Kishor Aparadh: किशोरावस्था में अपराध सोचनीय

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Kishor Aparadh

राज एक्सप्रेस, भोपाल। Kishor Aparadh: पहले लोग दूसरों की खुशी में खुश हो जाते थे, पर आज अहं केंद्रित समाज सिर्फ अपने लिए सोच रहा है। ऐसे में गलती एक किशोर या किशोरी की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। अगर समय रहते हमने मूल्यों की पुनस्र्थापना के बारे में नहीं सोचा, तो एक अज्ञात भय निश्चित हमें अपनी गिरफ्त में ले लेगा। ऐसे में सामाजिक संस्थाओं को जिम्मेदारी का भरपूर निर्वाह करना होगा और बच्चों के स्वस्थ समाजीकरण पर ध्यान देना होगा।

किशोरावस्था व्यक्ति के जीवन का वह नाजुक दौर होता है, जब बहुत आसानी से कदम डगमगा सकते हैं। जब व्यक्ति अधीर हो उठता है अपनी मनचाही वस्तु को पाने के लिए। जब अनुशासन और नियंत्रण से दूरी बनाना ही उसका लक्ष्य हो जाता है और इस तरह किसी दिन आपराधिक घटना घट जाती है। कभी-कभी घटनाएं इतनी संगीन हो जाती हैं कि पूरा देश सिहर जाता है। दिल्ली के निर्भया कांड ने पूरे देश को उद्वेलित किया था। उस परिणाम स्वरूप कानूनों में कई अहम बदलाव किए गए। दंड विधान को और कठोर बनाया गया। निर्भया के बाद शक्ति मिल्स, मुंबई में दो बलाकार की घटनाएं प्रकाश में आईं, जिनमें फिर किशोर आयु के युवक की संलिप्तता उजागर हुई। इसी तरह रेयान इंटरनेशनल स्कूल के एक छात्र की निर्मम हत्या में भी एक किशोर की पहचान की गई। लखनऊ में सातवीं कक्षा की एक छात्र ने एक बच्चे को चाकू से वार कर जख्मी कर दिया। फिर दिल्ली में बारहवीं के एक छात्र ने अपनी प्रिंसिपल को गोलियों से भून दिया। ये सभी किशोर और किशोरियां किसी न किसी विद्यालय के विद्यार्थी थे। उन पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक दबाव की परिणति गंभीर अपराधों में देखने को मिली।

अल्बर्ट के. कोहेन पहले अपराधशास्त्री हैं, जिन्होंने किशोर अपराध को अध्ययन का विषय बनाया। सन 1955 में पुस्तक में उन्होंने किशोर अपराध का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने मध्यवर्गीय व श्रमिक वर्ग के बालकों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि कैसे श्रमिक वर्ग के बालकों को उपलब्ध सुविधाएं देख कर निम्नवर्ग के बालकों में नैराश्य जन्म लेता है। इसकी वजह से उनमें प्रतिक्रिया पैदा होती और किशोर वय के निम्नवर्गीय बालकों में अपचारी अपसंस्कृति पैदा होने लगती है। वे भी मध्यवर्गीय बालकों वाले लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं। पर साधनों के अभाव में वे गलत रास्ता चुन लेते हैं। कोहेन आगे कहते हैं कि मध्यवर्ग के मूल्यों और मान्यताओं को ही मानदंड मान कर किसी भी व्यवहार की विवेचना की जाती है। मसलन, महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए गहन अध्ययन करना पड़ता है, पर निम्न मध्यवर्ग के बालक ऐसे मूल्यों और मान्यताओं से शासित नहीं हो पाते व अपचारी अपसंस्कृति को जन्म देते हैं।

इस प्रकार कोहेन ने यह बताने का प्रयास किया कि अपचारिता के शिकार ज्यादातर निम्नवर्ग के बालक होते हैं। हालांकि उनका यह सिद्धांत आलोचनाओं से परे नहीं रह पाया। निर्भया और शक्ति मिल्स में संलिप्त किशोर तो कोहेन के सिद्धांतों के तहत विश्लेषित हो जाते हैं, पर विद्यार्थियों की घटनाएं अलग ही प्रश्न उठाती हैं। किशोर अपचारिता के विश्लेषण के लिए जिन कानूनी प्रावधानों को व्याख्यायित किया जा सकता है, उनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 82 और 83 तथा किशोर न्याय अधिनियम 1986, किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम 2015 प्रमुख हैं। जहां तक भारतीय दंड संहिता की बात है, तो यह उल्लेखनीय है कि यह एक सामान्य कानून है और भाग चार के अपवाद खंड की दो धाराओं के जरिए यह स्पष्ट करता है कि सात वर्ष से नीचे के बालकों को अबोध माना जाता है और उन्हें आपराधिक दायित्व से पूर्ण उन्मुक्ति दी गई है, जबकि सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से नीचे के बालकों को सीमित उन्मुक्ति प्रदान की जाती है।

