भारत-पाक तनाव का चुनाव में असर

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Air Strikes Affect Election

राज एक्सप्रेस, भोपाल। पुलवामा हमले के बाद भारत की एयर स्ट्राइक  (Air Strikes Affect Election) और सीमा पर तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। पीएम की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही देश एक बार फिर से विशुद्ध राजनीतिक मुद्दे की तरफ लौट रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पर आतंकवाद और भारत-पाक के बीच बढ़ते तनाव जैसे मुद्दों को भाजपा के नेता भी मान रहे हैं कि इससे उन्हें बढ़त मिली है। यह तय है कि चुनावी समर में एयर स्ट्राइक असर दिखाएगी।

पुलवामा हमले के बाद भारत की एयर स्ट्राइक और भारत-पाक सीमा पर तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। मार्केट विशेषज्ञ और राजनीति के जानकारों का ऐसा मानना है कि पीएम की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही देश एक बार फिर से विशुद्ध राजनीतिक मुद्दे की तरफ लौट रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पर आतंकवाद और भारत-पाक के बीच बढ़ते तनाव जैसे मुद्दों को भाजपा के नेता भी मान रहे हैं कि इससे उन्हें बढ़त मिली है। आर्थिक स्तर पर सरकार के सामने जो चुनौतियां हैं जैसे जीडीपी का घटना, बेरोजगारी बढ़ना, किसानों की समस्या जैसे मुद्दे फिलहाल पर्दे के पीछे चले गए हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच अब तक तीन बार युद्ध हुए हैं 1965 में, 1971 और 1999 में। 1965 युद्ध के 2 साल बाद हुए 1967 चुनाव में कांग्रेस की 361 सीटें घटकर 283 जरूर हुई। 1971 के युद्ध के आठ महीने बाद चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई। इन तीन युद्धों में सिर्फ 1999 में करगिल में हुआ युद्ध ही था जिसके बाद हुए चुनावों में स्थिति बहुमत से थोड़ी अलग रही। करगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 तक चला और इसके बाद हुए चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी के सीटों में कुछ खास इजाफा नहीं हुआ, लेकिन वोट फीसदी जरूर बढ़ा।

1999 में करगिल युद्ध के ठीक बाद हुए लोकसभा चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा को 182 सीटें ही मिलीं। यह 1998 लोकसभा चुनावों के सीट संख्या के हिसाब से बराबर थी। हालांकि, वोट फीसदी में 1.84 फीसदी की वृद्धि जरूर हुई। इसका सामान्य अर्थ यह लिया जा सकता है कि वोट फीसदी में हुआ इजाफा करगिल युद्ध में विजय के कारण वाजपेयी सरकार की ओर सकारात्मक अंदाज में बदला था। दिलचस्प बात यह है कि करगिल युद्ध में भाजपा का कुल वोट शेयर बढ़ा, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह 9 फीसदी तक जरूर घट गया। 1998 के चुनावों में बीजेपी को जहां 57 लोकसभा सीटें मिली थीं, वह घटकर 29 तक ही रह गया। भाजपा को कुछ दूसरे बड़े राज्यों जैसे पंजाब में भी सीटों का नुकसान झेलना पड़ा था। इन दोनों ही बड़े प्रदेशों में दो महीने चले युद्ध और विजय की भावना का कुछ खास सकारात्मक असर नहीं पड़ा। इसका यह अर्थ निकाला जा सकता है कि इन दोनों राज्यों में करगिल युद्ध विजय कोई मायने नहीं रहा। फिर करगिल युद्ध विजय का प्रभाव जनमानस पर नहीं पड़ने की बात से भी विश्लेषक पूरी तरह सहमत नहीं है। इस तर्क के विरोध में दूसरा तर्क है कि करगिल युद्ध के दौरान वाजपेयी सरकार कोई स्थिर सरकार नहीं थी बल्कि उसे जोड़-तोड़ की कामचलाऊ सरकार तक कहा जा रहा था। इसके बावजूद कोई खास उपलब्धि नहीं होने के बाद भी 1999 चुनावों में भाजपा की सीटें कम नहीं हुई, यह अपने आप में एक बड़ा संकेत है।

