सिर्फ सजा देने से क्या होगा

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Kathua Case Decision

राज एक्सप्रेस, भोपाल। जम्मू-कश्मीर के कठुआ कांड का फैसला (Kathua Case Decision)आ गया है। इस मामले पर आया फैसला समाज को सख्त संदेश देगा, मगर अपराधियों पर किसी तरह का अंकुश लगा पाएगा, मुमकिन नहीं है। इसलिए जरूरी है कि रेप पर अंकुश लगाने समाज आगे आए और बदलाव लाए।

जम्मू-कश्मीर में करीब 17 महीने पहले बंजारा समुदाय की 8 साल की बच्ची से बलात्कार और हत्याकांड का फैसला आ गया है। देश को स्तब्ध कर देने वाले इस मामले ने निर्भया कांड के बाद सबसे ज्यादा तूल पकड़ा। आरोपपत्र के अनुसार पिछले साल 10 जनवरी को अगवा की गई 8 साल की बच्ची को कठुआ जिले के एक गांव के मंदिर में बंधक बनाकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। उसे चार दिन तक बेहोश रखा गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। कहा जा सकता है कि इस मामले पर आया फैसला समाज को सख्त संदेश देगा, मगर अपराधियों पर किसी तरह का अंकुश लगा पाएगा, मुमकिन नहीं है। निर्भया कांड के बाद कानून में सुधार और सख्त सजा के प्रावधान के बाद देश में बलात्कार के विषय पर कुछ भी नहीं बदला है। आए दिन रेप की खबरों से पूरा देश शर्मसार होता है। शर्मनाक यह भी है कि अब छोटी बच्चियों तक को शिकार बनाया जाने लगा है। अलीगढ़ से लेकर कुशीनगर, हमीरपुर से लेकर कानपुर, उज्जैन से लेकर भोपाल तक में जो कुछ सुनने और देखने को मिला है, वह यह साबित करने के लिए काफी है कि अपराधियों पर सख्त सजा का असर नहीं हो रहा है।

फिर क्या मान लिया जाए कि अब हम अपनी बेटियों की रक्षा कर पाने में असमर्थ हो गए हैं? अगर नहीं, तो हम ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बना पा रहे, ताकि देश में महिलाओं-बच्चियों की आबरू सुरक्षित रहे। आज कठुआ कांड का फैसला आया है, कुछ साल पहले निर्भया कांड का भी फैसला आया था। देर-सबेर कुछ दूसरे मामलों का फैसला भी आ जाएगा और दोषी अपने किए की सजा भी पा लेगा, लेकिन सवाल तो यह है कि एक के बाद एक अपराधी किस्म के लोगों की आमद हो कहां से रही है। निश्चित रूप से वे हमारे बीच से ही निकल रहे हैं, बस हम उन्हें पहचान नहीं पा रहे हैं। आज तक यह सुनने में नहीं आया है कि एक अपराधी ने कई किलोमीटर दूर जाकर किसी महिला या बच्ची से बलात्कार किया। सारे अपराधी घर के पास के या मोहल्ले के ही निकले हैं। कुछ तो ऐसे सामने आए हैं, जो घर के काफी खास रहे। लेकिन उन सबने भरोसा तोड़ा, कभी परिवार का तो कभी समाज का। अगर समय रहते उनके आव-भाव पर नजर रखी जाती, तो न जाने कितनी मासूम बच्चियों के जीवन को बचाया जा सकता था। मगर हम अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए।

अगर बलात्कार पर अंकुश लगाना है, तो सख्त सजा के साथ समाज को अपनी भूमिका निभानी होगी, लेकिन आज की भागमभाग जिंदगी में किसी के पास दूसरों के लिए समय कहां है। इसके अलावा परिवार और स्कूलों में नई पीढ़ी को संस्कार, सहअस्तित्व, परस्पर सम्मान व शुचिता के संस्कार देने होंगे। स्त्री-पुरुष में कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई खास और कोई कमतर नहीं यह भावनाएं बचपन से बिठानी होंगी। तभी कुछ हो सकता है। बलात्कार के दोषियों को सिर्फ सजा देते रहने से बदलाव मुमकिन नहीं है।

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