राजनीतिक क्रांति के जनक थे पर्रिकर

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Manohar Parrikar Death

राज एक्सप्रेस, भोपाल। भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत, सादगी और बौद्धिक प्रतिभा के बल पर मनोहर पर्रिकर (Manohar Parrikar Death) का कद मजबूत होता चला गया। ये चीजें पर्रिकर को अन्य राजनीतिज्ञों से जुदा करती थीं। जनता के प्रति जुड़ाव, सादगी और किसी के साथ भेदभाव न करने की उनकी आदत भले ही लोगों को अच्छी लगती रही हो, मगर उसे हम सब को आत्मसात करने की जरूरत है। खासकर हमारे नेताओं को। यह मनोहर पर्रिकर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

मनोहर पर्रिकर की शख्सियत सबसे जुदा थी। वह एक ऐसे कुशल रणनीतिकार थे, जो दूसरों की चाल को पहले ही भांप लिया करते थे। वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले इंसान भी थे। आप उनको चाहें या फिर न चाहें लेकिन उनको नजरअंदाज नहीं कर सकते। चाहे वह सरकार में रहते या बाहर, पर्रिकर हमेशा भाजपा के पर्यायवाची रहते थे यानी पर्रिकर मतलब भाजपा। अगर उनका कद बढ़ा तो पार्टी का दायरा भी बढ़ा। भाजपा ने 1989 में गोवा में सिर्फ चार हजार सदस्यों के साथ शुरुआत की थी, लेकिन जब पर्रिकर पूरी तरह राजनीति में रच-बस गए तो एक ऐसे राज्य में भाजपा के 4.2 लाख सदस्य बन गए जहां की कुल आबादी ही करीब 15 लाख है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक अनुशासित कार्यकर्ता पर्रिकर का आरएसएस से जुड़ाव उनके बचपन के दिनों में ही हो गया था जो बाद में और मजबूत होता गया। आईआईटी-बॉम्बे में पढ़ाई के दौरान भी उनका संघ से गहरा नाता रहा। आईआईटी-बॉम्बे में पोस्ट ग्रैजुएशन की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर जब गोवा वापस आ गए तो पर्रिकर संघचालक के तौर पर अपनी सेवा देते रहे। बाद में संघ ने उनको राजनीति में उतारने का फैसला किया। पर्रिकर की राजनीतिक शुरुआत मजबूत तो नहीं रही लेकिन बाद में उनका राजनीतिक कद मजबूत होता गया। 1988 में संघ ने पर्रिकर को पार्टी में भेजने का फैसला किया। वर्ष 1991 में भाजपा ने उनसे उत्तरी गोवा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने को कहा। उस समय भाजपा की राज्य की राजनीति में मौजूदगी न के बराबर थी। लोकसभा के पहले चुनाव में उनको लगभग 25 हजार वोट पड़े। इससे पार्टी का उत्साह बढ़ा और उनको सक्रिय राजनीति में लाने का फैसला किया।

तीन साल के अंदर ही पर्रिकर एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ बन गए और बाद में पणजी विधानसभा सीट से निर्वाचित हुए। मापुसा के रहने वाले पर्रिकर ने वर्ष 1994 में कांग्रेस की सीट पर अपना परचम लहरा दिया। तब से पणजी की सीट भाजपा का मजबूत गढ़ रही। साल 1994 भाजपा और पर्रिकर के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक था। उसी साल भाजपा का चार विधायकों के साथ गोवा विधानसभा में प्रवेश हुआ। पर्रिकर पणजी के पहले विधायक थे जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले योद्धा के तौर पर गोवा के राजनीतिक इतिहास को नए सिरे से लिखा। पर्रिकर सोशल इंजीनियरिंग के भी माहिर थे। उन्होंने जाति व धर्म से ऊपर उठकर एक लकीर खींच दी। संघ से विरासत में मिली सादगी और अनुशासन को उन्होंने आखिरी सांस तक बरकरार रखा, लेकिन जब राजनीतिक समीकरण की बात आई तो व्यावहारिक कदम उठाया। नामांकन पर्चा दाखिल करने से पहले आशीर्वाद लेने के लिए चर्च जाना हो या फिर राज्य के कैथोलिक समुदाय के बीच पैठ बनाना, पर्रिकर ने आरएसएस कार्यकर्ता की छवि से बाहर निकलने के लिए आईआईटियन टैग व बौद्धिक प्रतिभा का इस्तेमाल किया। उनके अंदर विरोधियों की चाल को पहले ही भांप लेने व उनको मात देने की अद्भुत प्रतिभा थी। उन्होंने अपनी इन प्रतिभाओं के बल पर जल्द ही पूरे राज्य में भाजपा को स्थापित कर दिया।

