जाति के चक्रव्यूह में उलझी कांग्रेस को ढेरों चुनौतियां देखना है कि वह सफल होती या नहीं

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पिछले 22 साल से गुजरात की जनता विकास के मुद्दे पर भाजपा के साथ दिखाई दी है। बावजूद कांग्रेस जातिवादी क्षेत्रीय नेताओं के चक्रव्यूह में उलझती दिख रही है। हालांकि, देश में ऐसा कोई दल नहीं है, जो जाति एवं धर्म के आधार पर जीत का गणित न बैठाता हो। यही वजह है कि गुजरात में भाजपा जिन जाति समूहों के नेतृत्व कर्ताओं को अपने पाले में नहीं ले पाई, वे कांग्रेस की गोद में बैठने के लिए आतुर हैं। अब अल्पेश ठाकुर तो कांग्रेस में शामिल भी हो चुके हैं। इससे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नई ऊर्जा जरूर मिली है। नतीजतन, वे नए मुद्दे और नए तेवरों के साथ गुजरात में पूरी तरह से सक्रिय हो गए हैं। पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और दलित नेता जिग्नेश मेवानी का रुख भी कांग्रेस के प्रति नरम हो गया है।
लेकिन इन तीनों नेताओं की जज्बाती मुद्दों को लेकर जो राजनीतिक हैसियत अपने जातीय समूहों में बनी है, वे विरोधाभासी हैं। ऐसे में ये नेता कांग्रेस के साथ रहते हुए अपने मुद्दों को कैसे नीतिगत आधार दे पाएंगे, यह विचारणीय पहलू है। चुनावी मौसम में जातीय दखल रखने वाले नेताओं की पूछ-परख अचानक किस हद तक बढ़ जाती है, यह आमतौर से हर प्रदेश में देखने को मिल जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि डेढ़ साल पहले हार्दिक पटेल ने पाटीदारों को पिछड़े वर्ग के कोटे में आरक्षण की मांग को लेकर पूरे गुजरात में बड़ा आंदोलन खड़ा करके राज्य की भाजपा सरकार की परेशानी बढ़ा दी थी।
राज्य सरकार ने हार्दिक पटेल पर देशद्रोह का मुकदमा लादकर इस आंदोलन को दबाने की कोशिश की। किंतु सुप्रीम कोर्ट से जमानत के बाद हार्दिक फिर मैदान में उतर आए हैं। इस दौरान हार्दिक के नेतृत्व वाली पाटीदार अमानत आंदोलन समिति में फूट भी पड़ गई। अमित शाह की कूटनीति के चलते समिति के नेता वरुण पटेल, महेश पटेल, निखिल सवानी, नरेंद्र पटेल और रेश्मा पटेल भाजपा में शामिल भी हो गए, लेकिन इनमें से एक निखिल ने पत्रकार वार्ता आयोजित कर भाजपा से पल्ला झाड़ने का ऐलान कर दिया। इसी दिन भाजपा में शामिल हुए नरेंद्र पटेल ने भाजपा पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा देकर देशभर में हलचल पैदा कर दी।
नरेंद्र पटेल ने मीडिया के समक्ष कहा कि उन्हें भाजपा में शामिल होने के लिए एक करोड़ रुपए का ऑफर दिया गया था। बतौर पेशगी मिले 10 लाख रुपए भी मीडिया को दिखाए। नरेंद्र ने यह भी दावा किया कि उनका यह सौदा वरुण पटेल ने कराया था। वरुण ने इस चाल को कांग्रेस का षड्यंत्र बताते हुए खंडन किया है। बाद में पार्टी के स्तर पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर ने भी इस कैशकांड को कांग्रेस की कुटिल रणनीति का हिस्सा बताया था। राजनीति में आयाराम-गयाराम का सिलसिला तो चलता रहता है, लेकिन गुजरात की राजनीति में उभरे हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश के साथ विरोधाभास यह है कि वे कांग्रेस के पक्ष में खड़े भले ही हो जाएं, किंतु उनमें मुद्दों को लेकर परस्पर सहमति बनने की उम्मीद नहीं है। हार्दिक का आंदोलन ओबीसी कोटे में आरक्षण लेने से जुड़ा है। अल्पेश ओबीसी के कोटे में किसी दूसरी जाति को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हैं। जिग्नेश मेवानी दलितों के उत्पीड़न को लेकर सख्त कानूनी उपायों की मांग कर रहे हैं।
