डोकलाम पर चीनी प्रभुत्व की जो स्थिति सामने आ रही, उससे भारत की सीमाएं बेहद असुरक्षित हो सकती

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डोकलाम पर चीनी प्रभुत्व की जो स्थिति सामने आ रही, उससे भारत की सीमाएं बेहद असुरक्षित हो सकती

उन्माद की राजनीति से सत्ता की सीढ़ियां तो चढ़ी जा सकती हैं, पर देश की सुरक्षा नहीं की जा सकती। एक तीसरे देश की सुरक्षा के बहाने भारत ने चीन की भू राजनीतिक व सामरिक घेराबंदी का प्रतिकार करने का हौसला दिखाने का जो दावा किया था, उसकी बदतरीन हकीकत अब सामने आ रही है। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने डोकलाम की गंभीर स्थिति को सामने लाते हुए कहा है कि यह क्षेत्र विवादित है और उत्तरी सीमा पर इस तरह का तनाव बड़े संघर्ष का रूप ले सकता है। सेना प्रमुख ने अपनी चिंता में इस क्षेत्र में चीन की सेना की मजबूत स्थिति की ओर भी इशारा किया है और भरोसा दिलाया है कि भारतीय सैनिक भी किसी भी स्थिति से निपटने को तैयार हैं। चीन ने डोकलाम में अपनी स्थिति को बेहद मजबूत करते हुए इस क्षेत्र के उत्तरी हिस्से में सात हेलीपैड बना लिए हैं और भारी सैन्य साजो सामान भी जमा कर लिया है।
इस समय डोकलाम के कई इलाकों में चीनी टैंक समेत सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, टैंक्स, आम्र्ड व्हीकल्स, ऑर्टिलरी सहित कई अन्य सैन्य उपकरणों की मौजूदगी है। कुछ जगहों पर बड़ी संख्या में हथियारों की तैनाती देखी जा सकती है। 16 जून 2017 को डोकलाम में सड़क बनाने पर दोनों देशों का विवाद 73 दिन चला था। बाद में यह दावा किया गया था कि दोनों देश इस जमीन से अपनी सेनाएं हटा रहे हैं, मगर ऐसा हुआ नहीं। डोकलाम पर चीनी प्रभुत्व की जो स्थिति सामने आ रही है उससे भारत की सीमाएं बेहद असुरक्षित हो सकती हैं। जाहिर है मनोवैज्ञानिक युद्धकला से चीन को नहीं रोका जा सकता। भूभाग के स्वामित्व के संकट निवारण को अनुकूल परिस्थितियों के इंतजार में टालकर आगे बढ़ना भारत की कूटनीति रही है और ऐसा लगता है कि मोदी सरकार भी चीन को लेकर यही नीति अपनाए हुए है। डोकलाम का चुम्बी घाटी के अंतर्गत यह इलाका भारत, भूटान और चीन की सीमाओं के लिए चौराहे जैसा है।
भारत और चीन के बीच के दो अहम र्दे नाथूला और जेलपला यहां खुलते हैं। इसके पतले आकार और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए इस गलियारे को भारत का चिकन नेक कहते हैं। पश्चिम बंगाल में स्थित यह गलियारा भारत की मुख्यभूमि को उसके उत्तर पूर्वी राज्यों से जोड़ता है। भारत को चीन द्वारा यहां सड़क निर्माण पर आपत्ति है। भारत को चिंता है कि इस सड़क का काम पूरा हो गया तो देश के उत्तर पूर्वी राज्यों को देश से जोड़ने वाली 20 किलोमीटर चौड़ी कड़ी यानी ‘मुर्गी की गर्दन’ जैसे इस इलाके पर चीन की पहुंच बढ़ जाएगी। ये वही इलाका है जो भारत को सेवन सिस्टर्स नाम से जानी जाने वाली उत्तर पूर्वी राज्यों से जोड़ता है और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। दक्षिणी नौसेना के पूर्व अधिकारी एडमिरल केएन सुशील ने चीन को लेकर एक बार कहा था कि रणनीतिक प्रतिरोध के मामले में सिर्फ क्षमता और आगे बढ़ने का संकल्प ही साख को मजबूत करता है। अगर हमारे पास क्षमता नहीं होगी, तो काहे का प्रतिरोध। अगर हममें जवाबी कार्रवाई करने की ताकत नहीं होगी, तो हम दुश्मन की ताकत से घबराए रहेंगे और हमारे पास सौदेबाजी का कोई उपाय नहीं होगा। हमें अपनी क्षमता से खुद में ताकत लानी होगी।