उन्होंने गोवा राज्य की राजनीति को अच्छी तरह से भांप लिया। राज्य में 27 फीसदी क्रिश्चियन आबादी थी। उन्होंने चर्च से शीघ्र खाई को पाटा और ऐसा रुख अपनाया जो पार्टी के विचार के विपरीत था। उन्होंने अपने ढंग से अल्पसंख्यकों, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को खुश करने के लिए काम किया। वह ‘सबका साथ, सबका विकास’ के असल पुरोधा थे। आरएसएस के मनपसंद होने के साथ-साथ उन्होंने अल्पसंख्यकों के बीच भी अच्छी पैठ बनाई। 2012 के राज्य के चुनाव में जब पार्टी को अपने दम पर 40 सदस्यों वाली विधानसभा में 21 सीटों के साथ बहुमत मिला तो एक तिहाई विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से ही थे। उनके काफी करीबी और पार्टी के लिए साथ काम करने वाले पार्टी के नेता कहते रहे हैं कि उनकी शैक्षिक योग्यताएं एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने की हिम्मत और राज्य के विकास के लिए एक विजन ने पार्टी को मजबूत होने में मदद की। इसलिए जब 2000 में वह 44 साल की कम उम्र में देश के पहले आईआईटियन मुख्यमंत्री बने तो गोवा के बहुत से लोगों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वह जब मुख्यमंत्री बने तो सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था, लेकिना फाइलों और समस्याओं के अध्ययन में गहरी दिलचस्पी और लोगों की नब्ज पकड़ने की उनकी प्रतिभा ने उनकी मदद की। इस तरह उनका कद मजबूत होता चला गया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी पर्रिकर नहीं बदले जिससे वह जनमानस के चहेते बनते चले गए। उनकी लोकप्रियता न सिर्फ राज्य बल्कि देशभर में फैल गई। उनकी पोशाक साधारण होती थी और हमेशा उनके पैरों में ट्रेडमार्क चप्पल ने उनके व्यक्तित्व को बुलंद किया। उन्होंने अपनी आधिकारिक कार में बत्ती लगाने की परंपरा को पहले दिन से न कहा, अपनी आधिकारिक गाड़ी में ड्राइवर के बगल में बैठना शुरू किया, गोवा को राज्य का दर्जा मिलने के बाद लोगों की पहुंच में रहने वाले मुख्यमंत्री बने तथा नई-नई योजनाएं शुरू कीं और भ्रष्ट नेताओं को गिरफ्तार करने का साहस एवं ताकत दिखाई। इससे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ और बढ़ता चला गया। प्राय: नेताओं के समर्थक होते हैं, लेकिन गोवा के 4 बार सीएम रहे मनोहर पर्रिकर के चाहने वालों की कमी नहीं थी। नेताओं से लेकर आम जनता तक उन्हें प्यार करती थी। लोगों संग कहीं भी खड़े होकर चाय पीना, स्कूटर पर घूमना, बेहद सादे कपड़े पहनाना और तामझाम से परे रहना, उनका यह अंदाज लोगों को बहुत लुभाता था।

अब जबकि लंबी बीमारी के बाद मनोहर पर्रिकर हम सभी को छोड़कर चले गए हैं, तो यह सभी के लिए गहरा आघात है। पिछले कुछ दिनों से उनके स्वास्थ्य में आ रही गिरावट से हर कोई चिंतित था, मगर यह विश्वास भी था कि वे फिर से स्वस्थ होकर लौट आएंगे। मगर ऐसा हो नहीं सका। शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। मनोहर पर्रिकर अब भले ही हमारे बीच न हों, मगर उनको देश में राजनीति के भविष्य के संकेतों को समझने वाले के तौर पर भी देखा जाएगा। 2013 में पर्रिकर भाजपा के पहले अग्रणी नेताओं में से थे जिन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी का नाम उस वक्त भाजपा के पीएम कैंडिडेट के तौर पर आगे किया था। गोवा में भाजपा की सत्ता में वापसी कराने और गठबंधन के साथ सरकार चलाने के लिए भी भाजपा आलाकमान ने पर्रिकर पर ही भरोसा किया। 2017 में गोवा चुनाव के बाद भाजपा को बहुमत लायक सीटें नहीं मिली थीं, पर वे दिल्ली से गोवा पहुंचे और आखिरकार जोड़तोड़ के बाद सरकार बनाने में कामयाब रहे।

पहले मुख्यमंत्री, फिर रक्षा मंत्री के रूप में भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत, सादगी और बौद्धिक प्रतिभा के बल पर मनोहर पर्रिकर का कद मजबूत होता चला गया। ये चीजें पर्रिकर को अन्य राजनीतिज्ञों से जुदा करती थीं। जनता के प्रति जुड़ाव, सादगी व किसी के साथ भेदभाव न करने की उनकी आदत भले ही लोगों को अच्छी लगती रही हो, पर उसे हम सब को आत्मसात करने की जरूरत है। खासकर हमारे नेताओं को, जिन्होंने राजनीति को जनता की सेवा के बजाय खुद के लिए मेवा कमाने का जरिया मान लिया है। अगर हम उनके एक भी गुण को अपने जीवन में उतार लें, तो यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जयप्रकाश श्रीवास्तव (वरिष्ठ पत्रकार)

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