गोपाष्टमी। भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व गोपाष्टमी है। प्रति वर्ष कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण एवं गाय की पूजा की जाती है। इसी दिन से श्री कृष्ण ने गौ चारण लीला शुरू की थी इसलिए ही यह पर्व मनाया जाता है। गायों की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण का नाम ‘गोविन्द’ पड़ा। कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। वर्ष 2017 में गोपाष्टमी पूजन 28 अक्तूबर को है।
हिन्दू संस्कृति में गाय का विशेष स्थान हैं। माँ का दर्जा दिया जाता हैं गाय मनुष्य जाति को लाभ प्रदान करती हैं।
गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन होता है। गोपाष्टमी की पूजा विधि पूर्वक विध्दान पंडितो द्वारा संपन्न की जाती है। बाद में सभी प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोग गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ रक्षा व गौ संवर्धन का संकल्प करते हैं।
गोपाष्टमी पूजन विधि
इस दिन प्रातः काल उठ कर नित्य कर्म से निवृत हो कर स्नान करते है, प्रातः काल ही गायों और उनके बछड़ो को भी स्नान कराया जाता है। गौ माता के अंगो में मेहँदी, रोली हल्दी आदि के थापे लगाये जाते हैं, गायों को सजाया जाता है, प्रातः काल ही धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र, सुसज्जित करके गन्ध पुष्पादि और जल से गौ माता की पूजा की जाती है और आरती उतरी जाती है। गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है, पूजन के बाद गौ ग्रास निकाला जाता है, गौ माता की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा के बाद गायों के साथ कुछ दूर तक चला जाता है। ऐसा करने से सौभाग्य की वृध्दि होती है। कहते हैं ऐसा करने से प्रगत्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। इस दिन ग्वालों को उपहार देने की भी रस्म है। अपने सामर्थ्य अनुसार ग्वालों को उपहार दें।
गौशालाओं में भी पूजन होता है
गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशालाओं में भी गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं। गोपाष्टमी की पूजा विधि पूर्वक पंडितो द्वारा संपन्न करके प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोग गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ रक्षा व गौ संवर्धन का संकल्प करते हैं।
पौराणिक कथा
1.- एक पौराणिक कथा अनुसार बालक कृष्ण ने माँ यशोदा से गायों की सेवा करनी की इच्छा जाहिर करते हुए कहा कि माँ मुझे गाय चराने की अनुमति मिलनी चाहिए। उनके कहने पर शांडिल्य ऋषि द्वारा शुभ समय निकाला गया, वह गोपाष्टमी का दिन था। बालक कृष्ण गायों की पूजा करके, प्रदक्षिणा करते हुए साष्टांग प्रणाम करते हैं।
2.- गोपाष्टमी की अन्य कथा के अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण किया था। आठवें दिन इंद्र अपना अहंकार छोड़कर श्रीकृष्ण की शरण में आए तथा क्षमायाचना की।
3 .- गोपाष्टमी से जुड़ी एक कथा और है कि राधा भी गाय चराने के लिए वन में जाना चाहती थी, लेकिन लड़की होने पर उन्हें नहीं जाने दिया जा रहा था। उसके बाद राधा ने तरकीब लगाई और ग्वालों जैसे कपडे पहने और वन में श्री कृष्ण के साथ में गाय चराने चली गई।
गोपाष्टमी पर गऊओं की पूजा भगवान श्री कृष्ण को बेहद प्रिय है तथा इनमें सभी देवताओं का वास माना जाता है। कईं स्थानों पर गोपाष्टमी के अवसर पर गायों की उपस्थिति में प्रभातफेरी सत्संग संपन्न होते हैं। गोपाष्टमी पर्व के उपलक्ष्य में जगह-जगह अन्नकूट भंडारे का आयोजन किया जाता है। भंडारे में श्रद्धालुओं ने अन्नकूट का प्रसाद ग्रहण करते हैं। वहीं गोपाष्टमी पर्व की पूर्व संध्या पर शहर के कई मंदिरों में सत्संग-भजन का आयोजन भी किया जाता है। मंदिर में गोपाष्टमी के उपलक्ष्य में रात्रि कीर्तन में श्रद्धालुओं ने भक्ति रचनाओं का रसपान करते हैं। इस मौके पर प्रवचन एवं भजन संध्या में उपस्थित श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। गो सेवा से जीवन धन्य हो जाता है तथा मनुष्य सदैव सुखी रहता है।
पद्म पुराण के अनुसार
गाय के अंगों में देवी-देवताओं का निवास– गाय के मुख में चारों वेदों का निवास हैं। उसके सींगों में भगवान शंकर और विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। गाय के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सीगों के अग्र भाग में इन्द्र, दोनों कानों में अश्विनीकुमार, नेत्रों में सूर्य और चंद्र, दांतों में गरुड़, जिह्वा में सरस्वती, अपान (गुदा) में सारे तीर्थ, मूत्र-स्थान में गंगा जी, रोमकूपों में ऋषि गण, पृष्ठभाग में यमराज, दक्षिण पार्श्व में वरुण एवं कुबेर, वाम पार्श्व में महाबली यक्ष, मुख के भीतर गंधर्व, नासिका के अग्रभाग में सर्प, खुरों के पिछले भाग में अप्सराएं स्थित हैं। भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, महाभारत में भी गौ के अंग-प्रत्यंग में देवी-देवताओं की स्थिति का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।

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