नक्सलियों पर कड़ा प्रहार जरूरी

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Naxalites

राज एक्सप्रेस, भोपाल। छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षाबलों ने ऑपरेशन चलाकर 10 नक्सलियों (Naxalites) को खत्म कर दिया गया। यह बड़ी कामयाबी है। मगर सवाल भी कि आखिर तमाम दावों के बाद भी अब तक नक्सलियों पर लगाम क्यों नहीं कसी जा सकी है। नक्सलवाद खत्म करने के नाम पर जिस तरह के संसाधनों को खर्च किया गया, वह व्यर्थ साबित हो रहा है। नक्सलियों से बातचीत के रास्ते पर चलने को कोई क्यों नहीं तैयार हो रहा है।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता हाथ लगी है। सुरक्षाबलों ने ऑपरेशन चलाकर 10 नक्सलियों को खत्म कर दिया गया। इस ऑपरेशन को स्पेशल टास्क फोर्स व डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड्स ने अंजाम दिया था। सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के पास से हथियार भी बरामद किए। इससे पहले बीते शनिवार को भी छत्तीसगढ़ के सुकमा में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में एक महिला की जान चली गई थी। नक्सलियों पर नकेल कसने को लेकर सरकार से लेकर सुरक्षा बल तक मुस्तैद हैं। छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित जिलों की सूची से 44 जनपदों को बाहर किया जाना इस बात का सूचक है कि केंद्र सरकार नक्सली हिंसा पर लगाम लगाने में एक हद तक सफल हुई है, लेकिन वह इस सफलता पर संतुष्ट होकर नहीं बैठ सकती और न ही उसे बैठना चाहिए। इसका कारण यह है कि नक्सली संगठन अपनी ताकत बटोरकर नए सिरे से हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने में माहिर हैं। ऐसा कई बार दिख भी चुका है। कई बार वे सुरक्षा बलों की सक्रियता के चलते अपने कदम पीछे खींच लेते हैं, लेकिन यह सामने आया है कि वे इस दौरान अपनी ताकत बढ़ाने का काम करते हैं।

यों सुरक्षाबलों का दावा है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की ताकत खत्म हो गई है, वे लगातार सिमट रहे हैं, पर इस तरह थोड़े-थोड़े अंतराल पर उनके घात लगा कर या सुनियोजित तरीके से हमलों को अंजाम देने से दावे पर एकबारगी विश्वास नहीं होता है। पहली बात तो यह कि नक्सली योजनाओं के बारे में जानकारी हासिल करने में सुरक्षाबल अब नाकाम साबित हो रहे हैं। कुछ दिनों पहले तर्क दिया गया था कि जिन इलाकों में सड़कों आदि का निर्माण हो रहा होता है, वहां नक्सली बड़ी आसानी से बारूदी सुरंग बिछाने में कामयाब हो जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक बार यह कहा था कि उनके पास बारूदी सुरंगों का पता लगाने के लिए अत्याधुनिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, जिससे नक्सली अपने मंसूबों में कामयाब हो जाते हैं।

यह सही है कि जंगली इलाकों में गश्त करना और नक्सली ठिकानों का पता लगाना सुरक्षाबलों के लिए चुनौतीपूर्ण काम है पर उनके बारे में सूचनाएं इकट्ठा करने के लिए जरूरी नहीं कि जंगल की खाक छानी जाए। अत्याधुनिक संचार तकनीक के जरिए भी उनकी टोह ली जा सकती है। लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि छत्तीसगढ़ में तकनीकी मदद से नक्सलियों पर कड़ी नजर रखी जाएगी। नोटबंदी के बाद कहा गया कि इससे उन्हें हथियार और दूसरे साजो-सामान उपलब्ध कराने वाले रास्ते बंद हो जाएंगे। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दावा भी किया कि नोटबंदी के बाद नक्सलियों व आतंकवादियों की कमर टूट गई है। पर छत्तीसगढ़ में थोड़े-थोड़े अंतराल पर अगर नक्सली हमले हो रहे हैं, तो इससे यही साबित होता है कि सुरक्षाबलों के पास जैसी तैयारी व प्रशिक्षण होना चाहिए, वह नहीं है। दरअसल, लंबे समय से नक्सलियों को हथियार के बल पर दबाने का प्रयास किया जाता रहा है। कुछ साल पहले आदिवासी समुदाय के लोगों को नक्सलियों से लड़ने के लिए तैयार किया गया और सलवा जुडूम नामक अभियान चला कर उम्मीद की गई कि इस तरह नक्सली आंदोलन समाप्त हो जाएगा। पर वह भी नाकाम साबित हुआ।

