सिंहों के लिए बेहतर आवास जरूरी

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Umang Singhar

राज एक्सप्रेस,भोपाल। मध्यप्रदेश के वनमंत्री उमंग सिंगार (Umang Singhar) ने कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान में सिंह यानी पेन्थेरा लियो पर्सिका लाने का संकल्प जताया है। गुजरात से सिंहों को मध्यप्रदेश लाने की पहल वर्षो से की जा रही है, मगर सफलता नहीं मिल सकी। माना कि सिंहों को गुजरात में बेहतर प्रवास और सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन मध्यप्रदेश का कूनो पालपुर भी अब सिंहों के स्वागत के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुका है।

मध्यप्रदेश सरकार के नवनियुक्त वनमंत्री उमंग सिंगार को धन्यवाद कि उन्होंने गुजरात से मध्यप्रदेश के कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान में सिंह यानी पेन्थेरा लियो पर्सिका लाने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया है। बीसवीं सदी के अंत में वन्य प्राणीविदों ने शंका जताई थी कि एशियाई सिंह जैसी दुर्लभ प्रजाति का गुजरात के गीर अभ्यारण्य में एक ही स्थान पर केंद्रीकरण कतई ठीक नहीं है। वे कभी भी किसी संक्रामक रोग के शिकार हो सकते हैं। तद्नुसार श्योपुर जिले के कूनो-पालपुर संरक्षित क्षेत्र की पहचान सर्वसम्मति से वैकल्पिक रहवास के रूप में की गई थी। वहां उनके सर्वथा उपयुक्त सुरक्षित रहवास तथा शिकार (प्रे-बेस) उपलब्ध है। अब तो उसका विस्तार करके उसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा भी दे दिया गया है। किंतु गुजरात ने सिंहों को वहां की अस्मिता का प्रतीक मानकर देने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि सिंह तो क्या मैं तो उसका बाल भी न दूं। इस राजहठ के समक्ष वनराज हार गया प्रतीत होता है। लोकसभा में कीर्तिवर्धन सिंह के प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार ने माना कि गीर में सितंबर-दिसंबर 1918 की अवधि में ही 37 सिंह मर गए हैं। शेरों की मृत्यु का कारण बताया गया है केनाइन डिसटेम्पर वायरस और वबेसिया प्रोटोजोआ संक्रमण:

व्यर्थ में वनराज की पदवी मिली थी सिंह को।
सिंह की औक़ात क्या है राजहठ के सामने।।

इसके पहले गुजरात विधानसभा में यह बताया गया था कि वर्ष 2016 और 2017 के दो सालों में 184 सिंह मर चुके हैं। क्या पच्चीस साल पहले वन्यप्राणीविदों द्वारा व्यक्त शंका अब सही सिद्ध होने लगी है। लेकिन क्या अब भी गुजरात चेतेगा? सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरण के पक्ष में फैसला दे चुकी है। मगर गुजरात को संभवत: ऐसा लगता है कि सिंह उसकी अस्मिता हैं और उन्हें किसी और प्रदेश को देना गुजरात की अस्मिता को प्रभावित करना है। नैसर्गिक साधनों की अदला-बदली देशी-विदेशी स्तरों पर होती रहती है। सन् 1930 में ब्रिटेन के ड्यूक आफ बेडफोर्ड ने कश्मीर से हंगुल नामक हिरन मांगा था और उसके बदले में ट्राउट मछली दी थी, जो आज भी वहां है। मध्यप्रदेश की नर्मदा गुजरात में कच्छ तक की प्यास बुझाती है और गुजरात का दूध सारे देश में पिया जाता है। गुजरात में बाघ नहीं है। वह, हमसे बाघ ले सकता है और कुछ जोड़े सिंह हमें दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट साफ कह चुका है कि सिंह तो भारत की अस्मिता है न कि किसी प्रदेश विशेष की।

कुछ दिनों पहले अमेरिका ने बताया था कि मध्यप्रदेश के बारासिंघे वहां हैं। अमेरिका ने इस प्रदेश को इस दुर्लभ प्रजाति का मूल स्रोत मानकर इसके संरक्षण हेतु रॉयलटी भी ऑफर की थी। सिंहों को लेकर गुजरात राज्य की स्वामित्व-मानसिकता नई नहीं है। 20वीं सदी के मध्य, स्वतंत्रता पूर्व तक वहां अनेक देशी रियासतों में सिंह और बाघ दोनों थे। बड़ौदा नरेश सयाजीराव तृतीय के राज्यकाल में तब वर्तमान गीर वन का पूर्वी भाग उसी रियासत में था। सन् 1931 में भावनगर के राजा कृष्ण कुमार सिंह जी के राज्यकाल में घुमंतू सिंह रियासत के बाहर चक्कर लगाने लगे थे। जिस पूर्व-रियासत जूनागढ़ के गीर-वन में सन् 1891 में मात्र तीस सिंह रह गये थे, वहां 1899-1901 के कुख्यात छप्पनियां अकाल में सिंहों ने इंसान का शिकार करना चालू कर दिया था। यही वह समय था जब भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन ने सिंहों का शिकार विषयक जूनागढ़ नवाब का निमंत्रण ठुकरा कर उन्हें इस प्रजाति के संरक्षण की सलाह दी थी।

