Holi Festival : होली का त्यौहार कब, कैसें और क्‍यों मनाया जाता हैं जानिए

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Holi Festival

होली का त्यौहार (Holi Festival) कब, कैसें और क्‍यों मनाया जाता हैं। आज हम आपको बताने जा रहें हैं। भारत में ही नही विदेशों में भी होली का त्यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता हैं। यह त्यौहार जब भी आता हैं, लोगों के जीवन को रंगीन कर देता हैं इसलिए इस पर्व को ‘रंग महोत्‍सव’ कहा जाता हैं। यह पर्व लोगो के बीच एकता और प्यार बढ़ाता हैं। इसलिए इसे ‘प्यार का त्यौहार’ भी कहा जाता हैं। होली का त्यौहार सभी धर्म के लोग बहुत खुशी के साथ मनाते हैं। इस वर्ष होली का त्यौहार गुरुवार, 21 मार्च 2019 को पूरे उत्साह के साथ देश और विदेश में मनाया जायेगा।

होली का त्यौहार कब मनाए:

हिंदू कैलेंडर के अनुसार,  होली का त्यौहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन, गर्मी के मौसम की शुरुआत और सर्दियों के मौसम के अंत में, बहुत खुशी, उल्‍लास के साथ मनाया जाता हैं। यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का भी संकेत हैं। यह एक ऐसा त्यौहार है, जब लोग एक दूसरे से मिलते-जुलते, मौंज-मस्‍ती करते और अपनी समस्याओं को भूल जाते हैं। होली के त्यौहार पर सभी लोग अपने घरों में बहुत सारे पकवान भी बनाते हैं।

होली का त्यौहार क्‍यों और कैसे मनाए:

हर साल होली के त्यौहार को मनाने के कई कारण होते हैं। यह पर्व रंग, स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ, एकता और प्रेम का भव्य उत्सव हैं। होली शब्द “होला” शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है नई और अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए भगवान की पूजा। होली का त्यौहार मनाने के पीछे भारत में कई ऐतिहासिक महत्व और किंवदंतिया रही हैं। यह कई सालों से मनाया जाने वाला, सबसे पुराने हिंदू त्यौहारों में से एक हैं। होली का त्योहार प्रत्येक राज्य में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता हैं। देश के कई राज्यों में, होली का पर्व लगातार तीन दिनों तक मनाया जाता हैं।

पहला दिन:

होली की पूर्णिमा को पहले दिन सभी लोग घरों में सभी सदस्यों पर रंग का पाउडर बरसाकर मनाते हैं।

दूसरा दिन:

होली के दूसरे दिन को ‘पुनो’ कहा गया हैं इसका अर्थ होता हैं त्योहार का मुख्य दिन जब लोग मुहूर्त के अनुसार होलिका का दहन करते हैं।

तीसरे दिन:

तीसरे दिन का त्योहार “पर्व” कहलाता है अर्थात् त्योहार का अंतिम दिन, इस दिन लोग अपने-अपने घरों के बाहर आकर एक दूसरे से गले मिलते हैं और आपस में खूब रंग-गुलाल खेलते हैं साथ ही कई प्रकार के पकवान भी खाते हैं।

होली का त्‍योहार अलग-अलग राज्‍यों में अलग-अलग नाम से बनाया जाता हैं। जैसें- उत्तर प्रदेश में  
  1. उत्तर प्रदेश – लट्ठमार होली
  2. असम – फगवाह या देओल
  3. बंगाल – ढोल पूर्णिमा
  4. पश्चिम बंगाल – ढोल जात्रा
  5. नेपाल आदि में – फागू
मथुरा और वृंदावन की होली को जानिए:

