राष्ट्रवाद के साये में आम चुनाव

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General Election

राज एक्सप्रेस, भोपाल। पुलवामा हमले से पहले तक केंद्र सरकार की नाकामी गिना रहा विपक्ष अब मोदी के हाथ से एयर स्ट्राइक का फायदा छीन लेना चाहता है (General Election)। एयर स्ट्राइक को लेकर सत्ता व विपक्षी खेमे में जारी हलचल देखने के बाद कहा जा सकता है कि चुनाव राष्ट्रवाद की ओर जा रहा है।

पुलवामा हमले के पहले तक राफेल, बेरोजगारी और महंगाई के चुनाव में बड़ा मुद्दा बनने की प्रबल संभावना थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर समूचा विपक्ष इन मुद्दों पर सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की ताक में था, मगर आतंकी हमले के बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। अब बात न तो जनता की हो रही है और न ही समस्याओं की। भाजपा एयर स्ट्राइक को सेना की बड़ी कामयाबी के बहाने अपनी पीठ थपथपा रही है, तो कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष भाजपा के हाथ से एयर स्ट्राइक का फायदा छीन लेना चाहता है। हमले के बाद सेना एवं देश के साथ खड़ा रहने वाला विपक्ष जब एयर स्ट्राइक के बाद सबूत मांगने पर उतर पड़ा, तो भाजपा ने इसे राष्ट्र के साथ धोखा करार दे दिया। अब भाजपा और विपक्ष खेमे में अपने-अपने अंदाज में बड़ा राष्ट्र भक्त दिखने की होड़ शुरू हो गई है। दोनों खेमों में जारी हलचल के संकेत स्पष्ट हैं कि आम चुनाव राष्ट्र के साये में ही होने वाला है।

अगर ऐसा होता है, जिसकी संभावना कुछ ज्यादा ही है, तो दो दशक बाद होने वाला आम चुनाव राष्ट्रवाद के साये में होगा। पुलवामा हमला मामले में पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के तहत भारतीय वायु सेना के सर्जिकल-2 को अंजाम देने के बाद भाजपा गदगद है। पार्टी को उम्मीद है कि इस कार्रवाई से वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के बाद बही राष्ट्रवादी बयार तब के आम चुनाव की तरह पीएम मोदी के पक्ष में लहर पैदा करेगी। गौरतलब है कि तब एक वोट से सरकार गिरने के बाद कारगिल युद्ध के कारण देश में बही राष्ट्रवादी बयार ने भाजपा की सत्ता में वापसी करा दी थी। तब सिर्फ 114 सीटों पर सिमटी कांग्रेस को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा के रणनीतिकारों की मानें तो पाकिस्तान के खिलाफ इस कार्रवाई ने एक बार फिर से पूरे आमचुनाव को राष्ट्रवाद पर केंद्रित कर दिया है। राष्ट्रवाद के साये में होने वाले आम चुनाव में पार्टी के पास सबसे बड़ा राष्ट्रवादी सियासी चेहरा पीएम नरेंद्र मोदी है।
विपक्षी एका और बड़े राज्यों में विपक्षी गठबंधन से चिंता में पड़ी पार्टी इस चुनाव को किसी भी तरह से स्थानीय मुद्दों के इतर नेतृत्व के मुद्दे पर केंद्रित करना चाहती थी।

वायु सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही न सिर्फ सारे स्थानीय मुद्दों के हवा हो जाने की संभावना बन गई है, बल्कि पार्टी को भी लगता है कि निर्णायक पीएम के सवाल पर अपने अपने राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय दलों को भी बीते चुनाव की तरह इस बार भी नुकसान उठाना होगा। गौरतलब है कि तब कई राज्यों में लोगों ने क्षेत्रीय पार्टी से नाराजगी न होने के बावजूद महज मोदी के नाम पर भाजपा के पक्ष में वोट दिया। बीते सदी के अंत साल 1999 में हुए आम चुनाव में 1998 में हुए कारगिल युद्ध के कारण बही राष्ट्रवादी बयार में भाजपा ने अपनी सत्ता बचा ली थी। इससे पहले एक वोट से सरकार गिरने के बाद अगले चुनाव के परिणामों के प्रति भाजपा आशंकित थी।

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