नक्सली समस्या से पार पाने के लिए बातचीत का जो सिलसिला बनना चाहिए, वह अभी तक नहीं बन पाया। स्थानीय लोगों में भरोसा पैदा करने की जरूरत पहले है। आदिवासियों का विरोध विकास के नाम पर छीनी जा रही उनकी जमीन और जंगल को लेकर है। अगर सरकारें उन्हें समझाने में कामयाब हो जाएं कि विकास किसलिए जरूरी है व इससे उनके जीवन में किस तरह के बदलाव आएंगे, तो वे शायद नक्सलियों का साथ देना छोड़ देंगे। इसके अलावा, जहां जल, जंगल, जमीन की रक्षा जरूरी है, वहां सरकार को व्यावहारिक पहलुओं पर विचार करना पड़ सकता है। दमन के सहारे न तो किसी आंदोलन को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है और न ही किसी के मन को बदला जा सकता है। इसलिए नक्सली आंदोलन पर काबू पाने पहले लोगों का विश्वास जीतना जरूरी है। अगर इस दिशा में कामयाबी मिल गई, तो नक्सली ताकतें अपने आप समाप्त हो जाएंगी।

नक्सली हमलों पर काबू पाने के मकसद से विभिन्न राज्यों में अब तक अनेक उपाय आजमाए जा चुके हैं, मगर इस समस्या का हल निकाल पाना चुनौती बना हुआ है। छत्तीसगढ़ में नक्सली प्रभाव समाप्त करने के मकसद से सलवा जुडूम जैसे प्रयोग किए गए और सुरक्षा बलों को अधिक चौकस बनाने का प्रयास किया गया, मगर इन सबका खास असर नहीं दिखा। इसी तरह बिहार राज्य के जंगली इलाकों में नक्सलियों के दबदबे को खत्म करना कठिन बना हुआ है। सवाल है कि क्यों इस समस्या पर काबू पाने में कोई कामयाबी नहीं मिल पा रही। नक्सली नेटवर्क को भेदने के लिए सुरक्षा बलों को विशेष प्रशिक्षण देने, संचार तंत्र को मजबूत करने और खुफिया तंत्र को प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया। फिर भी स्थिति यह है कि नक्सली संगठनों के पास अत्याधुनिक हथियार और गोला बारूद पहुंच रहे हैं। उनकी योजनाओं का पता लगाना कठिन बना हुआ है। इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि औरंगाबाद के जंगलों में नक्सलियों से निपटने के लिए वहां की सरकार ने कोबरा नाम से विशेष सुरक्षा दस्ता गठित किया है। वही दस्ता जंगलों में गश्त पर था, तो हमला हो गया। इसमें आइईडी विस्फोटक इस्तेमाल किया गया। घटना स्थल से एके सैंतालीस, इंसास राइफलें और ग्रेनेड लांचर बरामद हुए। सवाल यह है कि ऐसे साजो-सामान नक्सलियों तक किस तरह पहुंच रहे हैं। उनकी आपूर्ति पर सुरक्षा और खुफिया तंत्र नजर क्यों नहीं रख पा रहा है।

नक्सल समस्या पर काबू नहीं पाए जा सकने का बड़ा कारण हमारी सरकारों का उनके साथ बातचीत का व्यावहारिक सिलसिला शुरू न कर पाना और उन्हें विश्वास में न ले पाना भी है। फिर जिस तरह का तालमेल सुरक्षा बलों, खुफिया एजेंसियों, स्थानीय पुलिस और नागरिकों के साथ बनना चाहिए, वह नहीं बन पा रहा है। नक्सलियों की लड़ाई सैद्धांतिक स्तर पर शुरू हुई थी, मगर अब वह अपनी दिशा खो चुकी है। उनके विभिन्न संगठनों से तालमेल हो चुके हैं, जहां से उन्हें गुरिल्ला प्रशिक्षण और साजो-सामान उपलब्ध हो रहे हैं। यह भी छिपी बात नहीं है कि अनेक जगहों पर नक्सलियों के दबदबे से लोग परेशान हैं। वे जबरन वसूली जैसे कामों में भी शामिल हो गए हैं। फिर भी सुरक्षा बल उनकी लड़ाई को कमजोर करने में स्थानीय लोगों का विश्वास नहीं जीत पा रहे हैं और अवैध रास्तों से उपलब्ध हो रहे साजो-सामान पर नजर नहीं रख पा रहे हैं तो यह उनकी भारी विफलता है। स्थानीय लोगों को विश्वास में लेकर ही नक्सली प्रभाव को कमजोर किया जा सकता है, पर सुरक्षा बल प्राय: सख्ती अपना कर उनसे सूचनाएं हासिल करने का प्रयास करते देखे जाते हैं। सरकारों ने कभी गंभीरता से नक्सली संगठनों के साथ बातचीत करने का प्रयास नहीं किया।

पूवरेत्तर के कई विद्रोही संगठन जब बातचीत के जरिए अपना हिंसक रास्ता छोड़ने को तैयार हो सकते हैं, तो नक्सलियों को बातचीत के जरिए समझाना क्यों कठिन होना चाहिए! कई मामले सख्ती के बजाय लचीला रुख अपना कर भी हल किए जा सकते हैं। अगर नक्सल समस्या का बारीकी से अध्ययन कर व्यावहारिक रास्ता निकाला जाए तो हिंसक प्रवृत्ति पर काबू पाना शायद कठिन नहीं होगा।
राकेश दीक्षित (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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