कालाधन बनता जा रहा है चुनौती

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Election Black Money

राज एक्सप्रेस, भोपाल। चुनाव में कालाधन (Election Black Money) लगातार चुनौती बना हुआ है और इस पर अंकुश लगाने की कवायद नाकाफी साबित हो रही है। लगभग हर रोज बड़ी मात्रा में कालाधन पकड़ा जा रहा है। यह राजनीति में भ्रष्टाचार का बड़ा सूचक है। चुनाव सुधार से ही कालेधन पर रोक संभव है।

चुनाव आयोग पिछले काफी समय से चिंता प्रकट कर रहा है कि चुनाव से बाहुबल के प्रभाव को तो लगभग खत्म किया जा चुका है, लेकिन धनबल के प्रभाव को खत्म करना अब भी चुनौती बना हुआ है। पिछले साल पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने जब यह कहा था कि चुनाव के दौरान काले धन पर लगाम लगाने के लिए मौजूदा कानून नाकाफी साबित हो रहे हैं, तो चुनाव में काले धन के उपयोग पर बहस आरंभ हो गई थी। हालांकि, यह बहस अंतहीन है। इस पर रोक तभी लगेगी, जब राजनीतिक तंत्र जागृत अवस्था में होगा और उसे कालेधन के नफा-नुकसान में अंतर करना आ जाएगा। एक अध्ययन के अनुसार, 2014 की चुनावी प्रक्रिया में 30 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। यह देश के इतिहास का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ था। अनुमान है कि इस बार का चुनाव यह रिकॉर्ड तोड़ देगा। इस तरह की खबरें आने के बाद चुनाव आयोग व आयकर विभाग सक्रिय हुआ। उसकी सक्रियता के चलते लगभग हर रोज कहीं न कहीं बड़ी मात्र में नगदी बरामद हो रही है। 2014 के आम चुनाव के दौरान 300 करोड़ रुपए की अवैध राशि जब्त की गई। इस बार यह आंकड़ा बढ़ सकता है।

ताजा मामला तमिलनाडु के थेनी जिले के अंडीपट्टी में अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (एएमएमके) के दफ्तर से बरामद हुए एक करोड़ 40 लाख रुपए का है। इससे पहले मंगलवार को आयकर विभाग की टीम ने चुनाव अधिकारियों के साथ मिलकर डीएमके नेता कनिमोझी के यहां भी छापेमारी की थी। हालांकि, वहां से मिला कुछ नहीं। बताते हैं कि एक करोड़ 40 लाख रुपए कई पैकेट में रखे गए थे। इन पैकेट्स पर वार्ड नंबर लिखा हुआ है और हर वोटर को 300 रुपए देने का हिसाब लिखा है। अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम टीटीवी दिनाकरन की पार्टी है। पिछले साल दिनाकरन ने इसका गठन किया था। चुनाव से पहले इस तरह कालाधन बाहर आना कई सवालों को जन्म दे रहा है। पिछले मई में हुए कर्नाटक चुनाव में 200 करोड़ से ज्यादा रुपए पकड़े गए थे। अनुमान लगाया गया था कि कर्नाटक चुनाव में करीब 5000 करोड़ रुपए खर्च हुए होंगे। इसी तरह पिछले साल ही पांच राज्यों में हुए चुनाव में भी पैसा पानी की तरह बहाया गया था।

सही मायने में मौजूदा सियासत धन और बल पर टिकी है। बिना पैसे की सियासत अब कोई नहीं कर सकता है। चारों ओर पैसों की बरसात करनी पड़ती है। ग्रामीण अंचल के ग्राम प्रधानी चुनाव तक के लिए भी प्रत्येक उम्मीदवार एक-एक करोड़ रुपए खर्च कर देते हैं। निगम पार्षद और विधायक पद के चुनाव में तीन करोड़ से 15 करोड़ तक खर्च किए जाते हैं। इन खर्चो के बाद भला कोई ईमानदार उम्मीदवार सस्ते चुनाव लड़ने की उम्मीद भला कैसे कर सकता है। आज तो राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए सौ-दो सौ करोड़ तक खर्च कर देते हैं। ऐसी दशा में हम सियासत व कालेधन को कैसे अलग कर सकते हैं। लिहाजा चुनाव सुधार से ही कालेधन पर रोक संभव है।

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