ग्रेविटेशनल लेंसिंग ( Gravitational Lensing ) मानव निर्मित ना होकर प्राकृतिक टेलिस्कोप है। हम बात कर रहे है ऐसे टेलिस्कोप की जो प्रकृति द्वारा बनाया गया है। जोकि बेहद अद्भुत एवं रहस्मयी है, वैसे तो मानव निर्मित बहुत से टेलिस्कोप है किन्तु Gravitational Lensing का कोई जवाब नहीं है। मानव ने भी कुछ अच्छे टेलिस्कोप का निर्माण किया है। जिसमे से एक सर्वश्रेष्ठ टेलिस्कोप हबल है। हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी जैसे टेलिस्कोप की स्थापना 25 अप्रैल 1990 में इसकी कक्षा में की गयी थी। इस हबल टेलिस्कोप की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, इससे भविष्य में होने वाली घटनाओं एवं भूतपूर्व में हुई सभी घटनाओं के बारे में जानने के लिए मदद मिलती है। ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1

Gravitational Lensing ब्रह्माण्ड में उपस्थित ऐसा प्राकृतिक टेलिस्कोप है जो ब्रह्माण्ड में छुपे कई रहस्यों से पर्दा उठाने का काम करता है। Gravitational Lensing की वजह से ही हम ये जान पाए है कि, ब्रह्माण्ड में डार्क मेटर (Dark Matter) भी उपस्थित है। इसकी वजह से ही डार्क मेटर के बारे में वैज्ञानिकों को बहुत सी जानकारी मिली। सर्वप्रथम आपको ये जानने की आवश्यकता है कि, लेंस किस तरह से काम करते है एवं इनका क्या महत्व है।

लेंस का कार्य – ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1

लेंस (ताल) को हम इस तरह से भी समझ सकते है कि, मानव आँखों में जो लेंस उपस्थित होता है उसको कॉन्वेक्स लेंस कहते है। यह प्रकाश (light) की दिशा को बदलने या मोड़ने का काम करते है। अगर हमारे पास उत्तल (convex) लेंस है तो, वो समान्तर प्रकाश (parallel light) को हमारे अंदर की ओर मोड़ेगा। अगर अवतल (Concave) लेंस है तो, वो समान्तर प्रकाश (parallel light) को बाहर की ओर मोड़ेगा।

इसलिए लेंस का उपयोग प्रकाश की दिशा को मोड़ने के लिए किया जाता है ताकि हम वो देख सके जो हम देखना चाहते है। Gravitational Lensing वृंहणयन्त्र यानि कि, (magnifying glass) की तरह भी काम करता है जो चीज़ो को बड़ा करने में सहायक होता है magnifying glass का उपयोग किसी भी सूक्ष्म चीज़ को बड़ा करके देखने के लिए उपयोग में लाया जाता है। यही इस glass की विशेषता है। यह छोटी-छोटी चीज़ो को आकार में बड़ा करके हमे अच्छे से उन चीज़ो के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध करवाता है।

आपने कभी सोचा है, कोई भी वस्तु हमें दिखाई क्यों देती है ?

इसका साधारण शब्दों में उत्तर देखे तो यह होगा कि, कोई भी वस्तु हमे तभी दिखाई देती है जब उस वस्तु का प्रकाश हमारी आँखों तक पहुंचे। जैसे कि, ब्रह्माण्ड का कोई भी तारा हमे तभी दिखाई देगा, जब उस तारे का प्रकाश हमारी आँखों तक पहुंचेगा। ब्रह्माण्ड में उपस्थित बहुत सी ऐसी वस्तुए हैं जिनका खुद का कोई प्रकाश नहीं होता वो किसी दूसरी वस्तु के प्रकाश पर निर्भर करती है जैसे कि, किताब, फ्रूट, खाना एवं अन्य भौतिक वस्तुए। यह सभी वस्तुए हम इसलिए देख पाते है क्योंकि प्रकाश उनसे टकरा के हमारी आँखों तक पहुँचता है। जिस वजह से यह सभी वस्तुए हम देख पाते है।

कैसे काम करता है magnifying glass – ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1

