पुलवामा: चीन की चुप्पी खतरनाक

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Pulwama Attack China Reaction

राज एक्सप्रेस, भोपाल। पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद चीन की तरफ से जिस तरह की प्रतिक्रिया सामने आई है, वह भारत को सतर्क करने वाली है (Pulwama Attack China Reaction)। चीन इस मसले पर चुप्पी भी साधे है और निंदा का दिखावा भी कर रहा है। भारत को चीन के इस नापाक खेल को बेहद गंभीरता से लेना होगा। मसूद अजहर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में इस बार वह फिर से अड़ंगा लगाने की कोशिश में रहेगा, मगर भारत को तैयारी पुख्ता रखनी होगी।

पुलवामा आतंकी हमले को लेकर जब पूरा विश्व आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में नैतिक प्रतिबद्धता जता रहा है वहीं चीन की चुप्पी न सिर्फ आतंकवाद पर उसकी दोहरी मानसिकता को रेखांकित करती है बल्कि उसकी निचले दर्जे की संवेहदहीनता को भी बयां करती है। दरअसल चीन द्वारा आतंकी हमले और जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर की करतूतों की निंदा इसलिए नहीं की जा रही है क्योंकि वह पाक अधिकृत कश्मीर में अरबों डॉलर की परियोजनाएं चला रहा है। इनमें 1100 मेगावॉट की कोहाला परियोजना और 969 मेगावॉट की नीलम-झेलम परियोजना एवं 500 मेगावाट की चकोटी हटिया परियोजना तथा गिलगित-बाल्टिस्तान परियाजना प्रमुख मानी जाती हैं। चीन इकोनॉमिक कॉरिडोर परियोजना के तहत 11 अरब डॉलर के खर्च से कराकोरम हाइवे पर पांच टनल का निर्माण भी कर रहा है, जिसे चाइना-पाक फ्रेंडशिप टनल नाम दिया गया है। चूंकि इस क्षेत्र में मसूद अजहर का आतंकी नेटवर्क बेहद मजबूत है और उसे पाक सरकार और आईएसआई का संरक्षण भी हासिल है, ऐसे में चीन मसूद अजहर का बचाव कर अपने कूटनीतिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना चाहता है। इसके बदले वह भारत में सेना के जवानों और लोगों का खून बहाता रहे, इससे उसे फर्क नहीं पड़ता।

पाक के दबाव में आतंकी मसूद अजहर को बचाना उसकी मजबूरी है। गौर करें तो आतंकवाद पर चीन का यह रवैया नया नहीं है। याद होगा अभी गत वर्ष पहले ही उसने मुंबई आतंकी हमले के गुनाहगार पाकिस्तानी आतंकी जकीउर रहमान लखवी की रिहाई पर पाक के विरुद्ध कार्रवाई संबंधी भारत के प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र में यह कहकर विरोध किया था कि भारत के पास लखवी के बारे में पर्याप्त सबूत नहीं है। गौरतलब है कि भारत ने लखवी की रिहाई को अंतरराष्ट्रीय संस्था के प्रावधानों का उल्लंघन बताते हुए संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध समिति से कार्रवाई की मांग की थी और इस पहल से पाकिस्तान पर दबाव बनना तय था। किंतु चीन ने उसका साथ देकर साबित कर दिया कि आतंकवाद के विरुद्ध भारत की लड़ाई को कमजोर करते रहना उसकी शीर्ष प्राथमिकता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि एक ओर चीन अपनी धरती पर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अलगाववाद पर नकेल कसने की आड़ में मुसलमानों पर कहर बरपा रहा है वहीं अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में शामिल आतंकियों पर प्रतिबंध का विरोध कर रहा है। वह भी तब जब अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि पाक के संघ प्रशासित कबायली क्षेत्र (फाटा), पूवरेत्तर खैबर पख्तुनवा और दक्षिण-पश्चिम बलूचिस्तान क्षेत्र में कई आतंकी संगठन पनाह लिए हुए हैं।

चीन ने पुलवामा आतंकी हमले पर चुप्पी साधकर जता दिया है कि वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध जंग में उसकी भागीदारी दिखावटी है। अब भारत को चाहिए कि वह चीन के इस दोहरे रवैये को पूरी दुनिया के सामने उजागर करे और उससे पूछे कि आतंकवादियों का साथ देकर वह किस तरह आतंकवाद के विरुद्ध जंग में दुनिया की सहायता कर रहा है? उससे यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या उसके इस आचरण से आतंकी संगठनों के ढांचे और उनके आर्थिक स्रोतों को खत्म किया जा सकता है? यह स्वाभाविक है कि चीन इन सवालों का जवाब नहीं देने वाला, लेकिन भारत को समझना होगा कि चीन और पाकिस्तान की निकटता व प्रगाढ़ता उसके लिए शुभ संकेत नहीं है। चीन सिर्फ आतंकवाद के मसले पर ही नहीं बल्कि कश्मीर के सवाल पर भी पाकिस्तान के साथ है। सच तो यह है कि उसकी मंशा पाक के साथ मिलकर भारत को घेरने की है। ऐसे में भारत को भी चाहिए कि वह तिब्बत की स्वतंत्रता और वहां हो रहे मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाकर चीन का पर्दाफाश करे।

