सीएसटी हादसा: कब लेंगे सबक

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Mumbai CST Incident

राज एक्सप्रेस, भोपाल। मुंबई के सीएसटी स्टेशन (Mumbai CST Incident) के फुट ओवर ब्रिज का गिरना लापरवाही का एक और नमूना है। इस हादसे में बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए हैं। यह हादसा रेलवे की लापरवाही है या भीड़ का अप्रबंधन, इसका जवाब ढूंढना होगा और ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, ताकि भविष्य में इस तरह के हादसे की पुनरावृत्ति नहीं हो। रेलवे स्टेशन पर ब्रिज गिरने का यह पहला मामला नहीं है। मगर हम सबक लेने को तैयार नहीं हैं।

देश में भले ही बुलेट ट्रेन लाने की बात हो रही है, पर लगातार होते हादसे रेल व्यवस्था व उसके स्ट्रक्चर की बानगी दिखा रहे हैं। मुंबई के सीएसटी स्टेशन के फुट ओवर ब्रिज का गिरना लापरवाही का एक और नमूना है। इस हादसे में बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए हैं। यह हादसा रेलवे की लापरवाही है या भीड़ का अप्रबंधन, इसका जवाब ढूंढना होगा और ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, ताकि भविष्य में इस तरह के हादसे की पुनरावृत्ति नहीं हो। वैसे, तो देश में भगदड़ की घटनाओं का इतिहास रहा है, लेकिन संसाधनों की कमी का रोना रोकर हम आत्मसंतोष के सिवा कुछ नहीं करते। आज के विकसित समाज में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति सोचने को मजबूर कर देती है। 21वीं सदी में भी हम इस तरह की घटनाओं के शिकार बन रहे हैं।

मुंबई का हादसा भी समय के साथ भुला दिया जाएगा। यह दोबारा तब याद आएगा, जब ऐसी ही घटना कहीं और घटेगी, क्योंकि हम इतिहास से सबक नहीं लेते। रेलवे स्टेशन पर ब्रिज गिरने का यह पहला मामला नहीं है। पहले भी कई बार हादसे हो चुके हैं। सीएसटी स्टेशन पर जिस ब्रिज के गिरने से यह हादसा हुआ उसकी देखरेख का काम बीएमसी करती है। उन्होंने बताया कि ब्रिज का निर्माण कार्य रेलवे ने कराया था, लेकिन रखरखाव की जिम्मेदारी बीएमसी की ही थी। इससे पहले साल 2018 और 2017 में भी ऐसे ही हादसे हो चुके हैं। इन हादसों से सवाल उठाता है कि डेढ़ साल में तीन पुल हादसे, क्यों इतनी सस्ती है मुंबईकरों की जान? तीन जुलाई 2018 को मुंबई के अंधेरी में फुटओवर ब्रिज गिरने से ऐसा हुआ था। इस हादसे में 6 लोग घायल हो गए थे। तब यह गनीमत रही थी कि इस हादसे में किसी मौत नहीं हुई थी। बीएमसी व रेलवे ने इस हादसे के लिए एक-दूसरे पर आरोप मढ़े थे। 29 सितंबर 2017 को भी एलफिंस्टन स्टेशन पर पुल गिरने से हादसा हुआ था। भगदड़ मचने से हुए हादसे में 23 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 23 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।

एलफिंस्टन हादसे पर रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि आने वाले 6 महीने के दौरान रेल मंत्रालय और बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) आईआईटी (मुंबई) के विशेषज्ञों की देख-रेख में मुंबई के 445 पुलों की सुरक्षा जांच करेगा। मगर ताजा हादसा यह साफ कर देता है कि वे सारे दावे खोखले थे और जमीन पर हालात जस के तस बने हुए है। मुंबई में कई पुराने पुल हैं, लेकिन कोई भी एजेंसी उनकी उम्र और मरम्मत का रिकॉर्ड ही नहीं रखती है कि उनकी मरम्मत चल रही है या उनको मरम्मत की जरूरत है। और हर एक दुर्घटना के बाद हमेशा एक दूसरे पर दोष लगाने का खेल चलता है। मुंबई बहुत सारे पुराने पुल के सहारे फल-फूल रही है, जिनमें से कुछ औपनिवेशिक काल से भी पहले के हैं। लेकिन, किसी भी एजेंसी के पास सही आंकड़ा तक नहीं है कि वास्तव में उनमें से कितने पुल कमजोर या जर्जर हैं और कितने पुलों की आवश्यक मरम्मत हो चुकी है, रिकार्ड ही नहीं है। शहर में 314 नए और पुराने पुल हैं जिनका कम से कम पांच अलग-अलग सरकारी एजेंसियों द्वारा रख-रखाव किया जाता है और किसी भी दुर्घटना के मामले में उनको एक दूसरे पर दोषारोपण करते हुए देखा जा सकता है। शहर में कुल 314 पुल हैं, जिसमें फ्लाईओवर, सबवे, रोड ओवरब्रिज और फुट ओवरब्रिज सहित 274 पुल निरीक्षण के लिए चुने गए। 274 में से 77 पुल आइलैंड सिटी में हैं, 137 पुल पश्चिमी उपनगरों में और 60 पुल पूर्वी उपनगरों में हैं। कुल मिलाकर 77 पुल रेलवे की भूमि पर स्थिति हैं।