दूसरी ओर कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भाजपा की सीटें कम नहीं हुईं और वह उस वक्त तक में भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इस प्रदर्शन का बड़ा क्रेडिट शानदार वक्ता पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व को भी जाता है। कुछ राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि कांग्रेस अपनी राजनीति में ही उलझी थी और बागी नेताओं से जूझ रही थी। इस वक्त के हालात देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी हर रैली और सार्वजनिक कार्यक्रम में एयर स्ट्राइक का जिक्र करते हैं। विपक्ष एयर स्ट्राइक के सबूत मांग रहा है और पीएम विपक्ष पर इसे लेकर हमला बोल रहे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए कह सकते हैं कि यह मुद्दा कितना लंबा जाएगा, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि 2019 चुनावों में क्या और कैसे यह मुद्दा प्रभावित करेगा। यह पहले से ही कहा जा रहा है कि इस बार दो दशक बाद फिर राष्ट्रवाद के साये में आम चुनाव होगा। पुलवामा हमला मामले में पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के तहत भारतीय वायुसेना के सर्जिकल-2 को अंजाम देने के बाद भाजपा गदगद है। पार्टी को उम्मीद है कि इस कार्रवाई से 1999 में कारगिल युद्घ के बाद बही राष्ट्रवादी बयार बीते आम चुनाव की तरह पीएम मोदी के पक्ष में लहर पैदा करेगी। गौरतलब है कि तब एक वोट से सरकार गिरने के बाद कारगिल युद्घ के कारण पूरे देश में बही राष्ट्रवादी बयार ने भाजपा की सत्ता में वापसी करा दी थी। तब महज 114 सीटों पर सिमटी कांग्रेस को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा था।

भाजपा के रणनीतिकारों की माने तो पाक के खिलाफ इस कार्रवाई ने एक बार फिर से पूरे आम चुनाव को राष्ट्रवाद पर केंद्रित कर दिया है। राष्ट्रवाद के साये में होने वाले आम चुनाव में पार्टी के पास सबसे बड़ा राष्ट्रवादी सियासी चेहरा पीएम मोदी है। विपक्षी एक और बड़े राज्यों में विपक्षी गठबंधन से चिंता में पड़ी पार्टी इस चुनाव को किसी भी तरह से स्थानीय मुद्दों के इतर नेतृत्व के मुद्दे पर केंद्रित करना चाहती थी। अब वायु सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही न सिर्फ सारे स्थानीय मुद्दों के हवा हो जाने की संभावना बन गई है, बल्कि पार्टी को यह भी लगता है कि निर्णायक पीएम के सवाल पर अपने अपने राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय दलों को भी बीते चुनाव की तरह इस बार भी नुकसान उठाना होगा। गौरतलब है कि तब कई राज्यों में लोगों ने क्षेत्रीय पार्टी से नाराजगी न होने के बावजूद महज मोदी के नाम पर भाजपा के पक्ष में वोट दिया। पिछले दिनों राजस्थान की जनसभा से भाजपा ने इस मुद्दे को भुनाने की रणनीति को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। अब चुनाव तक पार्टी के सभी नेता जनसभाओं में अपने भाषण को मुख्य रूप से इसी मुद्दे पर केंद्रित रखेंगे। इसके अलावा पार्टी राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर लगातार राजनीतिक कार्यक्रमों का आयोजन करेगी। इस दौरान पीएम की छवि को भुनाने की भी रणनीति बनी है। बीते सदी के अंत साल 1999 में हुए आम चुनाव में वर्ष 1998 में हुए कारगिल युद्घ के कारण बही राष्ट्रवादी बयार में भाजपा ने अपनी सत्ता बचा ली थी। इससे पहले एक वोट से सरकार गिरने के बाद अगले चुनाव के परिणामों के प्रति भाजपा आशंकित थी। मगर इस चुनाव में पार्टी ने न सिर्फ अपना 182 सीटों का रिकार्ड कायम रखा, बल्कि कांग्रेस के सीटों की संख्या 141 से घट कर 114 रह गई। यह कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी हार थी। हालांकि वर्ष 2014 के चुनाव में महज 44 सीटें हासिल कर कांग्रेस ने करारी हार का अपना ही कीर्तिमान ध्वस्त कर लिया।

बहरहाल, पुलवामा की घटना के बाद भाजपा इस मुद्दे को हाथ से नहीं जाने देना चाहती। इसीलिए पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अब एयर स्ट्राइक का मुद्दा भी जुड़ने जा रहा है। चुनाव प्रचार में भी इसका खासा जिक्र होगा। लोकसभा चुनावों के लिए गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में बनी पार्टी संकल्प पत्र यानी घोषणा पत्र समिति एयर स्ट्राइक की बड़ी सफलता और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में लाने को भी घोषणा पत्र में शामिल करेगी। पार्टी का मानना है कि 2014 के चुनाव में भी कई तरह के सामाजिक समीकरणों की चर्चा थी, लेकिन नतीजों में वे नहीं चले। इस बार भी विपक्ष सामाजिक समीकरणों को लेकर गणित बना रहा है, लेकिन नेताओं का दावा है कि 2019 में 2014 के चुनाव से भी बड़ी सफलता भाजपा को मिलेगी।
एसआर सचान (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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