बूंदी। राजस्थान में बूंदी में स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना समाधि स्थल क्षारबाग देखरेख एवं उचित रखरखाव के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। स्थापत्य कला का यह अनूठा समाधि स्थल अपनी अतीत की याद बनकर वास्तुकारों और सैलानियों के लिए कौतुहल सा बन गया है और उचित देखरेख के अभाव में खस्ताहाल में है। यहां से हाथी घोडों की प्रतिमाएं चोर ले गए। राजपूत राजा एवं रानियों की शौर्य गाथाओं का प्रतीक क्षार बाग बूंदी से चार किलोमीटर दूर है। क्षार बाग बूंदी के दिवगंत राजाओं की निर्वाण स्थली है। राजपरिवार के सौ स्मारक यहां बने हुए है। सबसे प्राचीन स्मारक सुरजन के बेटे दुधा सिंह और रायमल सिंह के है जो विक्रम संवत 1625 के बने हुए है।
इसके अलावा यहां रावराजा शत्रुशल्य सिंह का स्मारक भी है। रावराजा अनिरूद्ध सिंह, माव सिंह, कृष्ण सिंह, बुद्ध सिंह, उम्मेद सिंह, अजीत सिंह, विष्णु सिंह, राम सिंह, बहादुर सिंह की समाधियों को स्थापत्यकला से उकेरा गया है। आठ खम्भों पर पत्थर से बनी गुबंद नुमा छतरियों मे अधिकांश स्मारक बने है। घोडे के साथ एक सवार को बेहद आकर्षक रूप से स्मारकों के चारों तरफ उकेरा गया है। युद्ध करते हाथी घोडों की कलाकृतियां बहुत ही शानदार है।
संगमरमर से बनी हाथी घोडों प्रतिमाएं और पत्थर पर उकेरे शिवलिंग प्रतीक रूप में स्थापित है। स्मारकों के स्तूपों के चारों और धार्मिक एवं शौर्य भावनाओं का बेमिसाल अंकन किया गया है। पुरूष की चिता पर प्राणोत्सर्ग करती महिलाओं की आकृतियां उकेरी हुई है। घोडें पर सवार युद्ध करती रानी और शिवलिंग की आराधना करती महिलाएं स्थापत्य की मिशाल है। स्मारक की छतरियों में मुगलकालीन नक्काशी, और गुबंद मे विभिन्न देवों को संजोया गया है। सच मे पत्थरों पर बने यह शिल्प बूंदी की वीरता एवं साहस को उजागर करते है।
कर्नल टाड की पुस्तक के मुताबिक महाराव उम्मेद सिंह की कृत्रिम स्वर्णिम प्रतिमा का क्षार बाग में दाह संस्कार किया था। ऐसा दुश्मनों को चकमा देने के लिए किया गया था जबकि वर्ष 1904 मे उनकी मृत्यु होने पर उनका दाह संस्कार यहां किया गया था। बूंदी के राजाओं ने जहां अपने शासनकाल मे चित्रकला, नृत्यकला, स्थापत्यकला, शिल्प को भरपूर प्रोत्साहन दिया लेकिन आज लोकतंत्र की व्यवस्था में इन कलाओं को सुरक्षित रखने के लिए शासन एवं प्रशासन गम्भीर नही है।

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