दलाल स्ट्रीट में मोदी सरकार फेल

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Share Market

राज एक्सप्रेस, नई दिल्ली। एनडीए सरकार देश में कारोबारी माहौल सुधारने को हमेशा तवज्जो दी। बावजूद इसके पिछले पांच वर्षों में (Share Market) शेयरों की कीमतें उतनी नहीं बढ़ीं जितना यूपीए शासन में। आखिर मोदी सरकार को इस मोर्चे पर सफलता क्यों नहीं मिली। मोदी सरकार में बीएसई सेंसेक्स 48 प्रतिशत बढ़ा, जबकि मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल 2009-14 में यह 180 प्रतिशत और पहले कार्यकाल 2009-14 में 78 प्रतिशत बढ़ा था। बड़ी बात यह है कि यूपीए-2 के शासन में सेंसेक्स में बढ़ोतरी के आंकड़े का बड़ा हिस्सा 13 सितंबर, 2013 से 2014 में कार्यकाल की समाप्ति के बीच प्राप्त हुआ। नौ महीने के इस दौर में सेंसेक्स 25 प्रतिशत मजबूत हुआ था जबकि 2004 में मनमोहन सरकार के शपथ ग्रहण के शुरुआती 51 महीने सवा चार वर्ष में सेंसेक्स 42 प्रतिशत चढ़ा था।

अनुमानों पर खरा नहीं उतरे इक्विटी इंडिसेज:

मोदी ने मई, 2014 में प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाला। सरकार बदलने की उम्मीद में तब तक स्टॉक वैल्युएशंस में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हो चुकी थी। उम्मीदें पूरी हुईं तो फरवरी 2015 तक निफ्टी 50 के 12 महीने का फॉरवर्ड पीई 10 साल 2009-19 के 17.9 अंक के मुकाबले 22.5 का स्तर छू लिया। जाहिर है, तब निवेशक निफ्टी के हरेक रुपए की प्रॉजेक्टेड अर्निग्स के लिए 22.5 रुपए चुकाने को तैयार थे। हालांकि, आर्थिक सुधार की रफ्तार पकड़ रही थी, फिर भी इक्विटी इंडिसेज अनुमानों के मुताबिक डिलिवर करने में साल दर साल फेल होते रहे।

दलाल स्ट्रीट को क्यों लगा झटका:

यस सिक्यॉरिटीज के प्रेजिडेंट और रिसर्च हेड अमर अंबानी ने कहा, अगर कॉर्पोरेट अर्निग्स का मोर्चा मजबूत होता तो इक्विटीज भी संभवत: बेहतर करते। हमारा एक दशक कमजोर अर्निग्स ग्रोथ के साथ बीता था। संभव है कि इनोवेटिव मॉडल की नॉन लिस्टेड कंपनियों की बढ़ती संख्या के कारण कई उद्योगों में पारंपरिक कंपनियों की कीमत निर्धारण की क्षमता कम हो गई हो। कमोडिटी सेक्टर में भी कमजोरी का एक चक्र रहा। यही वजह है कि, इनसे संबंधित कंपनियों की शेयर प्राइस में बड़ी वृद्धि नहीं हुई। इनके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कमजोर प्रदर्शन से दलाल स्ट्रीट को और ज्यादा झटका लगा। जीडीपी वृद्धि के लिए सेवा क्षेत्र पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर लिया गया। कृषि क्षेत्र कमजोर रहा और प्राइवेट कंपनियों का बाजार पूंजीकरण भी घटा।

नोटबंदी का असर रहा:

नोटबंदी को ठीक ढंग से लागू नहीं किया जा सका और संभव है कि, इसी वजह से जीडीपी अपनी पूरी क्षमता से आगे नहीं बढ़ सकी। जीएसटी के साथ भी ऐसा ही हुआ। हालांकि, मुझे लगता है कि, तमाम परेशानियों से निबटारे के बाद अब इन दो बड़ी पहलों से आगे औपचारिक अर्थव्यवस्था के विकास को तेज रफ्तार मिलेगी।

यूपीए सरकार में तेजी की वजह:

यूपीए-1 के दौरान शेयरों की कीमतों में तेज वृद्धि मुख्य रूप से लाखों करोड़ डॉलर के निवेश के कारण हुई थी, क्योंकि अमेरिका में 2007 से 10 के बीच आए वित्तीय संकट के मद्देनजर दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए अपनी नीतियां नरम कीं, लेकिन यूपीए-2 में भारतीय शेयर बाजार में जितनी भी तेजी आईए उसका श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को ही जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि तब आसमान छूती कच्चे तेल की कीमतों और नए-नए घोटाले की घटनाओं से सरकार के त्रस्त होने के बावजूद शेयर बाजार ने अच्छा प्रदर्शन किया।

फिर स्टॉक्स में रैली का दौर:

विशेषज्ञ इस बार फिर से चुनाव से पहले शेयर बाजार में बंपर बढ़त का अंदाजा लगा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि, सत्ता में कोई आए, चुनाव बाद आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया बरकरार रहेगी। उनका कहना है कि, सरकार किसी एक दल की बने या गठबंधन की और सरकार विकास को तवज्जो दे या लोकप्रिय फैसले ले, लंबी अवधि में इनका आर्थिक विकास के साथ कोई सीधा संबंध नहीं होता है। यही यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में दिखा था। किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बावजूद जीडीपी ग्रोथ की दर औसतन 8.7 प्रतिशत रही। अंत में अर्निग्स में स्थिरता ही मायने रखती है।

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