विपक्ष को दिखाना होगा ज्यादा दम

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Mahagathbandhan

राज एक्सप्रेस, भोपाल। अगले कुछ दिनों में यह तय हो जाएगा (Mahagathbandhan)कि पांच साल देश की सत्ता किसके हाथ रहेगी। मोदी ब्रांड का जादू चलेगा या विपक्षी एकता मैदान मार लेगी। जो भी हो, इस बार का चुनाव बेहद दिलचस्प होने जा रहा है। एयर स्ट्राइक और आतंक पर मोदी आक्रामकता दिखाएंगे तो विपक्ष यह बताने की कोशिश करेगा कि सेना की कार्रवाई का राजनीतिकरण किया जा रहा है। जो भी हो, देश राष्ट्रवाद के साये में है। विपक्ष को नहीं भूलना चाहिए।

आम चुनाव में सरकार की घेराबंदी में जुटे विपक्ष को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। दरअसल, पाकिस्तान में जैश के शिविरों पर वायुसेना द्वारा की गई एयर स्ट्राइक और उसके बाद उत्पन्न स्थितियों से देश में राजनीतिक माहौल बदला है। बदली परिस्थितियों में जहां सत्तापक्ष मजबूत होता दिख रहा है, वहीं विपक्ष की रणनीति कमजोर पड़ती दिख रही है। इसलिए संभावना व्यक्त की जा रही है कि विपक्ष नए कदम उठाकर अपनी रणनीति को चाक-चौबंद करेगा। इसमें गठबंधन का दायरा बढ़ाना प्रमुख कदम हो सकता है। हाल में गठबंधन को लेकर जो थोड़ी-बहुत सक्रियता बढ़ी है, उसके लिए एयर स्ट्राइक के बाद बनी परिस्थितियां ही जिम्मेदार हैं। मसलन, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन में रालोद को शामिल किया गया और कांग्रेस को बातचीत की टेबल पर लाया जा रहा है। दिल्ली में आप व कांग्रेस के बीच पहले थम चुकी बातचीत एक बार फिर शुरू हुई। हालांकि, उसका कोई नतीजा अभी नहीं निकला है। जिन राज्यों में अभी तक विपक्षी दलों के बीच लोकसभा चुनावों के लिए गठबंधन अटके हुए हैं, वहां जल्द फैसले होंगे। इसमें पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा समेत कई राज्य शामिल हैं। विपक्षी नेताओं का मानना है कि अब जो स्थितियां हैं, उसमें एकजुट होकर लड़ने में ज्यादा फायदा है। दूसरे, भाजपा को उम्मीद है कि उसे चुनावी माहौल में बढ़त मिलने से छोटे सहयोगी दलों का दबाव कम होगा।

कांग्रेस और तृणमूल समेत कई दलों ने एयर स्ट्राइक में तीन सौ आतंकियों के मारे जाने के सबूत मांगकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन इस मुहिम से दलों को अभी तक अपना फायदा होता नहीं दिख रहा है। उल्टे इस मुद्दे पर भाजपा का पलटवार उन पर भारी पड़ रहा है। लेकिन उन्हें लगता है कि जिस प्रकार इस मामले में नित नए तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे आगे वे सरकार को घेरने में सफल होंगे। एयर स्ट्राइक के हंगामे में विपक्ष के राफेल, रोजगार आदि मुद्दे दब रहे हैं। इसलिए विपक्ष इस रणनीति पर भी काम कर रहा है कि जैसे ही स्ट्राइक का मुद्दा थोड़ा धीमा पड़े तो वह इन मुद्दों को एकजुट होकर उठाए। सभी दलों को इस पर राजी करने के प्रयास भी अंदरखाने हो रहे हैं। विपक्ष की कोशिश होगी कि वह सत्ता पक्ष को एयर स्ट्राइक का लाभ नहीं लेने दे। इस बार लोकसभा चुनाव में विपक्ष चुनाव प्रचार के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी की धुआंधार रैलियों और उनके इलेक्शन मैनेजमेंट से मुकाबला करने और उन्हें मात देने के लिए खास रणनीति पर काम कर रहा है। विपक्षी दलों के नेताओं का दावा है कि इस बार नरेंद्र मोदी को वॉकओवर नहीं दिया जाएगा, जैसा कि 2014 में कम से कम चुनाव प्रचार और रैलियों के दौरान दिया गया था।

दरअसल, हाल के बरसों में कई विश्लेषण से यह बात साबित हुई है कि चुनाव के अंत में जो दल संगठित होकर आक्रामक प्रचार करता है, उसका लाभ उसे जरूर मिलता है। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार, अंतिम महीने के दौरान जो दल चुनाव प्रचार के दौरान अजेंडा सेट करता है, आखिरी वक्त में अपना वोट तय करने वाले उसके साथ हो जाते हैं। इसी चुनावी ट्रेंड को सेट कर 2014 आम चुनाव में नरेंद्र मोदी ने ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ की थीम को तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ अंतिम वक्त में सेट किया और जीते। इस रणनीति के ठीक उलट पिछले साल दिसंबर में तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस ने अंत में किसानों की कर्ज माफी को बड़ा मुद्दा बताया और अजेंडा सेट करने में सफल रही। इन्हीं ट्रेंड और चुनावी इतिहास से सीख लेते हुए विपक्ष की मंशा है कि अंतिम समय में वह नैरेटिव सेट करने में मोदी पर भारी पड़े। अधिकतर विपक्षी दल मानते हैं कि कुछ समय तक बैकफुट पर रहने के बाद अंतिम एक महीने में एक बार फिर मोदी अजेंडा सेट करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें यहीं मात देने की दरकार है।

