चुनावी चंदे में पारदर्शिता जरूरी

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Election Funds

राज एक्सप्रेस, भोपाल। चुनावी चंदे (Election Funds) में पारदर्शिता के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पार्टियों से कहा है कि, वे उन लोगों के नाम चुनाव आयोग को बताएं, जिन्होंने इलेक्टोरल बांड के जरिए चंदा दिया है। अब पार्टियों की जिम्मेदारी है कि वे आदेश का पालन करें और चुनावी चंदे में पारदर्शिता का संकट दूर करें।

चुनाव प्रणाली को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के मकसद से राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर नजर रखने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है। इसे लेकर कुछ नियम-कायदे भी बने, पर कम ही पार्टियां उनका पालन करती हैं। यही वजह है कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर हमेशा से पारदर्शिता की अंगुली उठती रही है। अब सुप्रीम कोर्ट ने चंदे के प्रति सख्ती दिखाते हुए राजनीतिक दलों को जो निर्देश दिया है, उसे चुनाव सुधार के साथ ही राजनीति में कालेधन के बढ़ते इस्तेमाल के बाबत उठाया गया सख्त कदम माना जाना चाहिए। चुनावी बॉन्ड्स की वैधता को लेकर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सभी दलों को इसके तहत मिले फंड की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि सभी दल 15 मई तक मिलने वाली डोनेशन की जानकारी 30 मई तक चुनाव आयोग को सीलबंद लिफाफे में सौंपें।

कोर्ट ने कहा है कि राजनीतिक दलों को बताना होगा कि उन्हें चुनावी बॉन्ड्स के जरिए किससे कितनी रकम मिली है। यही नहीं उन्हें उस खाते का भी जिक्र करना होगा, जिसमें रकम ट्रांसफर हुई है। बता दें कि भाजपा को साल 2016-17 और 2017-18 में 997 करोड़ और 990 करोड़ रुपए दान में मिले हैं। यह राशि कांग्रेस को इसी समय में मिले दान की राशि से पांच गुना ज्यादा है। चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि साल 2017-18 में भाजपा को 520 इलेक्टॉरल बॉन्ड मिले, जिनकी कीमत 222 करोड़ रुपए है, पार्टी ने इसमें से 511 इलेक्टोरल बॉन्ड रिडीम किए, जिनकी कीमत कुल 221 करोड़ रुपए है। मगर यह धन कहां से आया इसकी कोई जानकारी नहीं है। ऐसा ही दूसरी पार्टियों के साथ भी है। कानूनन राजनीतिक दल 20 हजार से अधिक के नकद चंदे को ही सार्वजनिक करने के लिए बाध्य होते हैं। लिहाजा इनको मिले चंदे में करीब 70 फीसदी हिस्सा इस तय सीमा से कम के चंदों का होता था। चंदे के यही बेनामी स्रोत सारे फसाद की जड़ हैं।

इसी समस्या से निजात पाने के लिए मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बांड लाने का फैसला किया था, मगर असलियत में कुछ नहीं बदला। कानूनी उपायों की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि राजनीतिक दलों की नीयत ही साफ नहीं है। राजनीतिक दलों को अभी तक सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं लाया गया क्योंकि राजनीतिक दल ऐसा चाहते ही नहीं। अब जबकि चुनावी बांडों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपना नजरिया साफ कर दिया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि राजनीति में कालेधन के दिन लदने वाले हैं। अगर पार्टियों ने अगर-मगर में मामले को नहीं फंसाया। चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता का अभाव बड़ी चुनौती है। देश के लोगों को अब पता लगना ही चाहिए कि किस राजनीतिक पार्टी को कौन-कौन सी कंपनी कितना चंदा दे रही है। इसी पारदर्शिता से सब कुछ साफ हो जाएगा।

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