चूंकि जूनागढ़ रियासत के चारों ओर अनेक देशी रियासतें यथा बड़ौदा, बिल्खा, जेतपुर आदि थीं, अत: वहां के सिंहों का इन इलाकों में जाना स्वाभाविक था। उस समय बड़ौदा नरेश जूनागढ़ के सिंहों को आकर्षित करने के लिए सीमा पर बकरे-पाड़े बांध देते थे और जूनागढ़ वाले ढोल पीटकर उन्हें फिर से अपने यहां खदेड़ देते थे। इसी समय बीकानेर नरेश गंगासिंह ने जूनागढ़ नवाब महावत खान से सिंहों के संबंध में मिलने की इच्छा व्यक्त की। सिंहों पर नवाब की स्वामित्व भावना इतनी प्रबल थी कि उन्होंने मिलने से भी इंकार कर दिया। 1904 में लार्ड कर्जन, ग्वालियर नरेश माधवराव सिंधिया के निमंत्रण पर शिकार के लिये आये। तब उन्होंने कूनो-पालपुर के वनों के संदर्भ में यह सुझाव दिया कि जूनागढ़ से कुछ सिंह लाकर यहां छोड़े जाएं। ग्वालियर-नरेश ने प्रयास किया। लार्ड कर्जन ने सिफारिश भी की थी, लेकिन जूनागढ़ के नवाब टस से मस नहीं हुए। आज भी गुजरात द्वारा मध्यप्रदेश को सिंह देने में वैसी ही टाला-मटूली की जा रही है। क्या सिंहों को लेकर गुजरात की स्वामित्व भावना आज के संघवादी प्रजातांत्रिक भारत में भी ज्यों की त्यों विद्यमान है?

गुजरात में बांकानेर राजघराने के महाराज कुमार रंजीत सिंहजी मध्यप्रदेश में प्रमुख सचिव वन सहित अनेक बड़े पदों पर रह चुके हैं। उनकी पुस्तक ‘ए लाइफ विद वाइल्ड लाइफ’ अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है। गत वर्ष मार्च में वे भोपाल में थे। तब उन्होंने अपने पिता बांकानेर नरेश के हवाले से बताया था कि जब जूनागढ़ नवाब अपने दीवान शहनवाज भुट्टो (पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री भुट्टो के पिता) के प्रभाव में भागकर पाकिस्तान जा रहे थे तो गीर और गिरनार के ऊपर से उड़ते हुए उन्होंने आंखों में आंसू भरकर पूछा था- अब मेरे सिंहों का क्या होगा? यथार्थत: यद्यपि गुजरात ने इन सिंहो का संरक्षण बेहद शानदार ढंग से किया है लेकिन परंपरागत स्वामित्व भावना के कारण ही मध्यप्रदेश को यह सिंह मिल नहीं पा रहे हैं हालांकि वहां उन पर संकट है। इसलिए अब इस दिशा में सोचना जरूर चाहिए ताकि धरती से इस प्राणी के खत्म होते संकट को टाला जा सके।

भारत के प्रथम वन महानिरीक्षक रहे एमडी चतुर्वेदी ने अपनी एक पुस्तक ‘सिंह परिवार’ में लिखा है कि ग्वालियर नरेश ने जूनागढ़ से निराश होकर अफ्रीका से सिंहों के जोड़े मंगाकर अपने यहां छोड़े थे। एक विशेषज्ञ डीएम जाल के नेतृत्व में 1905 में सिंह मोहल्ला खोला और एक लाख रुपए का बजट भी रखा। सिंहों ने प्रजनन भी किया, लेकिन उन दिनों तो न जीपीएस. था, न आधुनिक कैमरे थे और न ही शिकार प्रतिबंधित था। अत: ये सिंह रियासत के बाहर चले गए और मारे गए। यह भी याद रहे कि ग्वालियर-नरेश के इस प्रोजेक्ट की देखभाल जेम्स आडम नामक उनके शिकार एडवायजर ने संभाली थी। यह एक संयोग ही था कि इन्हीं के पुत्र जार्ज आडमसन ने अपनी पत्नी ज्वाय के साथ अफ्रीका में सिंहों के संरक्षण में अपने प्राण गंवा दिए थे। सिंहों को लेकर लिखी गई उनकी पुस्तक बॉर्न फ्री उनके संरक्षण अभियान की साक्षी है। तब क्या जूनियर आडमसन ने सिंह संरक्षण की वृत्ति अपने पिता के साथ ग्वालियर में रहकर हासिल की थी?

गुजरात और मध्यप्रदेश के बीच सिंहों को लेकर जो भी सियासत जारी हो किंतु आज उससे जुड़ी समस्याएं आसानी से सुलझ सकती हैं। वर्तमान में श्रीमती आनंदीबेन पटेल जैसी दूरदर्शी राजनेता मध्यप्रदेश की राज्यपाल हैं। वे, गुजरात और मध्यप्रदेश दोनों को साधने में पूर्ण रूपेण सक्षम और समर्थ हैं। हमें उनकी सदाशयता का लाभ उठाना चाहिए और गिर सिंहों के बचाव के उपाय तलाशने चाहिए। मध्य प्रदेश काफी वर्षो से गुजरात से सिंहों की मांग कर रहा है। मध्यप्रदेश का पक्ष देखा जाए, तो उसकी मांग में सिंहों की सुरक्षा ही निहित है। वे प्रदेश के कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान में रहेंगे, तो बेहतर रहेंगे। सिंहों को मांगना गुजरात की उपेक्षा करना कतई नहीं है। यह बात उसे समझनी होगी।
घनश्याम सक्सेना (वरिष्ठ पत्रकार)

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