नक्सलवाद को मिला करारा जवाब

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Chhattisgarh Elections

राज एक्सप्रेस, भोपाल। Chhattisgarh Elections: लोकतंत्र के महापर्व में जनता ने भागीदारी कर नक्सलवाद के खतरे को करारा जवाब दे दिया है। बस्तर में वोट का प्रतिशत हर किसी के लिए गर्व की बात है। अब केंद्र औेर राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे नक्सलवाद का समूल नाश करें। इससे पहले उन लोगों पर शिकंजा कसना होगा, जिन्हें नक्सलवाद में इस देश का भविष्य नजर आ रहा है। ऐसे लोगों की वजह से ही आज देश को नक्सलवाद से निजात नहीं मिल रही।

छत्तीसगढ़ में प्रथम चरण चरण में धुर नक्सल प्रभावित बस्तर संसदीय सीट के लिए गुरुवार को मतदान के दौरान उत्साह और जुनून के आगे नक्सलवाद का खौफ मुंह छिपाता नजर आया। लोकतंत्र जीता और बूथों पर जमकर बरसे वोट। बस्तर सीट के कोंडागांव क्षेत्र में दोपहर बाद बारिश और ओलावृष्टि के साथ ही बूथों पर वोट बरसते देखना भी सुखद रहा। बस्तर सीट पर पोलिंग के लिए 1878 मतदान केंद्र बनाए गए थे, जहां सुबह सात बजे से ही लंबी कतार लगने लगी। मतदाताओं के उत्साह का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस श्यामगिरी में दो दिन पहले नक्सलियों ने विधायक की हत्या की और चार जवान शहीद हो गए, वहां सुबह से ही बूथ पर लंबी कतार लगी रही। शाम तक 78 फीसद मतदान हुआ। नारायणपुर जिले में नक्सलियों ने मतदान शुरू होने से पहले एक पोलिंग बूथ के नजदीक आईईडी ब्लास्ट किया और कई क्षेत्रों में पोस्टर बैनर लगाकर वोट न करने की धमकी भी दी, लेकिन लोकतंत्र की विजय गाथा लिखने निकले मतदाताओं के कदम फिर भी नहीं रुके और मतदान का प्रतिशत देख हर किसी को बस्तर पर गर्व है।

मतदाताओं में सुरक्षा बलों के इंतजामों पर गजब का भरोसा दिखा। सुकमा में लोकतंत्र के महापर्व में इस बार ऐसे लोग भी शामिल हुए जिन्होंने कभी लोकतंत्र के खिलाफ बंदूकें उठाई थीं। आत्मसमर्पण करने के बाद पूर्व नक्सली अजरुन और वेट्टी रामा ने कोंटा के एक पोलिंग बूथ में पहली बार मतदान किया। एसपीओ के रूप में पुलिस में शामिल किए गए वेट्टी और अजरुन के चेहरे पर उत्साह और आत्मसम्मान साफ नजर आया। वेट्टी व अजरुन से जब पूछा गया कि वे वोट डालकर कैसा महसूस कर रहे हैं? तो वेट्टी की आंखें भर आईं। अजरुन आठ लाख रुपए का इनामी नक्सली रहा है। बस्तर जैसी झलक जम्मू-कश्मीर के बारामूला सीट पर भी दिखाई दी, जहां कश्मीरी पंडितों ने वोट डाले। तो जम्मू में भी मतदान को लेकर खासा उत्साह दिखा। आतंकियों ने भरसक प्रयास किया था ताकि लोग मतदान से दूर रहें, लेकिन न तो उनकी धमकी का असर दिखा और न ही किसी करतूत का। जम्मू कश्मीर का यह इलाका आतंक के साये में है।

मतदाता न सिर्फ लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाने के लिए तगड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच अपने मतदान केंद्रों पर सुबह से ही पहुंच गए, बल्कि नाच-गाकर खुशी का इजहार भी किया। बहरहाल, नक्सलवाद के खिलाफ लोकतंत्र की जीत का सबसे बेहतर उदाहरण यह रहा कि घोर नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में ग्रामीण लगभग 12 किमी पैदल चलकर मतदान करने पहुंचे। नक्सली विरोध के चलते और अन्य सुरक्षा कारणों से गोण्डेरास, गोंदपल्ली और पेरमापारा गांव के मतदान केंद्र को कोंडरे गांव में शिफ्ट किया गया था, बावजूद इसके मतदाताओं का उत्साह डिगा नहीं। बता दें कि नक्सलियों ने इस इलाके में ग्रामीणों की बैठक लेकर उन्हें मतदान से दूर रहने के लिए कहा था। साथ ही नक्सलियों ने इस इलाके की मुख्य सड़क पर जगह-जगह लोकसभा चुनाव के बहिष्कार करने की बात लिखी थी, बैनर-पोस्टर चस्पा किए थे। उसके बाद भी ग्रामीण नक्सली नारों और विरोध को धता बताते हुए करीब 12 किमी पैदल चलकर मतदान करने पहुंचे। इससे ग्रामीणों की लोकतंत्र प्रति आस्था साफ दिखाई देती हैं। आतंक और नक्सल पहली बार परास्त नहीं हुआ है। हर चुनाव में मतदाता धमकियों और हमलों की परवाह किए बिना अपना धर्म निभाते हैं, मगर आतंक के रास्तों पर चलने वालों को उनका न तो धर्म दिखता है और न ही देश के प्रति कर्तव्य। लेकिन अब देश के आम लोगों की जो भावना दिखी है, उसके बाद दहशतगर्दो को अपने गिरेबां में झांकना जरूर होगा।