मान लेते है आपके पास एक फूल है वह आकार में छोटा है किन्तु जब हम magnifying glass से उस फूल को देखते है तब हम पाते है कि, फूल का आकार magnifying glass की वजह से बढ़ गया है।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि फूल पर पड़ कर वापस लौटने वाले प्रकाश को magnifying glass में उपस्थित convex लेंस बदल देता है। इसी कारण यह हमको आकार में बड़ा दिखाई देता है।

Gravitational Lensing को ऐसे भी समझ सकते है – ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1

हमारा दिमाग इस दुनिया को किस तरह से समझता है। यह महत्वपूर्ण बात है। हम जब भी प्रकाश को देखते है तो, हम सिर्फ प्रकाश को स्ट्रैट लाइन ( सीधी रेखा ) में ही ट्रेवल करते हुए देख पाते है। ऐसा क्यों होता है इसका कारण यह है जब भी कोई प्रकाश की किरण हमारे पास पहुँचती है वो सीधे हम तक नहीं पहुंच पाती क्योंकि प्रकाश की किरण मैग्नीफाइंग ग्लास के कारण अपनी दिशा बदल लेता है, लेकिन हमारी आँखे प्रकाश को स्ट्रैट लाइन में ही देखती है तब हमे वो किरण सीधी ही दिखाई देती है। जबकि वास्तविक में वो कर्व के रूप में होती है।

जैसा की हमने आपको उदाहरण में समझाया था कि, कैसे उस फूल की प्रतिलिपि यानि की इमेज उसी दिशा में बनाती है जिस दिशा में उस फूल से होकर आया प्रकाश उस तक पहुँचता है। इसी कारण वो फूल अपने असली आकर से बड़ा दिखाई देता है। क्योंकि यह असली इमेज नहीं होती, आँखों को ट्रिक करके बनती है इसलिए ऐसी इमेजेस को ‘वर्चुअल इमेज’ भी कहते है।

कैसे गुरुत्वाकर्षण के द्वारा समझाया गया ?

अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) –

महान भौतिकी शास्त्री ने अपने सपेक्षताबाद (जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी) में लिखा कि, प्रकाश सीमित गति अर्थात 3 लाख किलो मीटर प्रति सेकंड की गति से चलता है। जिसका अर्थ यह हुआ कि, स्पेस एवं टाइम एक दूसरे से सम्बंधित है। उन्होंने 1915 में यह भी साबित किया कि, हमारे आसपास के पिंड, टैंक रुपी आयाम मे प्रकाश की विकृति (Abnormality/ Distortion) करते है। यह विकृति पिंडो की स्थिति को प्रभावित करती है।

अर्थात

हर तरह का मास स्पेस टाइम को कंटिन्यू वॉक करता है या यह कह सकते है कि, इसे थोड़ा अंदर धसा देता है बॉडी का मास ज़्यादा है तो, स्पेस टाइम को ज़्यादा वॉक करेगा और किसी बॉडी का मास कम है तो, वो स्पेस टाइम को कम वॉक करेगा।

एक छोटे मास वाला ऑब्जेक्ट कर्व की ओर अपने आप खींचा चला जाएगा क्योंकि स्पेस टाइम का आकार ऐसा ही है।

उदाहरण- ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1

“यदि हम एक लोहे की गेंद और कुछ कंचे एक चादर के ऊपर रख कर घुमाते है तो हम देखेंगे, कंचे केंद्र में स्थित गेंद की परिक्रमा कर रहे है। अंत में सभी कंचे धीरे-धीरे केंद्र में आते जाएंगे। ऐसा गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होता है।”

आइंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी  –

आइंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी अगर सही है तो, हम कह सकते है बड़े मास वाले ऑब्जेक्ट जैसे- क्लस्टर, आकाशगंगायें, तारे, सितारे, ब्लैक होल आदि यह सभी अलग-अलग अपने स्पेस टाइम को अऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1पने मास के अनुसार वॉक करेंगे। इसका एक और अर्थ निकलता है, जब प्रकाश इन सभी से होकर गुजरेगा तब इनकी मूल दिशा में भी परिवर्तन आएगा। क्योंकि वहाँ के स्पेस टाइम का आकार ही ऐसा होगा कि, उसको अपनी दिशा बदलनी ही पड़ेगी। इसका अर्थ है कि, इन सभी जगहों पर ग्रेविटी एक लेंस की तरह काम करेगी।

