घाटी में शांति की एक सार्थक पहल, कश्मीर समस्या के समाधान के लिए दिल से स्वागत किया जाना चाहिए

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कश्मीर समस्या के समाधान के लिए बातचीत का जो प्रस्ताव केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दिया है, उसका खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि, यह फैसला बहुत लंबा समय व्यर्थ में गंवाने के बाद लिया गया है। कश्मीर में सेना की कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे लोगों की वह सोच सही नहीं है, जिसमें भारत के किसी भी राज्य की समस्याओं का हल सैन्य तरीके से निकाला जाए। बहरहाल, बातचीत की पूरी जिम्मेदारी खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को दी गई है। यह फैसला सरकार के रुख में बदलाव का एक संकेत है। यह इसका भी सूचक है कि सरकार लोकतंत्र के प्रति कश्मीरियों के भरोसे की बहाली को लेकर गंभीर है व वहां व्याप्त अशांति को मात्र सख्ती से ठीक करने तक सीमित कर नहीं देख रही है। सरकार की मंशा विकास के जरिए कश्मीर में लंबे समय से जारी उत्पात को थामना है। कश्मीर समस्या का एक पहलू राजनीतिक भी है। एक अच्छी बात यह भी है कि अभी कश्मीर का माहौल बातचीत के अनुकूल है। वहां फिलहाल माहौल अपेक्षाकृत शांत हैं। क्रुद्ध युवाओं का झुंड भी सड़कों से गायब है।
अलगाववादी नेताओं ने हाल-फिलहाल कोई पाकिस्तान-परस्त बयान भी नहीं दिया है। सीमा-पार से होने वाली घुसपैठ और पाक-प्रेरित आतंकियों से मुठभेड़ की खबरें जरूर सुनने में आई हैं, लेकिन माहौल इतना भी अशांत नहीं है कि रोजमर्रा का कामकाज ठप हो जाए। बहुत संभव है, हाल फिलहाल माहौल शांत नजर आ रहा हो, या फिर यह भी मुमकिन है कि बढ़ी हुई निगरानी और सख्ती के कारण भारतीय सुरक्षा बलों को सचमुच कामयाबी हासिल हुई हो और अलगाववादी तत्वों के हौसले पस्त पड़ गए हों, जैसा कि केंद्र सरकार का बीते दिनों दावा रहा है। कश्मीर से जुड़े पिछले अनुभव यही बताते हैं कि उसके हालात को लेकर कोई बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती है, परंतु शांति का मौजूदा माहौल बातचीत की सरकारी पहल में निश्चित ही मददगार साबित होगा क्योंकि कटुता के माहौल में बातचीत हो तो भी ज्यादा आशंका विवाद के बने रहने की होती है और समुचित संवाद स्थापित नहीं हो पाता है।
उम्मीद यह भी की जा सकती है कि बातचीत पिछले अनुभवों से सीख लेकर ही की जाएगी। पूर्ववर्ती एनडीए और यूपीए सरकारों के दौर में भी कश्मीर के मसले पर बातचीत के लिए समितियां बनी थीं। उस समय कश्मीरी अवाम की विश्वास बहाली के लिए राजनीतिक कोशिशें भी की गई थीं और संवाद को अहम माना गया था। पर, यह अफसोस की बात है कि उन समितियों की सिफारिशों पर ठीक से अमल नहीं हो सका। ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि संवाद कायम करने की मौजूदा पहल रंग लाएगी और इसका कोई ठोस नतीजा निकलेगा। कश्मीर समस्या लंबे समय से राजनीति और सुरक्षा के स्तर पर बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस लिहाज से तुरंत समाधान की अपेक्षा कतई नहीं की जानी चाहिए। अत: गृहमंत्री के प्रस्ताव का विस्तार होना चाहिए व आम कश्मीरियों में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए भी प्रयास बंद नहीं होने चाहिए।

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