कृषि उत्पादों के निर्यात में लगातार गिरावट चिंता का विषय

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सरकारी नीतियों में बार-बार बदलाव से कृषि उत्पादों के निर्यात पर विपरीत असर हो रहा है। भारत से पिछले 4 वर्षो के दौरान निर्यात घट रहा है, इससे सरकार चिंतित है। एपीडा ने सरकार से एक ठोस एवं बेहतर नीति बनाने का सुझाव देते हुए सालाना 15-20 फीसदी हिस्सा निर्यात के लिए निर्धारित करने का अनुरोध किया है। गौरतलब है कि वर्ष 2013-14 में कृषि उत्पादों का निर्यात 42.9 अरब डॉलर का हुआ था, जो 2016-17 में लगातार घटता हुआ 33.4 अरब डॉलर का रह गया है।
बदलती सरकारी नीतियां
दरअसल, दाल-चावल, गेहूं, चीनी जैसी आवश्यक जिंस के संदर्भ में सरकारी नीतियां बार-बार बदलती रहती है। कभी कोई जिंस का निर्यात प्रतिबंधित किया जाता है, तो कभी किसी के आयात को मंजूरी दी जाती है, वहीं डय़ूटी को भी कम ज्यादा किया जाता है। इसके अलावा कृषि जलवायु, परिस्थितियां एवं उत्पादन आधार पर भी कृषि निर्यात नीति में सदैव बदलाव होते रहते है, इसी वजह से भारत कृषि उत्पादों का अनियमित निर्यातक रहा है। एपीडा के चेयरमेन डीके सिंह ने सरकार से एक उपयुक्त और मजबूत निर्यात नीति बनाने की योजना पर जोर दिए जाने का सुझाव दिया है।
फसलों के आंकलन की सही तकनीकी होना जरुरी
भारत की अधिकांश खेती मानसून पर निर्भर है। लिहाजा, कृषि निर्यात के लिए हमारे पास फसलों के सटीक अनुमानों की सही तकनीक होना बेहद जरुरी है। ताकि हम किसी बंपर स्टॉक का बेहतर अनुमान लगाने में सक्षम हो सके, क्योंकि वैश्विक व्यापार व निर्यात बढ़ाने के लिए देश को एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता होना जरुरी है।
कृषि निर्यात ने भारत 9वें स्थान पर
वैश्विक कृषि व्यापार के क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी महज 2.2 फीसदी की है।उक्त हिस्सेदारी के साथ भारत वैश्विक कृषि व्यापार के क्षेत्र में 9वें पायदान पर है, जबकि निर्यात के अव्वल देशों में अमेरिका 10.4, यूरोपिय संघ 10, ब्राजील 5.1 फीसदी हिस्सेदारी रखते है।
जीडीपी में 13.10 फीसदी योगदान
विश्व कृषि व्यापार में भले ही भारत की हिस्सेदारी 2 फीसदी की हो, लेकिन कृषि उत्पादों का निर्यात देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 13.10 फीसदी का योगदान देता है। इसका अर्थ व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।

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