जैसे की पिछले उदाहरण में मैग्नीफाइंग ग्लास प्रकाश की दिशा को परिवर्तित करने का काम कर रहा था। इसको ही Gravitational Lensing कहा गया है।

वैसे अगर यह थ्योरी सही थी तो, हमको एक मैग्नीफाइंग ग्लास मिलना चाहिए था। जो हमको कई प्रकाश दूर स्थित चीज़ो को अच्छे से देखने में सहायक होता और हमको वैसे तारे, आकाशगंगायें, ब्लैक होल भी नज़र आने चाहिए थे, जो किसी बड़ी गैलेक्सी के पीछे छुपे होने के कारण हमको दिखाई नहीं देते है।

यह तो थ्योरी थी, लेकिन ऐसा सच में होता है या नहीं इन सभी बातो का परिक्षण करना भी आवश्यक था। वैसे ये बात तो हम जानते ही है, जब छोटे ऑब्जेक्ट के सामने अगर कोई बड़ा ऑब्जेक्ट आ जाए तो फिर छोटा ऑब्जेक्ट हमको दिखाई नहीं देता।

उदाहरण–  ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1
छोटे बॉल के आगे अगर बड़ी बॉल आ जाये तो, बड़ी बॉल, छोटी बॉल के सामने आ जाने के कारण छोटी बॉल दिखाई नहीं देगी।

साल 1919 में, Arthur Eddington ने इसका एक्सपेरिमेंट करने की ठानी उन्होंने सूर्य ग्रहण के दिन सूर्य को टेलिस्कोप से अध्ययन किया, सूर्य के पीछे एक तारा था, जो पृथ्वी से बिलकुल भी दिखाई नहीं देना चाहिए था क्योंकि, सूर्य उसके ठीक आगे मौजूद था। अगर आइंस्टीन की थ्योरी एक दम सही थी तो, सूर्य अपने मास को स्पेस टाइम में, सच में बेंड कर रहा था तो, ग्रेविटेशनल फीमोनीन के कारण वो तारा पृथ्वी से दिखाई देना चाहिए था। आपको यकीन नहीं होगा लेकिन आइंस्टीन ने जो अपनी थ्योरी से प्रिडिक्ट किया था, ठीक वैसा ही हुआ। Arthur Eddington को भी वो तारा नज़र आया। ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -1

यहाँ पर हुआ ये उस तारे से आ रहे प्रकाश को ओरिजनली हम तक नहीं पहुंचना चाहिए था चूँकि, सूर्य ने स्पेस टाइम को थोड़ा सा बेंड कर दिया तो, उस तारे से आ रहा प्रकाश जब सूर्य के नज़दीक से गुजरेगा वो थोड़ा बेंड हो ही जाएगा। जिसके कारण उसकी दिशा भी बदल जाएगी एवं वो हमारी पृथ्वी तक पहुंच जायेगा। जैसा की आपको बताया हमारा दिमाग प्रकाश को इस तरह से ही समझता है, जैसे प्रकाश सच में स्ट्रैट लाइन में ही आ रहा हो।

हमें वो तारा नज़र ज़रूर आएगा लेकिन अपने स्थान पर नहीं दूसरे स्थान पर नज़र आएगा। आर्थर एड्डिंगटन के इस परिक्षण ने यह भी साबित कर दिया कि, आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी एक दम सही थी।

वैज्ञानिकों ने किये ये शोध तो मालूम हुआ-

उस परिक्षण के बाद वैज्ञानिकों को ग्रेविटेशनल लेंसिंग और थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला।
ग्रेविटेशनल लेंसिंग से जो वैज्ञानिकों को मदद मिल रही थी उससे वैज्ञानिकों ने पाया कि, ग्रेविटेशनल लेंस कही ज़्यादा अच्छे से काम करते है कही बहुत मंद तरीके से।

वैज्ञानिकों ने इसके बारे में काफी शोध करने के बाद यह ज्ञात किया कि, ग्रेविटेशनल लेंसिंग तीन तरह की होती है। हम हमारे अगले आर्टिकल भाग- 2 में ग्रेविटेशनल लेंसिंग के प्रकार एवं यह कैसे कैसे काम करते है उसके बारे में जानेगे।

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