केंद्र सरकार की तरफ से मदद के बावजूद भी कुछ बैंकों को नहीं मिल पायेगा फायदा

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने एनपीए से जूझ रहे सार्वजनिक बैंकों को वित्तीय पैकेज देने का एलान तो कर दिया लेकिन इस योजना की राह में सबसे बड़ी अड़चन कुछ बैंक ही बने हुए हैं। वित्त मंत्रालय का अपना अध्ययन बताता है कि इंडियन ओवरसीज बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ये पांच ऐसे बैंक है जिनकी जैसी स्थिति है उसे देखते हुए तो वे वित्तीय पैकेज के तहत मिलने वाली किसी भी मदद का फायदा नहीं उठा सकते हैं। मसलन, इनके मौजूदा प्रदर्शन को देखते हुए कोई भी निवेशक इनमें शायद ही पैसा लगाना चाहे। ऐसे में इनमें सरकार की हिस्सेदारी बेचने की योजना भी सफल नहीं हो सकती हैं। सूत्रों के मुताबिक इस बात की प्रबल संभावना है कि कमजोर बैंकों को केवल अपनी प्रावधान जरूरतों को पूरा करने के लिए पूंजी मिलेगी जबकि मजबूत बैंकों को वृद्धि के लिए भी पूंजी दी जाएगी।
वित्त मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक इंडियन ओवरसीज बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र का यह अनुपात 11 फीसद है जबकि यूनाइटेड, यूको और सेंट्रल बैंक का सीएआर 10 फीसद है। पिछले पांच वर्षो से इन सभी बैंकों को केंद्र सरकार से सीएआर का स्तर बनाये रखने के लिए अतिरिक्त राशि दी जा रही है।
आरबीआई के पूर्व गवर्नर वेणुगोपाल रेड्डी ने द वायर को कहा कि अगर बैंक इक्विटी पूंजी की जगह, सरकारी प्रतिभूतियां रखते हैं, तो ऐसी स्थिति में केंद्र इसे तब अच्छा फैसला करार दे सकता है। जब सरकार को बैंकों से मिला लाभांश, बॉन्डों पर सरकार द्वारा चुकाए गए ब्याज से ज्यादा हो। संक्षेप में कहें, तो बैंकों को पर्याप्त मुनाफा कमाना चाहिए और सरकार को लाभांश देना चाहिए। इससे ही सरकारी बॉन्डों के जरिए बैंकों को अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध कराने के फैसले को उचित ठहराया जा सकता है।
एक अधिकारी ने कहा कि केन्द्र सरकार खुद ये बांड जारी करेगी और इनके बदले बैंक के शेयरों को रखने के लिए कोई होल्डिंग कंपनी नहीं बनाई जाएगी। इससे पहले 1990 के दशक के मध्य में 20,000 करोड़ रुपए के बैंक पुनर्पूंजीकरण बांड जारी किए गए थे। सरकार इस बार भी उसी तरह के बांड जारी करना चाहती है। इससे राजकोषीय घाटे पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि इसमें नकदी शामिल नहीं है लेकिन सरकार को सालाना ब्याज का भुगतान करना पड़ेगा।

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