में एनडीए को स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ते दिखाया है। सर्वेक्षणों का औसत राजग को 306 और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को 130 तथा अन्य को 124 सीटें दे रहा है। हालांकि एबीपी न्यूज ने भाजपा को 267 और टाइम्स नाउ ने 262 सीटें देकर जादुई आंकड़े 272 से दूर रखा है। बावजूद टाइम्स नाऊ ने राजग गठबंधन को 306 सीटें देकर मोदी का रुख केंद्रीय सत्ता के सिंहासन की ओर कर दिया है। अच्छे मतदान ने राजग की स्थिति अच्छी बना दी है।

हालांकि इस बार औसत मतदान 2014 से कम हुआ है। बावजूद यूपी में महागठबंधन, कांग्रेस की पुरजोर कोशिशें और क्षेत्रीय दलों की एकजुटता और पुलवामा हमले के बदले में की गई एयर स्ट्राइक से बने मोदी के राष्ट्रवादी असर को कम नहीं कर पाई। इस सोने में सुहागे का काम आवास, उज्जवला और शौचालय जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं ने कर दिया। लिहाजा आभासी सर्वेक्षण ने भाजपा व उसके सहयोगी दलों को छोड़ सबकी नींद हराम कर दी है। यह सर्वे यदि 23 मई को आने वाले वास्तविक नतीजों पर खरे उतरते हैं तो फिर राजग गठबंधन स्पष्ट बहुमत में होगा। ऐसा होता है तो लोकसभा में बहुमत के लिए राजग को सहयोगियों की जरूरत नहीं रह जाएगी। राजग को मिलने जा रहे इस संभावित स्पष्ट बहुमत के चलते राजनीति की उन दो महिलाओं मायावती-ममता की चिरौरी की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, जिनकी फितरत में रूठकर कोप-भवन में बैठ जाना शामिल है।

जाहिर है, जिस तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग के बूते वे बसपा को अखिल भारतीय धरातल देना चाहती हैं, वह असरकारी रहा भी तो बेअसर रहेगा। ये अनुमान जताते हैं, कि दलित मतदाताओं का जातिगत मतदान से मोहभंग हो रहा है और वे क्षेत्रीय संकीर्णता से मुक्त हो रहे हैं। इस बार धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों पर राष्ट्रवाद हावी रहा। सभी दलों के प्रमुख नेताओं ने मंदिर में ढोक लगाकर चुनाव प्रचार की शुरुआत की है। भाषणों में भी धर्मनिरपेक्ष होने का दंभ नहीं भरा। गोया लगता है, अब छद्म धर्मनिरपेक्षता का आवरण टूट रहा है। केवल बंगाल में ममता बनर्जी मुस्लिम मतदाताओं के तुष्टिकरण के इस छल का सहारा ले रही हैं। एग्जिट पोल के अनुमान पर भरोसा करें तो भाजपा इस बार यहां 13 से 20 सीटें जीत सकती है।

गौरतलब है कि इस बार पश्चिम बंगाल को फोकस करके भाजपा ने हमलावर रणनीति अपनाई थी। नतीजतन जो वामपंथी एक समय कंधे पर लाल झंडा उठाए गौरव का अनुभव करते थे, वे भाजपा में शामिल होकर केसारिया झंडा थामे, जय-जय श्रीराम के नारे लगा रहे हैं। इन वामपंथियों ने जहां भाजपा को ताकत दी है, वहीं कम्युनिस्टों के रहे इस गढ़ को नेस्तनाबूद करने का काम भी कर दिया है। एक बार फिर यह मिथक बनता दिखाई दे रहा है कि यूपी की राजनीतिक जमीन से ही प्रधानमंत्री का पद सृजित होगा। इसी मिथक को पुनस्र्थापित करने के लिए मोदी बनारस से चुनाव लड़े हैं। मोदी की यहां आमद ने पूरे पूर्वाचल को भगवा रंग में रंग दिया है। नतीजतन भाजपा यहां सर्वेक्षणों के अनुसार अच्छी स्थिति में है। अनुमान सटीक बैठते हैं तो नेहरू, शास्त्री, इंदिरा गांधी, चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी इस कड़ी में फिर से प्रधानमंत्री बने रहेंगे। एग्जिट पोल से वास्तविकता पर खरे उतरने की उम्मीद इसलिए ज्यादा रहती है, क्योंकि ये मतदान के बाद मतदाता के निर्णय को जानने की कोशिश करते हैं और निर्वाचन आयोग की बाध्यता के चलते इनका खुलासा भी देष में पूर्ण रूप से मतदान हो चुकने के बाद किया जाता है। इसलिए कोई राजनीतिक दल शुल्क चुकाकर एग्जिट पोल नहीं कराता। इसलिए रुझान परिणाम के निकट पहुंच सकते हैं। हालांकि यह कतई जरूरी नहीं कि अनुमान सटीक बैठें ही? गलत भी हो सकते हैं।

2004 के आमचुनाव में सभी अनुमान ध्वस्त हो गए थे। राजग गठबंधन को 284 सीटों पर जीतने का दावा किया गया था, लेकिन मिलीं महज 189 सीटें। वहीं सप्रंग गठबंधन को अधिकतम 164 सीटें मिलने का अंदाजा था, लेकिन मिलीं 222 सीटें। नतीजतन संप्रग बैशाखियों के बूते सत्ता के घोड़े पर सवार हो गया था। अनुमानों का कमोबेश ऐसा ही हश्र 2009 के चुनाव में हुआ। हकीकत से दूर रहे इन अनुमानों में बताया गया था कि राजग को 175 सीटें मिलेंगी, किंतु मिलीं 159 सीटें। वहीं सप्रंग को 191 से 216 सीटें मिलने का अनुमान जताया था, लेकिन मिलीं 262 सीटें। नतीजतन एक बार फिर गैर राजनीतिक व्यक्ति मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए थे। लिहाजा 2014 के पूर्वानुमान एक बार फिर 2019 में दोहराए जाने व सटीक बैठने की उम्मीद है। एग्जिट पोल को लेकर संशय सिर्फ नेताओं में ही नहीं, जनता में भी है। लिहाजा, अभी जो परिणाम मीडिया द्वारा दिए गए हैं, उन पर मुहर लगनी बाकी है। लिहाजा, हार-जीत का फैसला होना बाकी है। देखते हैं कि तब क्या होगा।
प्रमोद भार्गव (वरिष्ठ पत्रकार)

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