यह देखकर कि क्या उनकी समझ परिपक्व थी और वे परिणाम की प्रत्याशा में अपने कार्य करते हैं या उनकी समझ इतनी नहीं थी कि उनके कार्य और परिणाम के बीच एक तार्किक संबंध स्थापित किया जा सके। चूंकि किशोर न्याय अधिनियम विशिष्ट कानून है, इसलिए विधि सिद्धांतों के तहत विशिष्ट कानून सामान्य कानून के ऊपर अपना प्रभाव रखेंगे, जिसका सम्मिलित निष्कर्ष यह होगा कि सात वर्ष से ऊपर के बालक अगर परिपक्व हैं, तो किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों से शासित होंगे। किशोर न्याय अधिनियम में उत्तरोत्तर हो रहे परिवर्तनों को इस प्रकार समझा जा सकता है। एक ऐसे अधिनियम की आवश्यकता पूर्व में विद्यमान कानून के पुनरवलोकन में ऐसे अधिनियम की आवश्यकता को महसूस किया गया, जो एकरूप हो और जो पूरे भारत में लागू किया जा सके तथा जिससे अनौपचारिक व्यवस्था द्वारा उपेक्षित व अपचारी किशोरों की देखभाल, संरक्षण, उपचार, विकास और पुनर्वास किया जा सके।

इसलिए किशोर न्याय अधिनियम 1986 में सोलह वर्ष से कम उम्र के बालकों और 18 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं पर लागू हुआ। चूंकि इस अधिनियम में उपेक्षित और अपचारी किशोरों के लिए भिन्न व्यवस्था नहीं बनाई गई थी व लड़के और लड़कियों की उम्र में अंतर था, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल अधिकार अभिसमय 1989 के अनुसरण में किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम-2000 पारित हुआ, जिसमें उपेक्षित एवं अपचारी शब्दों को हटा कर देखभाल की आवश्यकता वाले बालक और विधि के संघर्ष में बालक और बालिकाओं को रखा गया। फिर किशोर न्याय देखभाल एवं संरक्षण अधिनियम-2015 पारित किया गया है। चूंकि निर्भया कांड के बाद आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम 2013 पारित हुआ और उसके बाद ऐसे किशोर, जो जघन्य अपराधों में संलिप्त होते हैं, उनके लिए विशिष्ट प्रावधान करने की आवश्यकता महसूस की गई।

वर्तमान अधिनियम की धारा-15 में प्रावधान किया गया कि अगर 16 से 18 वर्ष के बीच के बालक किसी जघन्य अपराध में लिप्त होंगे, तो किशोर न्याय बोर्ड ऐसे मामलों को हस्तांतरित कर सकेंगे व दंड प्रावधानों का भयकारी प्रभाव डालने के उद्देश्य से उसे जेल में भी डाला जा सकेगा। हालांकि इस पर जनहित याचिका भी दायर की गई। उस पर सुनवाई करने से सर्वोच्च न्यायालय ने इनकार कर दिया और कहा कि यह जनहित याचिका का विषय नहीं है। निर्भया कांड के बाद जब किशोर अभियुक्त के मामले पर सलिल बाली बनाम भारत संघ (2013) के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय द्वारा विचार किया गया तब न्यायाधीशों के समक्ष अनेक याचिकाएं इस आशय से प्रस्तुत की गईं कि बलात्कार और हत्या मामलों में किशोर को विशेष अधिनियम के तहत नहीं, बल्कि सामान्य अधिनियम के तहत विचार होना चाहिए।

हालांकि इस समय नए कानून के अस्तित्व में आने से वाद-विवाद बढ़ता जा रहा है, पर निष्कर्ष के तौर यह भलीभांति समझा जा सकता है कि जितने वयस्क लोग अपराध कर रहे हैं उनमें भी दंड के भयकारी प्रावधानों मात्र से कोई बहुत सकारात्मक तब्दीली नहीं आ पा रही है। ऐसे में समाज को सोचना पड़ेगा कि वह कहां और कैसे गलत हो रहा है। मध्यवर्ग, जो सबसे बड़ा जन समूह है, आज अपने मूल्यों से ही भटक गया है। पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति ने इसे दिग्भ्रमित कर दिया है। आज के अभिभावक अपने छह माह के बच्चे से भी ऐसी उम्मीदें लगा लेते हैं कि बस आज ही पूरी दुनिया में उसका नाम हो जाएगा। यही सोच बच्चों के स्वाभाविक विकास में बाधक बन रही है। उनमें दूसरों की भलाई और उनके सुख-दुख के बारे में सोचने का संस्कार ही नहीं पड़ पा रहा है।
शिवानी सिंह (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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