ग्रेविटेशनल लेंसिंग ( Gravitational Lensing ) क्या होता है और यह कितने प्रकार की होती है और यह कैसे काम करती है इस बारे में जानने के बाद आज हम आपको यह बताएँगे की कैसे Gravitational Lensing की मदद से वैज्ञानिकों ने डार्क मेटर के बारे में पता लगाया ?

Gravitational Lensing की मदद से ही हम ये जान पाए है कि, इतने बड़े ब्रह्माण्ड में डार्क मेटर जैसी भी कोई चीज़ उपस्थित है। हमारे ब्रह्माण्ड का लगभग 23% भाग डार्क मेटर है। यह आर्डिनरी मेटर की तरह नहीं होता और ना ही यह दिखाई देता है। लेकिन हम जानते है डार्क मेटर निश्चित रूप से हमारे ब्रह्माण्ड में उपस्थित है।

डार्क मेटर होते क्या हैऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए है ये वरदान भाग -3

ब्रह्माण्ड में कुछ दृश्य तथा अदृश्य पदार्थ भी है। हम जितना भी ब्रह्माण्ड के पदार्थ को देख पाते है, वो ब्रह्माण्ड के दृश्य पदार्थ कहलाते है। जिन्हे हम देख नहीं पाते वो ब्रह्माण्ड के अदृश्य पदार्थ कहलाते है।

अदृश्य पदार्थ जैसे- काले पदार्थ, काली ऊर्जा जो साधारण पदार्थ से 90 गुना ज़्यादा है। मान सकते है कि, दृश्य पदार्थ केवल 5% ही है जिसमे हम शोध कर सकते है, जिसके अंतर्गत हमारी आकाशगंगायें आती है जिसको हम देख और समझ सकते है। बाकि का ब्रह्माण्ड शांत तथा काला है, जिसमे डार्क मेटर (काला पदार्थ) भी शामिल है, हम कह सकते है – सम्पूर्ण रूप से निरंक है। डार्क मेटर अदृश्य पदार्थ है, जिसको हम देख और महसूस नहीं कर सकते लेकिन हम जानते है कि, डार्क मेटर हमारे ब्रह्माण्ड में उपस्थित है क्योंकि इसका गुरुत्वाकर्षण बल आस-पास के पदार्थो को अपनी ओर खींचता है।

डार्क मेटर का पता कैसे लगाया, क्या था Gravitational Lensing का महत्व ?

हम जानते है Gravitational Lensing तब होता है जब हमारे और लाइट सोर्स के बीच में बहुत बड़ा मास आ जाता है। जैसे कि, एक गैलेक्सी क्लस्टर ये बड़ा सा मास एक लेंस की तरह काम करता है। जिसके कारण हमे उस लाइट सोर्स की डिस्टॉर्टेड लाइट या विभिन्न तरह की फोटो दिखाई देती है।

कंप्यूटर सिमुलेशन का उपयोग

मान लीजिये पीछे छिपे एक गैलेक्सी लाइट को आप तक पहुंचने से पहले एक बड़े गैलेक्सी क्लस्टर के पास से होकर गुजरना पड़ता है। जो एक ग्रेविटी की तरह काम करता है जितनी लाइट हम तक पहुंची है। जिसे हम कैलकुलेट करके बता सकते है उस गैलेक्सी का मास कितना होगा। जिसने बीच में ग्रेविटेशनल लेंस का काम किया है यह जानने के लिए हमे कंप्यूटर सिमुलेशन की आवश्यकता होती है। चूँकि हम अच्छी तरह से जानते है कि ग्रेविटी कैसे काम करती है। हम उसी तरह का ग्रेविटेशनल इफ़ेक्ट कंप्यूटर में तैयार कर लेते है।

जब हम उस लाइट का डाटा डालते है जो हम तक पंहुचा था अब हम ग्रेविटेशनल इफ़ेक्ट को बीच में अंजाम दे रहे गैलेक्सी क्लस्टर का ओब्सर्व मास कंप्यूटर सिमुलेशन में डालते है फिर देखते है हमे उतनी लाइट यहाँ मिलती है या नहीं जितनी की असल ज़िन्दगी में हमे मिली थी।

मिले आंकड़ों ने वैज्ञानिकों को किया हैरान

आश्चर्य रूप से यह मालूम हुआ कि, गैलेक्सी क्लस्टर का जितना मास है उतना काफी नहीं है प्रकाश को बेंड करने के लिए जितना की वो असल में बेंड हो कर हम तक पंहुचा था। इस गैलेक्सी का ओरिजिनल मास केवल % ही है जिसने असल ज़िन्दगी में ग्रेविटेशनल लेंसिंग का काम किया था। यानि की कंप्यूटर सिमुलेशन में वैसे ही ग्रेविटेशनल लेंस बनाने के लिए इस गैलेक्सी क्लस्टर के जैसे नो अन्य गैलेक्सी क्लस्टर के मास की ज़रूरत है यह मिसिंग मास फेंट बिरयोनिक ऑब्जेक्ट, ब्लैक होल, इंटरस्टेलर गैस, डस्ट तथा प्लेनेट आदि के भी हो सकते है।

कई शोध करने के बाद खुला राज

कई गैलेक्सी को अच्छे से ओब्सर्व करने के बाद हमने पाया की इन ऑब्जेक्ट के मास भी हमारे मिसिंग मास जितने नहीं होते यानि की यह तय था कि कोई ऐसी चीज़ है जो हमे दिखाई नहीं देती लेकिन वो ब्रह्माण्ड में उपस्थित ज़रूर है जो दूसरे ऑब्जेक्ट पर अपना प्रभाव डालती है। अर्थात उसका अपना मास ज़रूर है जो ग्रेविटेशनल लेंसिंग के बेंड होने का भी ज़िम्मेदार था लेकिन प्रश्न था ये चीज़ क्या थी और कहा उपस्थित थी। एक शोध से मालूम हुआ की यह चीज़ ब्रह्माण्ड के चारो ओर अर्थात हर ओर फैली हुई है। चूँकि इसको हम देख नहीं सकते इस अदृश्य मेटर को डार्क मेटर का नाम दिया। यह लाइट से बिलकुल इंटरैक्ट नहीं करते है। जिसके कारण यह हमको दिखाई नहीं देते है।

हमारे Gravitational Lensing के तीनों आर्टिकल में हमने आपको ग्रेविटेशनल लेंसिंग के बारे में विस्तार से बताया है। आशा है कि, आपको हमारा ग्रेविटेशनल लेंसिंग से जुड़ा आर्टिकल पसंद आया होगा।
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