वर्ष-2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से करारी मात के बाद कांग्रेस थोड़ा सोच-समझकर कदम उठा रही है। गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा नहीं मिले, इस हेतु भी वह सचेत है। लिहाजा राहुल गांधी गुजरात में लोहे से लोहा काटने की सुनियोजित चालें चल रहे हैं। राहुल ने प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर में चुनाव अभियान शुरू करने के बाद कई देवियों के मंदिर में माथा टेका व आशीर्वाद लिया। इस दौरान राहुल न तो किसी मस्जिद में गए न ही कांग्रेस का कोई मुस्लिम नेता उनके साथ था। इस लिहाज से कांग्रेस के कई बड़े नेता राहुल की इस रणनीति को पार्टी की परंपरागत धार्मिक छवि बदलने का एक प्रयास मान रहे हैं। भाजपा का भी इस बदलाव से चिंतित होना स्वाभाविक है।
दरअसल, लोकसभा व गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में सोनिया गांधी मोदी और शाह पर तीखे सांप्रदायिक हमले करती रही हैं, लेकिन इन हमलों के बरक्स कांग्रेस को परिणाम नहीं मिले। इसके उलट भाजपा ने कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगाए। बावजूद कांग्रेस ने माकूल जवाब देना जरूरी नहीं समझा था, क्योंकि कांग्रेस को डर था कि कहीं मुस्लिम मतदाता नाराज न हो जाएं। दरअसल ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे के आधार पर भाजपा ने लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जिस तरह बड़ी जीतें हासिल कीं, उससे यह साफ हो गया है कि मुस्लिमों का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किए बिना भी स्पष्ट बहुमत से जीत प्राप्त की जा सकती है।
अब राहुल गांधी की यात्रओं की प्रतिक्रिया स्वरूप ही भाजपा ने पूरी सतर्कता बरतते हुए आनन-फानन में गुजरात के नाराज मतदाताओं को लुभाने की दृष्टि से दो महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने राज्य मंत्रिमंडल की बैठक बुलाकर एक तो आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णो को आरक्षण देने का फैसला लिया, तो दूसरे हार्दिक पटेल द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर गुजरात में आंदोलन के बाद भड़की हिंसा में सरकारी और निजी वाहनों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ मुकदमों को वापस लेने का फैसला किया।
हालांकि, इन दो फैसलों के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता है कि विजय रूपाणी और भाजपा की जीत की राह आसान हो गई है। अभी भाजपा को वहां जीत के लिए मेहनत जारी रखनी होगी और कांग्रेस के सभी सवालों का जवाब मजबूती से देना होगा। हालांकि, गुजरात में भाजपा के पास स्थानीय स्तर पर नेतृत्व का अभाव है। मौजूदा मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की छवि कद्दावर नेता की नहीं है, जिससे भाजपा वहां जीत सके। सो दूसरे राज्यों की तरह वहां एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कंधे का सहारा लेकर पार्टी आगे बढ़ रही है। गुजरात में नेतृत्व के इसी संकट से कांग्रेस भी दो-चार हो रही है। कांग्रेस छोड़ने से पहले तक शंकरसिंह वाघेला एक ऐसे नेता थे, जिनसे मोदी व शाह भी सशंकित रहते थे। किंतु अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव के दौरान वाघेला ने पार्टी के 15 विधायकों के साथ कांग्रेस से तौबा कर ली थी।
दरअसल, वाघेला चाहते थे कि कांग्रेस उन्हें चुनाव नेतृत्व की जिम्मेवारी सौंपे। यदि ऐसा हो जाता तो जीत की स्थिति में वे गुजरात के भावी सीएम मान लिए जाते। मगर वाघेला को चुनाव की कमान सौंपी जाए, इसमें सबसे बड़ा रोड़ा अहमद पटेल थे। अहमद पटेल राज्यसभा चुनाव हार जाते यदि कांग्रेस से भाजपा में आए विधायकों ने वोट देने की गोपनीयता भंग नहीं की होती। अब यदि राहुल गांधी कांग्रेस के पक्ष में जनाधार बढ़ाने का कोई उपक्रम कर भी लेते हैं तो उसके परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आना मुश्किल है, क्योंकि वाघेला ने नए मोर्चे का गठन चुनाव लड़ने के लिए कर लिया है। यह मोर्चा कांग्रेस के वोटों में सेंध जरूर लगाएगा। कार्यकर्ताओं में जोश भरना भी बड़ी चुनौती है।
प्रमोद भार्गव (वरिष्ठ पत्रकार)

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