आतंकवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता

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Anti-Terrorism Fight

राज एक्सप्रेस, भोपाल। पुलवामा में खूंखार आतंकी जाकिर मूसा का मारा जाना (Anti-Terrorism Fight) आतंकवाद विरोधी लड़ाई की ऐसी महत्वपूर्ण सफलता है जिसका असर दूरगामी होगा। बुरहानी वानी के बाद घाटी में जाकिर मूसा उससे भी बड़ा आतंकी आइकॉन बन चुका था। मूसा कश्मीर में इस्लामी जेहाद का सबसे बड़ा चेहरा था। मई-2017 में उसका वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उसने खलीफा राज्य स्थापित करने तक की बात कही थी।

चुनाव परिणामों और परवर्ती घटनाओं के कारण जम्मू कश्मीर में जेहादी आतंक के विरुद्ध सुरक्षा बलों की अति महत्वपूर्ण सफलता सुर्खियां नहीं बन सकीं। वास्तव में पुलवामा में खूंखार आतंकी जाकिर मूसा का मारा जाना आतंकवाद विरोधी लड़ाई की ऐसी महत्वपूर्ण सफलता है जिसका असर दूरगामी होगा। बुरहानी वानी के बाद घाटी में जाकिर मूसा उससे भी बड़ा आतंकी आइकॉन बन चुका था। वह पहले बुरहान वानी के साथ हिज्बुल मुजाहिदीन में उसके सहयोगी के रूप में सक्रिय था। 11 जुलाई-2016 को बुरहान के मारे जाने के बाद वह आतंकवाद का पोस्टर ब्वॉय बना और धीरे-धीरे मॉडल और नारा बन गया। उसके प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो वर्षो में आतकवादियों के जनाजे में जाकिर मूसा जिंदाबाद के नारे लगते थे। यहां तक कि बिजली-पानी की लड़ाई में भी जाकिर मूसा जिंदाबाद नारा लगता था। इसके पहले किसी आतंकवादी की यह हैसियत वहां नहीं थी।

बुरहान वानी का असर उसके मारे जाने के बाद कुछ समय तक रहा और उसके नारे भी लगते थे। मूसा उससे काफी आगे निकल गया। उसके सिर पर 15 लाख का इनाम रखा जा चुका था। जेहाद के लिए आतंकवाद को इस्लामी कट्टरता के रूप में ग्लैमराइज करने में उसकी पिछले ढाई वर्षो में बड़ी भूमिका थी। बुरहान के मारे जाने के बाद घाटी में जिस तरह की अशांति पैदा हुई ठीक वैसे ही हालात की आशंका पैदा हो गई थी। इसलिए सुरक्षा बलों ने उसकी मौत की खबर को काफी देर तक सार्वजनिक नहीं किया। इस बीच सुरक्षा की पूरी व्यवस्था कर दी गई। किंतु जिस गांव में उसे घेरा गया था वहां से लोगों को भनक लगी, फिर तनाव फैलने लगा। कुछ लोग नारेबाजी करते हुए सड़कों पर उतर आए। जगह-जगह पुलिस के साथ उनकी झड़प होने लगीं। स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने त्रल और उसके साथ सटे इलाकों में निषेधाज्ञा लागू कर अलर्ट जारी कर दिया। अगले आदेश तक सभी स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए। कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गईं। संवेदनशील इलाकों में पुलिस और केन्द्रीय सशस्त्र बलों की अतिरिक्त टुकड़ियों को तैनात किया गया।

वैसे पिछले कुछ महीने के अंदर कश्मीर में जिस तरह की सुरक्षा कार्रवाई हुई है उसमें बहुत ज्यादा हिंसा की संभावना नहीं थी। बावजूद एहतियातन कदम उठाए गए। हुर्रियत नेताओं के खिलाफ कार्रवाइयों से लेकर जमात-ए-इस्लामी जम्मू कश्मीर पर प्रतिबंध एवं इसके सभी प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद पहले की तरह आग भड़काना संभव नहीं, अन्यथा जाकिर मूसा की मौत के बाद अभी तक घाटी में हिंसा परवान चढ़ चुकी होती। ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके बाद सारी बंदिशें हटा ली गई। यह कश्मीर के वातावरण में आया बड़ा परिवर्तन है जो अपने-आप बहुत कुछ कहता है। दरअसल, जाकिर ने आजादी या पाक में कश्मीर को मिलाने की जगह लड़ाई का आधार इस्लामी राज स्थापना को बनाने की सरेआम घोषणा की थी। उसका संगठन अंसार-उल-गजवात-ए-हिंद अल कायदा से संबद्ध था। मूसा को बुरहान वानी की मौत के बाद हिजबुल मुजाहिद्दीन का कमांडर बनाया गया। आतंकवादी बनने के बाद वह बुरहान वानी के साथ आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के कारण कुछ ही महीनों में हिज्ब के प्रमुख आतंकवादियों में गिना जाने लगा था। बुरहान गुट के जिंदा पकड़े गए आतंकवादी तारिक पंडित ने पुलिस को बताया था कि जाकिर के विचार हिजबुल से नहीं मिलते थे। सितंबर-2015 के दौरान बुरहान वानी ने अपने वीडियो में जिस तरह से हिज्ब की नीतियों के खिलाफ जाते हुए कश्मीर में खिलाफत की बात की थी, वह मूसा का ही प्रभाव था। उसी ने उसे खलीफा के शासन की वैचारिकता से परिचित कराया।

