जानिए क्यों नहीं करना चाहिए होलाष्टक के 8 दिनों में शुभ कार्य….

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Holashtak 2019

राज एक्सप्रेस। फाल्गुन मास में पूर्णिमा को होली का त्योहार मनाया जाता है। और इस त्योहार से आठ दिन पहले से होली की तैयारियों की शुरुआत को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। शास्त्रों में होलाष्टक (Holashtak 2019) के इन आठ दिनों में शुभ माने जाने वाले 16 संस्कारों की मनाही बताई गई है। इन आठ दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, निर्माण आदि शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। माना जाता है कि, इन दिनों में किए गए शुभ कार्यों से कष्ट की आशंका रहती है।

होलाष्टक को लेकर मान्यताएं:

कहा जाता है कि, भगवान शिव ने तपस्या भंग करने का प्रयास करने पर कामदेव को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि को भस्म कर दिया था। कामदेव के भस्म हो जाने के बाद सारे संसार में शोक व्याप्त हो गया। कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव से क्षमा याचना की तब भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन का आश्वासन दिया। होलाष्टक को लेकर एक और मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी को हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रह्लाद को बंदी बनाकर यातनाएं दी।

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इन आठ दिनों में भक्त प्रह्लाद को यातनाएं देने के कारण ही यह समय होलाष्टक कहा जाता है। माना जाता है कि, इन दिनों सभी नौ ग्रहों का स्वभाव उग्र रहता है। यह भी माना जाता है कि, फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से प्रकृति में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश हो जाता है। होलाष्टक का अंत धुलेंडी के साथ होता है।

झांसी के करीब है वो पहाड़ी जहां भक्त प्रह्लाद को गोद में लिया था होलिका ने :

झांसी से करीब 80 किमी दूर एरच कस्बा है। यहां होली का जश्न एक महीने पहले शुरू हो जाता है। कीचड़ की होली से हुई शुरुआत रंगों की होली का रूप ले लेती है। यहां रंग पंचमी तक रंग खेला जाता है। बुंदेलखंडी लोकगीतों के सुर गलियों और चौपालों में पहले से गूंजना शुरू हो जाते हैं। इसके पीछे का एक बड़ा कारण होलिका दहन के पीछे की कहानी को माना जाता है।

कहते हैं यहां के गांव ढिकोली में वो पहाड़ी आज भी मौजूद है, जहां भक्त प्रह्लाद के लिए अर्थी सजाई गई थी। कहते हैं, चिता को तैयार करने में आठ दिन का वक्त लगा था और जब चिता सजाई जाती है। तो सभी शुभ काम करना बंद कर दिया जाता है। इसी कारण से होलाष्टक की परंपरा चली आ रही है। ढिकोली में एक किला मौजूद है, जिसे हिरण्यकश्यप का माना जाता है। इस किले में मौजूद प्राचीन मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति के अलावा प्रह्लाद को गोद में लिए होलिका की मूर्ति भी मौजूद है।

इतिहासकार:

इतिहास के जानकार मुकुंद मेहरोत्र के अनुसार, किले की ईंटों की कार्बन डेटिंग से पता चलता है कि ये 10 हजार साल से ज्यादा पुरानी हैं। इस स्थान को ऐरच के नाम से जाना जाता था, जिसे हिरण्यकश्यप के नाम से जोड़कर देखा जाता है। ढिकोली के ढीकाचल पर्वत से प्रह्लाद को मारने के लिए उसके पिता ने बेतवा नदी में धकेल दिया था। यहां भी नारायण ने अपने भक्त के प्राणों की रक्षा की थी। तभी इस गांव को ढिकोली नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि, नदी में जिस स्थान पर प्रह्लाद को धक्का दिया गया था, उसकी गहराई पाताल तक मानी जाती है।

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