मुंबई में एक रेलवे स्टेशन के पुल पर हादसा दुखद है। भले ही रेलवे व राज्य सरकार ने मृतकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा भी कर दी है लेकिन हादसे ने जो गहरे घाव दिए हैं उसे समय ही भर सकता है। सवाल यह भी है कि जब सरकार रेल को हाईटेक करने की बात करती है, तंग व पुराने पुल और मानव रहित फाटक सरकार की नीतियों और कार्यशैली का हिस्सा क्यों नहीं होते? कोई भी काम हादसों के इंतजार के बिना क्यों नहीं किया जा सकता। अब सवाल है कि सीएसटी हादसे में जो लोग मारे गए उनका जिम्मेदार कौन है? सौ साल पहले बने हुए आज भी खड़े हैं, जो अब कांपने भी लगे हैं। ऐसा यह अकेला रेलवे पुल नहीं है, बल्कि दर्जनों पुल हैं। जिनके बारे में रेलवे मंत्रालय अच्छी तरह जानता है और मंत्रालय को अच्छी तरह पता है और था कि इन पर कभी भी हादसे घटित हो सकते हैं। पुलों की मियाद खत्म होने के बावजूद भी उन्हें यात्रियों के लिए खुला छोड़ा हुआ है तो आखिर क्यों? क्या रेल मंत्रलय को जागने के लिए किसी हादसे का ही इंतजार था?

मुंबई लोकल ट्रेन महानगर के लोगों की लाइफ लाइन कही जाती है। यह ट्रेनें जब कभी ठप होती हैं तो महानगर के लोगों की जिंदगी ठहर जाती है। आने जाने वाले रोज के यात्री और दो जन प्रतिनिधियों ने पूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु को पत्र लिखकर पुल की शिकायत की थी और नए पुल के निर्माण की मांग की थी, लेकिन मंत्री ने धन की कमी का हवाला देकर अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि फिर देश को विशेषकर मुंबई-अहमदाबाद को बुलेट ट्रेन की क्या जरूरत है? बेहतर तो यह होता कि सरकार इतना कर्ज लेकर रेलवे के व्यापक सुधार की किसी परियोजना को हाथ में लेती। अब महाराष्ट्र सरकार व रेल मंत्रालय ने मुआवजे की घोषणाएं भी कर दी है और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी है। हर हादसे के बाद ऐसी रस्म जरूरी मान ली गई है और कामकाज का ढर्रा पूर्ववत चलता रहेगा। यह कभी नहीं सोचा जाता कि व्यवस्था में पसरी लापरवाही और बदइंतजामी का सिलसिला कब तक चलता रहेगा और लोग कब तक अपनी जानें गंवाते रहेंगे?

सीएसटी स्टेशन के पुल को हादसे के जोखिम से भरा बताया जा रहा था, लेकिन रेल मंत्रालय का ध्यान इस ओर नहीं गया, लेकिन अब जब हादसा हो गया और तो अब शायद फंड का भी इंतजाम हो जाएगा और पुल नया भी बन जाएगा। सवाल है कि नया पुल बनाने के लिए क्या हादसे का इंतजार किया जा रहा था? सवाल यह भी है कि इस हादसे का जिम्मेदार किसे ठहराया जाए? आखिर किसकी जवाबदेही बनती है। फिर इस तरह की आपराधिक अनदेखी और लापरवाही बरतने वाले तंत्र में बैठे वे कौन लोग होते हैं, जिन्हें इसकी चिंता नहीं होती कि उनके रवैये की वजह से कितने लोगों की जान जा सकती है? भीड़भाड़ वाली जगहों पर ऐसे हादसे पहली बार नहीं हुए हैं। देश में भीड़ से संबंधित हादसे घटित हो चुके हैं लेकिन सरकारी तंत्र ने कभी कोई सबक लिया ही नहीं। धार्मिक आयोजनों के दौरान भगदड़ में बड़ी तादाद में लोगों की जानें जा चुकी हैं। रेलवे स्टेशनों पर भी हादसे घटित हो चुके हैं, लेकिन जवाबदेही किसी पर नहीं डाली जाती।

भगदड़ भीड़ प्रबंधन की असफलता या फिर अभाव की स्थिति में पैदा हुई मानव निर्मित आपदा ही है। अचानक किसी अफवाह आशंका या फिर भय के कारण भीड़ में अफरातफरी मच जाती है। भीड़ की मानसिकता को समझना मुश्किल है, लेकिन रेलवे पुल पर भीड़ को नियंत्रित किया जा सकता है। इसकी तरफ किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। जरूरत सबक लेने की है। मुंबई में पुल हादसा आपराधिक चूक का परिणाम है। अब इस हादसे की जवाबदारी तय करनी ही होगी।
सतीश मिश्र (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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