वर्तमान में चीन भारत का बड़ा व्यापारिक साझीदार है। भारत और चीन के बीच साल 2010 से हर साल स्ट्रैटेजिक इकोनॉमिक डायलाग आयोजित किए जाने के एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, कृषि, सुरक्षा, सूचना, पर्यटन, डेयरी, विकास और ऊर्जा जैसे आधारभूत सहयोग दोनों देशों के बीच जारी हैं। इस समय भारत के बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग करने में चीन ने खास रुचि दिखाई है, जिसमें मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट हाई स्पीड रेल नेटवर्क तैयार करने में चीन की तकनीकी मदद शामिल है। मेक इन इंडिया का सपना बिना चीन की मदद के पूरा नहीं हो सकता। पिछले साल डोकलाम पर भारत और चीन के रिश्तों की तल्खी ठीक ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले समाप्त हो गई थी और आर्थिक रिश्तों को सवरेपरि बताया गया था।
सही मायने में राजनीतिक औचित्यों और आर्थिक अनिवार्यताओं के मध्य पूर्ण अलगाव वाली चीन की नीति को नजरअंदाज करना भारत की अखंडता के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। चीन को लेकर भारत की रणनीति में सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा, आर्थिक एवं राजनीतिक हितों में सावधानीपूर्वक संतुलन, कूटनीतिक स्तर पर आक्रामकता, सीमा पर सैन्य दबाव और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन साधे जाने की आवश्यकता है। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चीन भारत की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है। भारत के भू-राजनीतिक हितों के साथ उसका सीधा टकराव है और सीमा प्रबंधन पर वह भारत के लिए बड़ी चुनौती पेश करता रहा है। दोनों देशों के बीच तीन हजार किमी की सीमा पर कोई स्पष्टता नहीं है। इसका फायदा उठाते हुए चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी वाले इस क्षेत्र को दक्षिणी तिब्बत कहता है। वहीं दक्षिणी चीन सागर में कब्जे को लेकर वह भारत के सामने है। उत्तराखंड, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम उसकी घुसपैठ के प्रमुख इलाके हैं। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, मालद्वीव के मराय, श्रीलंका हंबनटोटा और म्यांमार के सीटवे के साथ बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह पर चीनी कब्जा भारत को घेरने की रणनीति का एक हिस्सा है।
व्यापारिक और सामरिक बादशाहत के सपने के सुचारू संचालन के लिए चीन जिनपिंगवाद के सहारे भारत को लगातार घेर रहा है, जिसमें आर्थिक सरोकारों के बहाने मजबूत रिश्ते बढ़ाना और सीमा विवाद को बनाए रखना है। भारत और चीन दोनों देश सार्क, शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन और ब्रिक्स जैसे मंचों पर एक साथ बैठते हैं और बातचीत करते हैं। हमें यह भी समझना होगा कि चीन से स्थायी सीमा विवाद के समाधान से ही भारत की कूटनीतिक और निर्णायक विजय हो सकती है। आर्थिक फायदों के लिए किए गए समझौते तात्कालिक राहत तो दे सकते हैं, मगर सामरिक समाधान तो कतई नहीं। बहरहाल, डोकलाम पर भारत को आक्रामक कूटनीतिक प्रयास करने की जरूरत है। वरना चीन ने तो अपने इरादे जता दिए हैं। डोकलाम को लेकर चीन की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है, इसलिए वह आने वाले दिनों में निश्चित रूप से भारत के सामने चुनौती पेश किए बिना नहीं रहेगा।
चीन ने बीते शुक्रवार को ही डोकलाम में इन्फ्रास्टक्चर बढ़ाने पर सफाई दी। प्रवक्ता लू कांग ने कहा, ये जायज है और वहां रह रहे सैनिकों और लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाना हमारा मकसद है। यह चीन के बूते की बात है कि गलती भी माने और दूसरे पक्ष को आंख दिखाए। सेना प्रमुख के बयान पर उसका कहना है कि बीते दिनों जिस तरह की बातें सामने आईं, उसने भारत और चीन के रिश्तों को कठिन परीक्षा के दौर में डाल दिया था। हमें उम्मीद है कि भारतीय पक्ष इससे कुछ सबक लेगा और दोबारा ऐसा करने से बचेगा। चीन के इस बयान के गहरे निहितार्थ हैं और आने वाले संकट की दस्तक भी।
डॉ. ब्रह्मदीप अलूने (विदेशी मामलों के जानकार)

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