अगर भारत तिब्बत मसले को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की तीव्र आंच पर रखता है तो नि:संदेह चीन को भारत विरोधी नीति पर पुनर्विचार करना ही होगा। यह समझना होगा कि तिब्बत की स्वतंत्रता का मसला शुरू से ही चीन के लिए परेशानी का सबब रहा है, लेकिन पता नहीं क्यों भारत इस मसले को चीन के विरुद्ध हथियार बनाने की कोशिश नहीं करता। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में भारत को समझना होगा कि चीन के बढ़ते दुस्साहस पर लगाम कसने के लिए अब उसे पूर्व की स्वीकारोक्ति से बंधे रहना उचित नहीं होगा। उसे ‘जैसे को तैसा’ की नीति पर आगे बढ़ना ही होगा। किसी से छिपा नहीं है कि दशकों से वह अरुणाचल प्रदेश पर गिद्ध दृष्टि जमाए हुए है। उसकी मंशा यहां पर प्रत्यक्ष या फिर परोक्ष रूप से अपना शासन स्थापित करना है। इसी रणनीति के तहत वह यहां के लोगों को वीजा देने से इंकार करता है। उधर जम्मू-कश्मीर में भी अपनी दुस्साहसपूर्ण गतिविधियों का विस्तार कर रहा है। ध्यान देना होगा कि भारत को घेरने की मंशा से पाक उसे जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा समर्पित कर चुका है। चीन यहां लगातार अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा रहा है। सच तो यह है कि पाकिस्तान और चीन की निकटता भारत के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण एशिया के लिए खतरनाक है। यह तथ्य सामने आ चुका है कि विगत कुछ वर्षो में इस्लामाबाद से चीन के उरुमची तक आवागमन में तेजी आई है। इन परिस्थितियों में आज जरूरत इसकी है कि भारत साम्राज्यवादी चीन की भारत विरोधी नीतियों को पूरी दुनिया के सामने उजागर करे और चीन विरोधी देशों को अपने पक्ष में लामबंद करे।

वैसे, कूटनीतिक मामलों की गहरी समझ रखने वाले अधिकांश जानकार मानते हैं कि कोई राष्ट्र किसी दूसरे के सहयोग में तब तक खड़ा नहीं होता जब तक कि उसमें उसके अंतर्निहित हित शामिल न हों। फिर चीन जैसा देश तो ऐसा कभी नहीं कर सकता क्योंकि वह राष्ट्रीय सुरक्षा व कूटनीतिक संबंधों के मामले में जोखिम नहीं लेता। मसूद के मामले पर चीन का रुख बहुत लोगों को भले ही अजीब लग रहा हो लेकिन इसके पीछे उसके बड़े हित हैं। मसूद अजहर को बचाना पाकिस्तान को लेकर चीनी कूटनीति का अहम हिस्सा है। इस मामले पर चीन काफी आगे की सोच कर चल रहा है। उसे पता है कि हाफिज सईद के बाद अगर भारत मसूद अजहर को भी संयुक्त राष्ट्र की सूची में शामिल करवाने में सफल हो गया तो वह पाक को आतंकवाद प्रायोजित राष्ट्र घोषित कराने के अपने लक्ष्य के काफी करीब पहुंच जाएगा। ऐसी स्थिति में अमेरिका सहित पश्चिमी देश पाक पर तमाम प्रतिबंध लगा देंगे। ये प्रतिबंध इस्लामाबाद के लिए तो बहुत अधिक राजनीतिक व आर्थिक मुश्किलें खड़ी कर ही देंगे, इनसे बीजिंग पर भी खासा असर पड़ेगा क्योंकि चीन को पाकिस्तान के सबसे बड़े सहयोगी के रूप में देखा जाता है।

बहरहाल, भारत को चीन के इस नापाक खेल को बेहद गंभीरता से लेना होगा। आतंकी हमले पर उसका दोहरा रवैया कई शंकाओं को जन्म दे रहा है। मसूद अजहर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में इस बार वह फिर से अड़गा लगाने की कोशिश में रहेगा, मगर भारत को तैयारी पुख्ता रखनी होगी।

रीता सिंह (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
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