बुरहान की मौत के कुछ ही समय बाद उसने हिजबुल के नेतृत्व में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस सहित विभिन्न अलगाववादी संगठनों को खुली चुनौती दे दी। उसने कहा कि यहां पाकिस्तान सिर्फ अपने निजी फायदे के लिए कश्मीरियों को आजादी का ख्वाब दिखाकर बंदूक थमा रहा है, लेकिन हमारा मकसद सिर्फ और सिर्फ यहां निजमा व इस्लाम का राज है। राष्ट्रवाद इस्लाम के खिलाफ है। उसने कहा कि अगर हुर्रियत नेता नहीं सुधरे तो उनको लाल चौक में लटका दिया जाएगा। जाकिर का यह वक्तव्य कश्मीर में आतंकवाद प्रायोजित करने वाले ढांचे को खुली चुनौती तो थी ही अन्य आतंकी संगठनों का भी इसमें विरोध था। यहां से आतंक का रुख बदल गया। उसने अप्रैल 2017 में स्वयं घोषणा करके हिजबुल का परित्याग कर दिया और जुलाई 2017 में अंसार उल गजवात-ए-हिंद की नींव रखी। वह अलकायदा से जुड़ा। उसकी जो भी तस्वीरें व आडियो-वीडियो वायरल हुए, वे अल कायदा के कमांडरों द्वारा जारी किए जाने वाले आडियो वीडियो की तरह ही थे। यह कश्मीर में जारी आतंकवाद की एक अलग धारा बन गई।

वस्तुत: मूसा कश्मीर में इस्लामी जेहाद का इस समय सबसे बड़ा चेहरा था। मई-2017 में उसका वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उसने इस्लामिक शरिया के मुताबिक खलीफा राज्य स्थापित करने की बात कही थी। अपने वीडियो संदेश में मूसा कह रहा था कि कश्मीर उसके लिए कोई फ्रीडम स्ट्रगल नहीं है, बल्कि इस्लामिक स्ट्रगल है। इस तरह मूसा ने पूरे कश्मीर में 30 साल से जारी आतंकवादी हिंसा को शायद पहली बार खुला मजहबी वैचारिक धारा बताया जिसने उसे वैश्विक जेहाद के साथ जोड़ा। इससे आतंकवाद का रुख बदल गया। ऐसा नहीं है कि हुर्रियत या अन्य आतंकियों के अंदर संघर्ष में इस्लाम मुख्य प्रेरणा नहीं है। स्वयं पाक भी इसी नाम पर तो आतंकवादियों की भर्ती कर पता है। पाकिस्तान में गजवात-ए-हिन्द की बात करने वाले हैं, मगर कश्मीर के संदर्भ में इस तरह कोई आतंकवादी संगठन इतना खुलकर विस्तृत और साफ धर्माध विचारधारा के साथ सामने नहीं आया था। हुर्रियत के पाकिस्तान समर्थक नेता भी मजहब के कारण ही कश्मीर को भारत से अलग करने की बात करते हैं, पर उस पर उदारवाद का मुलम्मा चढ़ाने का पाखंड करते हैं। ये सब इस्लाम की मुख्य प्रेरणा को स्पष्ट घोषित नहीं करने की रणनीति पर चलते हैं।

जाकिर ने उन सब के चेहरे से नकाब उतारने की कोशिश की और खुलकर इसे इस्लामिक राज में परिणत करने का ऐलान करने लगा। इस तरह कह सकते हैं कि वह पहला आतंकवादी कमांडर था, जिसने कश्मीर में जारी धर्माध जेहाद पर चढ़ाए गए आजादी के नकाब को उतारते हुए साफ शब्दों में कहा कि यहां कोई आजादी के नाम पर बंदूक नहीं उठाता, सब इस्लाम के नाम पर बंदूक उठाते हैं। उसने कहा कि कश्मीर तो गजवात-ए-हिंद का दरवाजा है और इस कारण काफी युवा उससे जुड़े। अबु दुजाना, आरिफ ललहारी जैसे कुख्यात आतंकी तक उसके साथ आ गए। साफ है कि उसके रवैये से पाकिस्तान भी परेशान था और हुर्रियत भी, क्योंकि इसके बाद दुनिया के सामने वो कश्मीर का रोना नहीं रो सकते थे।

इसके बाद बताने की आवश्यकता नहीं कि उसका मारा जाना कितनी बड़ी घटना है। इस तरह का आतंकी इसके पहले कश्मीर में कभी हुआ ही नहीं। हालांकि वह मारा गया है लेकिन उसने जो बीज बो दिया है वह अत्यंत खतरनाक है। इस वर्ष अब तक 100 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। शेष बचे आतंकवादियों का भी सफाया होगा तथा मजहबी कट्टरता को कमजोर किया जा सकेगा।

अवधेश कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

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