माओवादी या कहें नक्सली जो देश के लोकतंत्र और व्यवस्था को नहीं मानते हैं, जो मतदान के बहिष्कार की बात करते हैं, जनअदालतें लगाकर लोगों की हत्या करते हैं, जंगलों में ठेकेदारों, सरकारी कर्मियों से करोड़ों की लेवी वसूलते हैं। जिनके जनयुद्ध से आम आदमी की जिंदगी से सिर्फ अंधेरा फैलता है। बावजूद आम आदमी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता। यह जनतंत्र की ही ताकत है। इस आलोक में देखें तो यह सवाल भी मौजूद है कि आखिर लोकतंत्र के बदले हम कौन सी वह व्यवस्था लाना चाहते हैं जो न्याय दे पाएगी। क्या हमारे लोकतंत्र का विकल्प आज के स्वरूप का खूनी नक्सलवाद हो सकता है। देश का नक्सल आंदोलन सही मायनों में एक गहरे अंर्तविरोध से गुजर रहा है। आज का नक्सलवाद और उसका चेहरा इतना विकृत है कि लोग इस किसी वाद के रूप में स्वीकारे जाने पर भी सवाल उठा रहे हैं। असल सवाल आज यह है कि आपको गणतंत्र चाहिए या गनतंत्र। लोकतंत्र के खिलाफ उठी ये बंदूकें सही मायनों में भारतीय राज्य के सामने एक ऐसी चुनौती के रूप में जिसका हल तलाशना जरूरी है।

नक्सली समस्या जिस विकराल रूप में आज हमारे सामने है उसने देश की व्यवस्था के सामने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह सोचना बहुत रोमांचक है कि आखिर ऐसे कौन से हालात हैं जिनमें कोई व्यक्ति किसी अतिवादी विचार से प्रभावित होकर नक्सली बन जाता है। वो कौन से हालात है जिनमें एक सहज-सरल आदिवासी बंदूक उठाकर व्यवस्था को चुनौती देने के लिए खड़ा हो जाता है। अब हालात यह हैं कि नक्सलवादी संगठन लोगों को जबरिया भी नक्सली बना रहे हैं। हर घर से एक नौजवान देने की बात भी कई इलाकों मे नक्सलियों ने चलाई है।बीस राज्यों के 223 जिलों के दो हजार से अधिक थाना क्षेत्रों में फैला यह माओवादी आतंकवाद साधारण नहीं है। यह सोच बेहद बचकानी है कि अभाव के चलते वर्षो से आदिवासी समाज नक्सलवाद की ओर बढ़ा है। आदिवासी अपने में ही बेहद संतोष के साथ रहने वाला समाज है। जिसकी जरूरतें बहुत सीमित हैं। यह बात जरूर है कि आज के विकास की रोशनी उन तक नहीं पहुंची है।

नक्सलियों ने उनकी जिंदगी में दखल देकर हो सकता है उन्हें कुछ फौरी न्याय दिलाया भी हो, पर अब वे उसकी जो कीमत वसूल रहे हैं, वह बहुत भारी है। जिसने एक बड़े इलाके को युद्धभूमि में तब्दील कर दिया है। इस बात के लिए इस अराजकता के सृजन को भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए कि इस बहाने इन उपेक्षित इलाकों और समाजों की ओर सरकार गंभीरता से देखने लगी है। यह सही मायनों में भारतीय लोकतंत्र और आर्थिक योजनाओं की विफलता ही रही कि ये इलाके उग्रवाद का गढ़ बनते गए। दूसरा बड़ा कारण राजनीतिक नेतृत्व की नाकामी रही। राजनीतिक दलों के स्थानीय नेताओं ने नक्सल समस्या के समाधान के बजाए उनसे राजनीतिक लाभ लिया। उन्हें पैसे दिए, उनकी मदद से चुनाव जीते और जब यह भस्मासुर बन गए तो होश आया। नक्सली आतंक के विस्तार का कारण सामाजिक और आर्थिक बताया जा रहा है। बावजूद इसके संकट अब इतने विकराल रूप में सामने है कि उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

गरीबी, अशिक्षा, विकास व प्रशासन की पहुंच इन क्षेत्रों में न होना कारण बताया जा रहा। किंतु उग्रवाद को पोषित करने वाली विचारधारा तथा लोकतंत्र के प्रति अनास्था के चलते यह आंदोलन आम जन की सहानुभूति पाने में विफल है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और एक जीवंत लोकतंत्र के सामने जितनी बड़ी चुनौती नक्सली हैं उससे कहीं बड़ी चुनौती वे बुद्धिवादी हैं, जिन्हें नक्सलवाद में इस देश का भविष्य नजर आ रहा है वे सावन के अंधों सरीखे हैं।
शिव कुमार (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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