विपक्षी दल चुनाव प्रचार के दौरान इस बार पीएम मोदी को घेरने की एक खास रणनीति पर काम कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी आम चुनाव में 100 से अधिक रैलियां करेंगे। तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, मायावती सहित तमाम क्षेत्रीय नेताओं ने मोदी के चुनावी प्रचार के हिसाब से ही अपना काउंटर अभियान चलाने पर काम करने के संकेत दिए हैं। यानी जहां मोदी, वहीं विपक्षियों की रैलियां होंगी। विपक्षी दलों की मीटिंग में तय हुआ है कि जहां-जहां पीएम मोदी रैलियां करेंगे, वहां-वहां उन्हें कवर करने के लिए साझी रणनीति रहेगी। हालांकि, यह रणनीति क्या रहेगी, इस बारे में खुलासा नहीं किया गया है। 2014 आम चुनाव में नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ चुनाव प्रचार में इतिहास रचा था, बल्कि नया मानक भी सेट किया था। 15 सिंतबर 2013 को भाजपा से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद मोदी ने कुल 437 रैलियां की थीं। उन्होंने 25 राज्यों का दौरा कर तीन लाख किलोमीटर से अधिक की यात्र की थी। भारत के इतिहास में किसी चुनाव में इस तरह का ऐतिहासिक चुनाव प्रचार किसी भी नेता ने नहीं किया था। मोदी ने 1350 रैलियां 3डी टेक्नोलॉजी से की थीं। उन्होंने 100 से अधिक चाय पर चर्चा की। दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 45 रैलियां ही कर पाए थे। इनमें से भी एक-तिहाई रैलियां कर्नाटक और नार्थ-ईस्ट में थीं।

बहरहाल, अब जबकि लोकसभा चुनाव का औपचारिक एलान हो चुका है तब यह आकलन करने का मुफीद वक्त है कि इस चुनाव के मुद्दे क्या हैं? वैसे तो अनेक मुद्दे हैं पर चुनाव का सबसे प्रमुख मुद्दा ब्रांड मोदी खुद ही हैं। ब्रांड मोदी पिछले चुनाव में विकास का पर्याय बना था पर इस बार पाकिस्तान का संहारक है। इस बार बालाकोट और पुलवामा ब्रांड मोदी के अस्त्र हैं और काला धन और विकास पीछे हैं। पिछली बार नारा था ‘अच्छे दिन’ तो इस बार नारा है ‘घर में घुस कर मारूंगा!’ पिछले चुनाव में मोदी कैंप ने बेहद व्यवस्थित एवं आधुनिक तौर-तरीकों से प्रचार की शुरुआत की थी। कल्पनाओं को ध्वस्त करते हुए नरेंद्र मोदी 2014 का आम चुनाव जीते। उन्होंने अपनी पार्टी, पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेतागण और एक हद तक आरएसएस को भी नेपथ्य में कर दिया। आज मोदी भारतीय राजनीति के सबसे बड़े ब्रांड बन चुके हैं और चुनाव प्रचार का जो परचम दिखाई दे रहा है उस पर भाजपा नहीं सिर्फ मोदी नाम की संज्ञा लहरा रही है। खुद की छवि को चुनाव का एजेंडा बनाने में मोदी पूरी तरह सफल हैं। विपक्ष को इस बार चुनाव में जीत दर्ज करनी है, तो मोदी ब्रांड को न सिर्फ तोड़ना होगा, बल्कि खुद को जनता के सामने उनसे भी बड़ा ब्रांड साबित करना होगा। हालांकि, यह आसान नहीं है। पूरा देश धीरे-धीरे चुनावी मोड में जा रहा है और विपक्ष के पास समय बेहद कम है। कांग्रेस को छोड़ जितने दल विपक्षी एकता का दम दिखा रहे हैं, वे राज्यों तक सीमित हैं। कहने का अर्थ यह है कि विपक्षी दलों की स्वीकार्यता अब भी दिखनी शेष है।

कुल मिलाकर, अगले कुछ दिनों में यह तय हो जाएगा कि अगले पांच साल देश की सत्ता किसके हाथ रहेगी। मोदी ब्रांड का जादू चलेगा या फिर विपक्षी एकता मैदान मार लेगी। जो भी हो, इस बार का चुनाव बेहद ही दिलचस्प होने जा रहा है। जनहित के मुद्दों के साथ ही एयर स्ट्राइक और आतंकवाद को लेकर मोदी आक्रामक शैली में प्रचार करेंगे। तो विपक्ष यह बताने की कोशिश करेगा कि सेना की कार्रवाई का राजनीतिकरण किया जा रहा है। जो भी हो, अभी देश राष्ट्रवाद के साये में है। विपक्ष अगर सेना के पराक्रम पर सवाल या फिर पाकिस्तान को लेकर सॉफ्ट रुख दिखाता है, तो पूरा गेम उलट सकता है।
प्रो. रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

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