नेताओं की जुबान पर लगाम जरूरी

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Election Commission Bans

राज एक्सप्रेस, भोपाल। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद ही सही (Election Commission Bans) चुनाव आयोग ने नेताओं के बिगड़ैल बोल पर लगाम लगाने का जो फैसला किया है, वह बिल्कुल सही है। यह सख्ती रंग लाएगी और अब शायद ही कोई नेता किसी समाज या फिर वर्ग विशेष के खिलाफ जहर उगलने की सोचेगा।

चुनाव के मौसम में नेताओं के बिगड़े बोल पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद ही सही निर्वाचन आयोग ने लगाम लगाने का जो फैसला किया है, वह बिल्कुल सही है। लगातार खराब होती जा रही नेताओं की जुबान पर ताला लगाने की मांग काफी अरसे से की जा रही थी, मगर कानून के अभाव में चुनाव आयोग के हाथ बंधे थे और वह भी आम भारतीय की तरह नेताओं की लगातार जहरीली होती जा रही जुबान की नौटंकी देखने को विवश था। भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जिसने चुनाव आयोग को नींद से जगाया और कार्रवाई करने को कहा। कोर्ट की सख्ती के तत्काल बाद आयोग ने उत्तरप्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को 72 घंटे जबकि बसपा सुप्रीमो मायावती को अगले 48 घंटे तक किसी भी तरह के चुनाव प्रचार से रोक दिया। इनके अलावा भाजपा नेता मेनका गांधी को 48 घंटे और सपा के नेता आजम खान को 72 घंटे तक प्रचार करने से रोक दिया। हेट स्पीच पर इसे आयोग की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई बताया जा रहा है। साथ ही इस फैसले को भाजपा और बसपा के लिए बड़ा झटका भी कहा जा रहा है।

बहरहाल, चुनाव आयोग की यह सख्ती रंग लाएगी और अब शायद ही कोई नेता अपनी रैली में किसी समाज या वर्ग विशेष के खिलाफ जहर उगलने की सोचेगा। यह फैसला राजनीति की शुचिता को बरकरार रखने में मील का पत्थर साबित होगा, क्योंकि कार्रवाई की प्रथा अब सिर्फ इसी चुनाव में नहीं, बल्कि आने वाले हर चुनाव में लागू होगी। चुनाव में हेट स्पीच के मामले पिछले कुछ वर्षो में बढ़े हैं, वरना इससे पहले के चुनाव विचारों, विकास और मुद्दों पर लड़े जाते थे। नेता जनता के बीच जाकर सलीके से विपक्ष पर वार करते थे और खुद के पक्ष में प्रचार करते थे। यह 80 तक का दशक था। इसके बाद गठबंधन व क्षेत्रीय दलों का जन्म हुआ। इसके बाद राजनीति दोयम होती गई। अब न तो नेताओं का चरित्र बचा और न ही उनकी जुबान की कोई गरिमा। जिसके मुंह में जो आया, बोल गया। उसका असर देश और समाज पर क्या पड़ा, इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। नेता अपनी ही धुन में लगे रहते हैं।

वैसे, देखा जाए तो नेताओं की हेट स्पीच को बढ़ावा देने वाली जनता ही है। अगर जनता अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभाती और देश तथा समाज के खिलाफ जहर उगलने वालों को पहली बार में ही खारिज कर देती, तो आगे से किसी नेता की विवादित बयान देने की हिम्मत तक नहीं होती। लिहाजा आगे से हमें सतर्क रहना होगा और ऐसे नेताओं को कतई स्वीकार नहीं करना होगा, जो चुनाव जीतने के लिए न तो अपनी और न ही देश की गरिमा का मान रखते हैं। वैसे, देखा जाए तो निर्वाचन आयोग की यह कार्रवाई सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसलिए जरूरी है कि नेताओं पर सख्ती लगातार की जाती रहे। ताकि चुनाव हो या न हो, नेता अपनी जुबान पर काबू रखें और देश-समाज में वैमनस्यता का वातावरण न फैले।

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