भाजपा-कांग्रेस के लिए गेमचेंजर होंगे मुद्दे

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Lok Sabha Election

राज एक्सप्रेस, भोपाल। 2014 की तरह यह चुनाव (Lok Sabha Electionभी भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ेगी। वहीं विपक्षी गठबंधन दिखाना चाहेगा कि लोकतंत्र में सापेक्ष तरीके से कामों को बांटकर किया जाना चाहिए। भाजपा यह मुद्दा भी उठाएगी कि विपक्षी पार्टियों के पास पीएम के लिए कोई चेहरा नहीं है। वहीं कांग्रेस कह सकती है कि गठबंधन भारत के विविध समाज के लिए बेहतर है। वैसे, इस चुनाव में कई मुद्दे ऐसे भी होंगे, जो भाजपा-कांग्रेस के लिए गेमचेंजर साबित होंगे।

लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों की घोषणा हो चुकी है। पिछली बार के मुकाबले इस बार सात चरणों में चुनाव कार्यक्रम संपन्न कराया जाएगा। यह चुनाव बेहद ही खास होने वाला है। एक तरफ नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी दोबारा सत्ता में आने की कोशिश कर रही है, तो वहीं कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में सत्ता में वापस आने की कोशिश करेगी। यूं तो देश के सभी राजनीतिक दल अपनी सहूलियत और अपने मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए अपने चुनावी मुद्दों का चयन करेंगे, लेकिन फिर भी कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिनका सरोकार देश के हर नागरिक से है। ये वो मुद्दे हैं, जो चुनाव परिणाम को भी काफी हद तक प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। चुनाव से पहले कई मुद्दे हैं जिनको लेकर पक्ष-विपक्ष आमने सामने हैं और जो लोकसभा चुनाव की दशा और दिशा तय कर सकते हैं। इसके अलावा भाजपा और कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां भी हैं, जिनका सामना उन्हें आने वाले 70 दिनों में करना है। अगर मुद्दों की बात करें, तो अभी राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे ऊपर है। अंत तक इसकी छाया बनी रहे, इस बात की संभावना भी प्रबल है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा चरम पर है।

1990 के समय से ही चुनावों में राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद बड़े मुद्दों में शुमार रहा है, लेकिन इस बार यह मुद्दा हाल ही में हुए पुलवामा हमले के पहले चुनाव के केंद्र में कतई नहीं था। पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों की शहादत और उसके बाद भारतीय वायु सेना की तरफ से पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद यह मुद्दा ऐसे मुकाम पर आ पहुंचा है कि जो चुनाव की दिशा भी बदल सकता है। यह मुद्दा भाजपा को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभा सकता है। भाजपा यह दिखाने की कोशिश करेगी कि नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो कठोर फैसले लेकर पाक और आतंकवाद से मुकाबला कर सकते हैं। आमतौर पर किसी भी चुनाव में महंगाई सबको प्रभावित करने वाला मुद्दा रहा है, लेकिन इस चुनाव में यह मुद्दा उतना जोर पकड़ता नहीं दिख रहा है। मोदी सरकार कहीं न कहीं महंगाई पर लगाम लगाने में कामयाब रही है। विपक्षी पार्टियां चाहकर भी महंगाई के मुद्दे पर भाजपा को घेर नहीं सकी हैं। वहीं जानकारों का कहना है कि महंगाई पर लगाम लगाने का एक बड़ा कारण यह है कि किसान से कम दाम पर ही सामान सामान खरीदा गया। ऐसे में महंगाई नियंत्रित करने में भले ही कामयाबी मिली हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों में पार्टी को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के तरकश में रोजगार का तीर सबसे अहम है।

कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां सरकार को कई बार इस मुद्दे पर घेर चुकी हैं। मोदी सरकार को 2014 में नौकरियों का वादा करने पर बड़ी सफलता मिली थी, लेकिन कहीं न कहीं वह इस वादे को पूरा करने में सफल नहीं दिख रहे हैं। सरकार पर डेटा में हेरफेर कर इस मुद्दे के प्रति गंभीरता नहीं बरतने का आरोप भी लगता रहा है। सरकार ने ईपीएफओ नंबर बढ़ने और मुद्रा लोन की संख्या बढ़ने का हवाला देकर रोजगार का वादा पूरा करने के सबूत देने की कोशिश की है, लेकिन विपक्ष इससे कहीं भी सहमत नहीं है। किसान या कहें कि ग्रामीण वोटर्स ने 2014 में मोदी सरकार की जीत में बड़ा रोल निभाया था। वहीं इस बार कृषि निवेश में बेहतर रिटर्न न मिलने से ग्रामीण वोटरों में नाराजगी है। नोटबंदी जैसे कदमों ने इस मुद्दे को अहम बना दिया है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के चुनाव में कांग्रेस ने इस मुद्दे का पूरा फायदा उठाने की कोशिश की और उसे सफलता भी मिली। इसके बाद भाजपा ने कई और रास्तों से किसानों की मदद कर इस कमी को पूरा करने की कोशिश की है।