यहां का बहुत प्रसिद्ध त्‍योहार होली हैं। भारत के कई प्रांतों के लोग मथुरा और वृंदावन में विशेष रूप से होली उत्सव को देखने के लिए एकत्रित होते हैं। मथुरा और वृंदावन महान भूमि हैं जहां, पर भगवान कृष्ण ने जन्म लिया और बहुत सारी लीलाएं की। होली का त्‍योहार उनमें से एक है। इतिहास के अनुसार, यह माना जाता है कि, होली का त्‍योहार राधा और कृष्ण के समय से शुरू किया गया था। यही कारण से मथुरा और वृंदावन होली उत्सव के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं।

मथुरा में लोग मजाक-उल्लास की बहुत सारी गतिविधियों के साथ होली का जश्न मनाते है। होली का त्योहार उनके लिए प्रेम और भक्ति का महत्व रखता हैं। वृंदावन में बांके-बिहारी मंदिर है जहां यह भव्य समारोह मनाया जाता है। मथुरा के पास होली का जश्न मनाने के लिए एक और जगह है गुलाल-कुंड जो की ब्रज में है, यह गोवर्धन पर्वत के पास एक झील है। यहा पर होली के त्यौहार का आनंद मनाने के लिए बड़े स्तर पर कृष्ण-लीला नाटक का आयोजन किया जाता हैं।

बरसाने में लट्ठमार होली:

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में एक शहर बरसाना है। बरसाना में लोग हर साल लट्ठमार होली मनाते हैं, जो बहुत ही रोमांचक होती हैं। पास के क्षेत्रों से लोग बरसाने और नंदगांव में होली उत्सव को देखने के लिए आते हैं।

लट्ठमार होली, छड़ी के साथ एक होली उत्सव है, जिसमें महिलाएं छड़ी से पुरुषों को मारती है। यह माना जाता है कि, “श्री कृष्ण होली के दिन राधा रानी को देखने के लिए बरसाने आये थे, जहां उन्होंने उन्हें और उनकी सखियों को छेड़ा था। इसके बदले में राधा रानी और उनकी सखियों ने भी श्री कृष्ण पीछा किया था। तब से ही बरसाने और नंदगांव में लोग छड़ियों के प्रयोग से होली मनाते हैं जो लट्ठमार होली कहलाती है।”

होली के त्यौहार की पौराणिक कथा  होलिका, हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की:

होलिका और प्रह्लाद की कथा होली के पर्व की सबसे महत्वपूर्ण कथाओं में से एक है। हिन्दू ग्रंथ नारद पुराण के अनुसार, जब संपूर्ण संसार पर हिरण्यकश्यप नामक राक्षस का शासन था, जो बहुत ही क्रूर राजा था। वह सभी लोगों से धरती पर अपनी पूजा करवाना चाहता था। जब एक दिन उसे यह पता चला कि,  स्वयं उसका बेटा प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त है तो उसे बहुत गुस्सा आ गया। उसने अपने बेटे से अपनी पूजा करने को कहा, लेकिन प्रह्लाद ने ऐसा करने से मना कर दिया।

इसके बजाय, प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति करने लगा। यह हिरण्यकश्यप के लिए एक बड़ी समस्या बनी थी, क्योंकि प्रह्लाद उसका पुत्र था। हिरण्यकश्यप ने कई बार प्रह्लाद को मरवाने की कोशिश की, लेकिन भगवान विष्णु की वजह से प्रह्लाद हमेशा बच जाता था। जब उसे यह आभास हो गया कि वो प्रह्लाद को नहीं मार पायेगा तो हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता मांगी।

हिरण्यकश्यप की बहन होलिका:

हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। अतः उसने होलिका को आदेश दिया की, वह प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ जाए जिससे प्रह्लाद जलकर मर जाए। परन्तु होलिका का यह वरदान उस समय समाप्त हो गया, जब उसने भगवान भक्त प्रह्लाद का वध करने का प्रयत्न किया। होलिका अग्नि में जल गई परन्तु नारायण की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ। इस घटना की याद में लोग होलिका जलाते हैं और उसके अंत की खुशी में होली का पर्व मनाते हैं।

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