अगर ध्रुवीकरण की बात करें तो इस मुद्दे का असर जितना इस चुनाव में नजर आ रहा है, उतना देश में पहले कभी नहीं दिखा। इसने 2014 में भाजपा को सबसे बड़ी मदद की थी और कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया था। कांग्रेस की अल्पसंख्यक समर्थक पार्टी की इमेज से उसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। आम तौर पर इसका फायदा हिंदू राष्ट्रवादी भाजपा को मिलता है। इसके अलावा भारत में अब तक हुए चुनाव में जातीय समीकरण के आधार पर किसी भी पार्टी की मजबूती का अंदाजा लगाना बेहद आसान रहा है, लेकिन इस बार का चुनाव इस मामले पर काफी अलग रहने वाला है। विपक्ष मोदी को हराने के लिए इस बार जातीय समीकरण को आधार बना रहा है। विपक्ष का मानना है कि यूपी में यादव, जाटव और मुसलमान के साथ आने से भाजपा को हराना काफी आसान होगा।

वहीं बिहार में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने लालू के साथ गठबंधन कर ओबीसी और मुसलमान वोटों के भी एकजुट करने की कोशिश की है। भाजपा को 2014 में बड़ी जीत इसलिए मिली थी क्योंकि मोदी कुछ उन जातियों का भी समर्थन मिला था, जिन्हें आम तौर पर विपक्षी पार्टियों का ही आधार माना जाता है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा को मिली हार के पीछे तथ्य दिए गए कि उच्च वर्ग बीजेपी से दूर हो रहा है। ऐसे में भाजपा ने गरीब सवर्णो को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें अपने खेमे में बनाए रखने की कोशिश की है। यह कितना बड़ा मुद्दा बन सकता है, इसकी बानगी तब ही देखने को मिल गई थी, जब गैर भाजपा शासित राज्यों ने इसे लागू करने में आनाकानी की। विपक्ष को पता है कि यह मुद्दा मोदी के लिए बड़ा मास्टर स्ट्रोक साबित होगा। इसीलिए यह फैसला भाजपा व गैर भाजपा शासित राज्यों के लिए अलग मायने रखता है।

भ्रष्टाचार की बात करें तो 2014 के चुनाव में कांग्रेस को इससे सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था। इसके बाद ही कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में पूरी कोशिश की है कि भाजपा पर ऐसे आरोप न लग पाएं। यहां तक कि पीएम ने कई जगहों पर यह कहा भी कि उनके कार्यकाल में उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप नहीं लगा है। लोगों ने नोटबंदी के कड़वे घूंट को भी इसलिए आसानी से पी लिया क्योंकि उन्हें लगता है कि पीएम भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए यह कदम उठा रहे हैं। हालांकि अभी तक इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी की तरफ से लगाए जा रहे राफेल घोटाले के आरोपों का जनता पर क्या असर पड़ेगा।

मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में बहुत सारी कल्याणकारी और विकास योजनाओं को लॉन्च किया। उज्जवला, स्वच्छ भारत, पीएम किसान, आयुष्मान भारत इसमें प्रमुख हैं। वहीं नोटबंदी जैसे कदम ने भी सूट बूट की सरकार के लेबल लगे विपक्ष को झटका देने में मदद की है। हाल में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बढ़त मिली है। इसके बाद उन्होंने लोगों को रिझाने के लिए तीन राज्यों में कर्जमाफी की घोषणा भी कर दी है। राहुल गांधी ने सरकार में आने के बाद बेसिक इनकम देने का वादा भी किया है। यह कांग्रेस का फायदा करवा सकता है। वहीं, भाजपा को यकीन है कि अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी मोदी की गुडविल को वोटों में तब्दील करने में कामयाब होगी। बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भाजपा का उत्साह और बढ़ गया है। वहीं कांग्रेस मानकर चल रही है कि मोदी का करिश्मा 2014 जैसा नहीं है क्योंकि चुनावी वादे पूरे ही नहीं हुए।
डॉ. सत्येंद्र मिश्र (वरिष्ठ पत्रकार)

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